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लाल बहादुर शास्त्री : भारतीय राजनीति के परमार्थी संत

Lal Bahadur Shastri: जनवरी 1921 में बनारस में महात्मा गांधी और पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रभावशाली भाषणों से प्रेरित होकर लाल बहादुर शास्त्री सक्रिय रूप से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और जीवन भर इसके समर्पित सहभागी बने रहे. इसी दौरान, 1925 में काशी विद्यापीठ में अध्ययन करते हुए उन्होंने भारत रत्न भगवान दास की पुस्तक ‘Essential Unity of All Religions’ पर एक गंभीर शोध-लेख लिखा.

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लाल बहादुर शास्त्री : भारतीय राजनीति के परमार्थी संत

Lal Bahadur Shastri: जब भारतीय राजनीति में ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ की भावना के लिए प्रसिद्ध लाल बहादुर शास्त्री से एक बार पूछा गया कि वे अपनी मेज पर सुंदर फूलों की बजाय हरी घास क्यों रखते हैं, तो उन्होंने उत्तर दिया – “फूल लोगों को आकर्षित करते हैं, लेकिन कुछ ही दिनों में मुरझाकर गिर जाते हैं, जबकि घास आधार होती है, वह विपरीत परिस्थितियों में भी हरी बनी रहती है. मैं लोगों के जीवन में घास की तरह बनना चाहता हूं.”

यह गहन कथन किसी व्यक्ति के स्वभाव और कार्य-संस्कृति की महत्वपूर्ण झलक प्रस्तुत करता है. यह उनके देशवासियों के प्रति बिना किसी आडंबर के समर्पित, संयमी और सेवा-भावी व्यक्तित्व को अभिव्यक्त करता है.

महात्मा गांधी के भाषणों से थे प्रेरित

जनवरी 1921 में बनारस में महात्मा गांधी और पंडित मदन मोहन मालवीय के प्रभावशाली भाषणों से प्रेरित होकर लाल बहादुर शास्त्री सक्रिय रूप से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और जीवन भर इसके समर्पित सहभागी बने रहे. इसी दौरान, 1925 में काशी विद्यापीठ में अध्ययन करते हुए उन्होंने भारत रत्न भगवान दास की पुस्तक ‘Essential Unity of All Religions’ पर एक गंभीर शोध-लेख लिखा. उनके इस विद्वत्तापूर्ण योगदान के सम्मान में उन्हें ‘शास्त्री’ की उपाधि प्रदान की गई. उनकी गहन विद्वत्ता का प्रतीक यह उपाधि जीवन भर उनके नाम के साथ जुड़ी रही.

Lal Bahadur Shastri

स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण 1930 से 1945 के बीच शास्त्री जी को सात बार जेल जाना पड़ा. इस अवधि में उनके परिवार ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना किया, लेकिन उन्होंने कभी ब्रिटिश सरकार से कोई रियायत नहीं मांगी. उनका दृढ़ विश्वास था कि राष्ट्र के प्रति निष्ठा सभी अन्य निष्ठाओं से ऊपर है, और यह निष्ठा पूर्ण, बिना शर्त तथा किसी प्रतिफल की अपेक्षा से परे होनी चाहिए.

नेहरू के बाद शास्त्री बने प्रधानमंत्री

27 मई 1964 को पंडित जवाहरलाल नेहरू के निधन के बाद, कांग्रेस कार्यसमिति ने 2 जून 1964 को सर्वसम्मति से शास्त्री जी को प्रधानमंत्री चुना. जब उन्हें लगा कि कुछ लोगों के मन में इस निर्णय को लेकर संदेह है, तो उन्होंने कहा – “प्रधानमंत्री का काम कठिन है, लेकिन असंभव नहीं. आइए प्रयास करें. यदि हम सफल हुए तो बहुत अच्छा, और यदि मैं असफल रहा तो इस्तीफा देकर चला जाऊंगा.”

