लंगोटिया अंदाज से दिल्ली तक धमक
लालू प्रसाद यादव को समझना है तो उन्हें सिर्फ एक नेता मत समझिए, उनका अपना एक अलग स्टाइल रहा है. कभी हंसी-मजाक, कभी तीखे हमले, कभी जाति की बात को सीधे मंच से बोल देना, यही उनका तरीका था. उन्होंने गांव-देहात की भाषा को ही अपना हथियार बना लिया. यही वजह है कि बिहार में पिछड़े वर्ग की राजनीति को उन्होंने चुनाव जीतने का फॉर्मूला बना दिया और पूरे देश को बताना पड़ा कि अब बैकवर्ड कास्ट की बात को इग्नोर नहीं किया जा सकता. हालांकि उनकी कहानी पर बहस भी खूब होती है, कभी उनके करिश्मे की चर्चा होती है तो कभी परिवारवाद, खराब शासन और भ्रष्टाचार के मामलों को लेकर सवाल उठते हैं.
भारतीय लोकतंत्र में लालू का मतलब क्या है?
लालू प्रसाद यादव का नाम उस दौर की याद दिलाता है जब भारतीय लोकतंत्र ज्यादा मुखर, ज्यादा देसी और ज्यादा बगावती हो गया था. छात्र राजनीति से निकलकर वो 1990 से 1997 तक बिहार के मुख्यमंत्री बने और फिर 2004 से 2009 तक देश के रेल मंत्री रहे. आज भी वो राष्ट्रीय जनता दल यानी आरजेडी के सबसे बड़े चेहरे हैं. उनका कद सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है. जब भी लालू और लोकतंत्र की बात होती है तो सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि उन्होंने किसको बोलने का हक दिया, किसको कुर्सी तक पहुंचाया और किसे कैमरे के सामने लाकर खड़ा किया. उनके समर्थक मानते हैं कि उन्होंने गरीब और पिछड़े समाज को इज्जत दिलाई, वहीं विरोधी कहते हैं कि उनके दौर में भाई-भतीजावाद और कमजोर प्रशासन को बढ़ावा मिला.
क्यों लोगों के दिल में बस गए लालू?
पहला, सामाजिक न्याय की भाषा. उन्होंने पिछड़े, अल्पसंख्यक और गांव में रहने वाले वोटर को अपना बेस बनाया. दूसरा, परफॉर्मेंस वाली बातचीत. चुटकुले, नकल उतारना और ठेठ बिहारी बोली से वो बड़ी-बड़ी बातें भी आसान बना देते थे. तीसरा, पुरानी व्यवस्था को तोड़ना. उनके आने से बिहार में ऊंची जातियों का जो दबदबा था, उसे सीधी चुनौती मिली. चौथा, पार्टी को खड़ा करना. 1997 में जनता दल से अलग होकर उन्होंने अपनी पार्टी आरजेडी बनाई. पांचवा, परिवार को आगे लाना. लालू के बाद उनके बच्चे तेजस्वी यादव, तेज प्रताप यादव और मीसा भारती बिहार की राजनीति में बड़े चेहरे बन गए.
लालटेन निशान क्यों बन गया कहानी का हिस्सा?
आरजेडी का चुनाव निशान लालटेन है, जिसे चुनाव आयोग में हरिकेन लैंप के नाम से दर्ज किया गया है. यह सिर्फ एक निशान नहीं, बल्कि गांव की याद दिलाने वाली कहानी है. भारत में चुनाव निशान का बहुत महत्व होता है क्योंकि कम पढ़े-लिखे लोग भी निशान देखकर ही वोट डाल देते हैं. आरजेडी के लिए लालटेन का मतलब है गांव, अंधेरे में रोशनी और उन लोगों तक उजाला पहुंचाना जिन्हें अब तक भुला दिया गया था.
किताबों, संपत्ति और फिल्मों तक में चर्चा
अगर आप लालू प्रसाद यादव की किताब ढूंढेंगे तो सबसे पहले ‘गोपालगंज से रायसीना’ नाम सामने आएगा. यह किताब नलिन वर्मा के साथ लिखी गई उनकी आत्मकथा है, जिसमें उन्होंने दलित और पिछड़ी राजनीति को लेकर अपनी सोच बताई है. वहीं लालू की नेटवर्थ को लेकर इंटरनेट पर कई आंकड़े घूमते हैं, लेकिन असली जानकारी उनके चुनावी हलफनामे से ही मिलती है और वही सबसे भरोसेमंद मानी जाती है.
उनके असर के कुछ उदाहरण आज भी दिखते हैं, जैसे उनके भाषणों को कॉलेजों में पढ़ाया जाता है कि कैसे हंसी-मजाक से भीड़ को जोड़ा जाता है. दूसरा, आज भी बहस होती है कि जाति को ताकत देना सही था या इससे सरकार चलाने की गुणवत्ता गिरी. तीसरा, उनके जीवन पर फिल्म या वेब सीरीज बनाने की चर्चा होती रहती है क्योंकि उनकी जिंदगी खुद एक राजनीतिक ड्रामा है. चौथा, आज भी लोग आरजेडी की अगली पीढ़ी पर नजर रखते हैं कि तेजस्वी क्या करेंगे.
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आखिर में क्या है लालू की विरासत?
इसलिए लालू की विरासत को सिर्फ तारीफ या सिर्फ बुराई में नहीं बांटा जा सकता. लोकतंत्र का मतलब ही है टकराव, सवाल और सबकी आवाज. लालू ने इसी सवाल को जिंदा किया कि कौन बोलेगा, कौन हंसेगा, कौन राज करेगा और किसकी आवाज सुनी जाएगी.
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-भारत एक्सप्रेस
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