सोशल मीडिया पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत के नाम से जाति, आरक्षण और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों को लेकर भ्रामक व मनगढ़ंत दावे तेजी से प्रसारित किए जा रहे हैं. विभिन्न सोशल मीडिया पोस्ट और ग्राफ़िक्स में दावा किया गया कि सीजेआई ने खुली अदालत में जाति व्यवस्था और आरक्षण की नीतियों पर तल्ख टिप्पणियां की हैं. हालांकि, इन दावों को पूरी तरह खारिज करते हुए न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने स्पष्ट किया है कि उनके नाम से वायरल हो रहे आरक्षण विरोधी बयान पूरी तरह फर्जी और मनगढ़ंत हैं, जिनका उनके वास्तविक शब्दों, विचारों या चरित्र से कोई संबंध नहीं है.
वायरल पोस्ट्स में किए गए थे भ्रामक दावे
सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरों में दावा किया जा रहा था कि सीजेआई सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि यदि कोई समाज आईएएस, आईपीएस, सीजेआई, राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री देने के बाद भी खुद को शोषित बताता है, तो इसके लिए ब्राह्मणों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. इसके अलावा अन्य पोस्ट्स में यह झूठा दावा भी किया गया कि पीठ ने सवाल उठाया कि क्या अन्य धर्मों में जाति विभाजन ब्राह्मणों ने बनाया और जब लोग जातिभेद का विरोध करते हैं तो जातिगत पहचान का इस्तेमाल क्यों जारी रखते हैं. कई पोस्ट्स में यह प्रचारित किया गया कि अदालत ने आरक्षण पर बहस को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया है.
यूजीसी इक्विटी नियमों पर जातिविहीन समाज की कही थी बात
वास्तविक अदालती कार्यवाही के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता का संवर्धन) विनियम 2026 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान भारत में एक ‘जातिविहीन समाज’ (Casteless Society) के निर्माण की आवश्यकता पर स्वाभाविक टिप्पणी जरूर की थी. पीठ ने पूछा था कि क्या देश को आगे ले जाना है या अतीत की व्यवस्थाओं में ही बांधकर रखना है.
2026 के नए नियमों पर रोक, 2012 की व्यवस्था रहेगी लागू
मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने यूजीसी के नए 2026 विनियमों के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी थी और आगामी आदेश तक 2012 के पुराने ढांचे को ही प्रभावी रखने का निर्देश दिया था. अदालत का पूरा विचार-विमर्श केवल विश्वविद्यालयी नियमों और समानता के दायरे तक केंद्रित था. सीजेआई ने दोहराया कि उनके नाम से जोड़े गए आरक्षण विरोधी और जाति विशेष पर आधारित बयान अदालत में कभी नहीं दिए गए और यह न्यायपालिका की छवि को धूमिल करने की दुर्भावनापूर्ण साजिश है.
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