इन शब्दों पर विशेष ध्यान देना चाहिए, क्योंकि ये उनकी नैतिक ईमानदारी को अत्यंत संक्षेप में व्यक्त करते हैं. सफलता के लिए उन्होंने ‘हम’ शब्द का प्रयोग किया, जबकि असफलता के लिए ‘मैं’ कहा. ऐसी ईमानदार स्वीकार्यता ही उन्हें ‘दुर्लभतम व्यक्तित्वों’ की श्रेणी में स्थापित करती है.

पीएम बनने से पहले तीन बार रहे केंद्रीय मंत्री

यह प्रेरणादायक और उतना ही रोचक है कि एक व्यक्ति, जिसने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के संसदीय सचिव के रूप में अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की और तीन बार केंद्रीय मंत्री रहने के बाद प्रधानमंत्री पद तक पहुंचा, उसने इतनी उपलब्धियों के बावजूद भारतीय राजनीति में एक परमार्थी संत जैसी असाधारण सादगी बनाए रखी. गृह मंत्री रहने के बावजूद उनके पास अपना घर नहीं था, कार खरीदने के लिए पर्याप्त धन नहीं था, और उनका पुत्र दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में प्रवेश पाने के लिए सामान्य विद्यार्थियों की तरह कतार में खड़ा हुआ था. विडंबना यह है कि आज ऐसे प्रसंग केवल कहानियां बनकर रह गए हैं.

यह अत्यंत चिंताजनक है कि आज की राजनीति और समाज में नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन हो चुका है तथा हर ओर दिखावा और आडंबर व्याप्त है. युवा आसानी से जीवन की चमक-दमक में उलझ जाते हैं. जिस देश में ग्राम प्रधान, पुलिस निरीक्षक, पटवारी और तहसीलदार जैसे पदों पर बैठे लोग स्वयं को जनता का ‘भगवान’ समझने लगते हैं और भ्रष्ट तरीकों से धन एवं शक्ति अर्जित करने में पूरा जीवन लगा देते हैं; जहां सेवा का अर्थ केवल अपने परिवार या जाति का उत्थान रह गया हो; जहां नशे का सेवन करने वाले कलाकारों को (कुछ अपवादों को छोड़कर) ‘सितारा’ माना जाता हो; ऐसे देश में शायद ही कोई विश्वास करेगा कि यहां कभी शास्त्री जी जैसा सत्यनिष्ठ प्रधानमंत्री भी हुआ था.

लोकतांत्रिक सरकार और उसके अधिकारियों, मंत्रियों आदि का महत्व इस बात पर निर्भर करता है कि वे जनता के प्रति कितने जवाबदेह हैं. जवाबदेही के अभाव में पूरा तंत्र केवल एक औपचारिकता बनकर रह जाता है. जैसा कि शास्त्री जी ने कहा था – “जो शासन करते हैं, उन्हें जनता की प्रतिक्रिया पर सावधानीपूर्वक ध्यान देना चाहिए, क्योंकि अंतिम अधिकार जनता के पास ही होता है.” यह कथन लोकतंत्र की उनकी वास्तविक समझ को दर्शाता है.

भारत पर आई चुनौतियों का किया सामना

1962 में चीन के हाथों मिली पराजय, जवाहरलाल नेहरू का निधन, गंभीर खाद्यान्न संकट और 1965 में पाकिस्तान की आक्रामकता – इन सभी चुनौतियों का लाल बहादुर शास्त्री ने न केवल साहसपूर्वक सामना किया, बल्कि भारत का गौरव भी बढ़ाया. जब देश खाद्यान्न संकट से जूझ रहा था, तब उन्होंने पहले अपने परिवार को सप्ताह में एक दिन उपवास रखने के लिए कहा और उसके बाद देशवासियों से ऐसा करने का आग्रह किया. उनके इस विवेकपूर्ण कदम के बारे में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था – “शास्त्री जी ने भूख देखी थी, इसलिए वे जानते थे कि उससे कैसे निपटना है.”

