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₹1.86 लाख करोड़ का मास्टरस्ट्रोक! भारत को ग्रीन एनर्जी हब बनाने के लिए मोदी सरकार का बड़ा ऐलान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर फेज़-III (GEC-III) स्कीम को मंज़ूरी दे दी है. यह ऐतिहासिक पहल भारत के इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम (InSTS) को मज़बूत करेगी, जिससे राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 135 गीगावाट (GW) तक रिन्यूएबल एनर्जी की निकासी हो सकेगी.

केंद्र सरकार ने देश में रिन्यूएबल एनर्जी को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट ने ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर फेज-III (GEC-III) योजना को मंजूरी दे दी है. इस योजना का मकसद राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बिजली के ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूत करना है, ताकि भविष्य में 135 गीगावाट तक रिन्यूएबल एनर्जी को आसानी से ग्रिड तक पहुंचाया जा सके.

सरल भाषा में समझें तो देश में सौर और पवन ऊर्जा से बिजली का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है. लेकिन सिर्फ बिजली बनाना ही काफी नहीं है. उसे वहां से निकालकर ग्रिड तक पहुंचाना और फिर जरूरत वाले इलाकों तक पहुंचाना भी उतना ही जरूरी है. GEC-III इसी ट्रांसमिशन व्यवस्था को मजबूत करने पर फोकस करेगी.

बैटरी स्टोरेज पर भी बड़ा जोर

इस योजना में सिर्फ ट्रांसमिशन लाइनें और नेटवर्क मजबूत करने की बात नहीं है. इसके तहत 50 GWh बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS) लगाने की भी व्यवस्था की गई है. ये बैटरी सिस्टम रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपर या बिजली उत्पादन से जुड़ी दूसरी जरूरी जगहों पर लगाए जा सकेंगे.

इसका फायदा खासतौर पर उस समय होगा जब बिजली की मांग अचानक बढ़ जाती है. बैटरी स्टोरेज ग्रिड पर दबाव कम करने, बिजली की भीड़भाड़ यानी congestion घटाने और पीक आवर्स में सप्लाई को संभालने में मदद कर सकता है. इसके अलावा, जब सौर ऊर्जा उपलब्ध नहीं होती, यानी गैर-सौर घंटों में भी स्टोरेज सिस्टम बिजली की जरूरत पूरी करने में उपयोगी होगा.

1.86 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का प्रोजेक्ट

GEC-III को वित्त वर्ष 2032-33 तक शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है. इस पूरी योजना पर करीब 1,86,405 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है.

इसमें करीब 1,36,378 करोड़ रुपये इंट्रा-स्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम (InSTS) को विकसित करने पर खर्च होंगे. वहीं, 50 GWh बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम के लिए 50,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है.

योजना में सरकार की ओर से कुल 54,082 करोड़ रुपये की केंद्रीय वित्तीय सहायता भी शामिल है. इस सहायता का एक अहम उद्देश्य राज्यों में ट्रांसमिशन से जुड़े शुल्क का बोझ कम करना है. सरकार के मुताबिक, इससे बिजली की लागत को नियंत्रण में रखने में मदद मिल सकती है और इसका फायदा आखिरकार बिजली इस्तेमाल करने वाले उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है.

राज्यों की होगी अहम भूमिका

GEC-III के तहत नए यानी ग्रीनफील्ड ट्रांसमिशन प्रोजेक्ट्स को टैरिफ बेस्ड कॉम्पिटिटिव बिडिंग (TBCB) के जरिए लागू किया जाएगा. वहीं, पहले से मौजूद नेटवर्क को अपग्रेड करने और उसे मजबूत बनाने वाले ब्राउनफील्ड प्रोजेक्ट्स को कॉस्ट प्लस बेसिस (CPB) पर आगे बढ़ाया जाएगा.

इस पूरी व्यवस्था में राज्यों की ट्रांसमिशन यूटिलिटीज की बड़ी भूमिका होगी. वहीं, TBCB के जरिए चुने जाने वाले ट्रांसमिशन सर्विस प्रोवाइडर्स (TSPs) बिल्ड-ओन-ऑपरेट-मेंटेन (BOOM) मॉडल पर परियोजनाओं में हिस्सा लेंगे.

ऊर्जा सुरक्षा और रोजगार पर भी असर

सरकार का मानना है कि GEC-III सिर्फ बिजली के ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूत करने वाली योजना नहीं है, बल्कि यह देश की लंबी अवधि की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में भी मदद करेगी. यह योजना 2035 तक 900 GW इंस्टॉल्ड नॉन-फॉसिल फ्यूल आधारित क्षमता के लक्ष्य की दिशा में भी योगदान दे सकती है.

रिन्यूएबल एनर्जी का दायरा बढ़ने से कोयला और दूसरे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है. इसके साथ ही कार्बन उत्सर्जन घटाने और पर्यावरण के लिहाज से टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने की उम्मीद है.

इस योजना से रोजगार के भी कई अवसर बनने की संभावना है. ट्रांसमिशन नेटवर्क के निर्माण से लेकर पावर सेक्टर, मैन्युफैक्चरिंग और कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री तक इसका असर देखने को मिल सकता है. खासतौर पर बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम की मैन्युफैक्चरिंग और स्थापना बढ़ने से घरेलू एनर्जी स्टोरेज उद्योग को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है.

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-भारत एक्सप्रेस



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