6 सितंबर 1965 को भारतीय सेना को पाकिस्तान के विरुद्ध जवाबी कार्रवाई करते हुए लाहौर की ओर बढ़ने का आदेश देना भारतीय इतिहास में ‘सबसे छोटे कद वाले व्यक्ति द्वारा लिया गया सबसे बड़ा निर्णय’ माना जाता है. भारत के इस कठिन दौर में, जब 11 जनवरी 1966 की सुबह 1:32 बजे ताशकंद में शास्त्री जी ने अंतिम सांस ली, तो ऐसा लगा मानो भारत के एक गौरवशाली युग का अंत हो गया हो. प्रधानमंत्री के रूप में अपने केवल 19 महीने के कार्यकाल में उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए एक गहरी विरासत छोड़ दी.

12 जनवरी 1966 को एक राष्ट्रीय दैनिक ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा था –

वे ऐसे नेता थे, जिनके असाधारण गुण उन्हें संकट और अनिश्चितता के समय अपने देश का नेतृत्व करने के लिए आदर्श बनाते थे. और प्रधानमंत्री पद के अन्य दावेदारों के प्रति कोई अनादर किए बिना यह कहा जा सकता है कि उनकी जगह भरना कठिन होगा.

‘शीलम् परम् भूषणम्’ के परफेक्ट उदाहरण थे शास्त्री

हमारे देश तथा कुछ अन्य देशों के सिविल सेवकों को मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी (LBSNAA) में प्रशिक्षण दिया जाता है. इस अकादमी का आदर्श वाक्य ‘शीलम् परम भूषणम्’ (चरित्र ही सर्वोच्च आभूषण है) इस परमार्थी व्यक्ति के स्वभाव के साथ पूर्णतः सामंजस्य रखता है. हालांकि यह गंभीर चिंता का विषय है कि इस अकादमी से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बावजूद अनेक सिविल सेवक अपने जीवन में शास्त्री जी जैसी सादगी और नैतिक दृढ़ता को अपनाने से भटक जाते हैं.

शास्त्री जी का जीवन अत्यंत सादगीपूर्ण था. यद्यपि उनकी गरीबी के बारे में बहुत कुछ कहा जाता है, किंतु संभवतः उन्होंने स्वयं इसके बारे में बहुत कम लिखा या बोला. 16 मई 1928 को अपने विवाह के दिन उन्होंने अपनी पत्नी ललिता जी से केवल इतना कहा था कि वे एक संपन्न परिवार से आती हैं और उनका विवाह किसी समृद्ध घर में हो सकता था. लेकिन अब जब उनका विवाह हो चुका है, तो उन्हें अपने से नीचे की स्थिति वाले लोगों की ओर ध्यान देना चाहिए.

अपने छात्र जीवन में उनके एक शिक्षक ने कहा था – “गरीबी कोई ऐसा आभूषण नहीं है, जिसे प्रदर्शित किया जाए.” यह सिद्धांत शास्त्री जी का जीवन-मंत्र बन गया. उनमें विनम्रता थी, लेकिन वह दिखावटी नहीं थी. बल्कि वह उनके पारिवारिक संस्कारों की स्वाभाविक और सहज अभिव्यक्ति थी.

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शास्त्री जी ने अपने निष्कलंक जीवन और ईमानदारी से यह सिद्ध कर दिया कि अभावों में भी जीवन निष्कलुष, पवित्र और उच्च हो सकता है. समाज के प्रत्येक वर्ग का व्यक्ति भारतीय राजनीति के इस परमार्थी संत से कुछ न कुछ मूल्यवान सीख सकता है, बशर्ते सीखने की इच्छा हो.

(लेखक- डॉ. सत्येंद्र श्रीवास्तव, सहायक प्रोफेसर दर्शनशास्त्र विभाग, किरोड़ीमल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय)



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