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Rape laws in India:रजनीश कपूर: भारत में महिलाओं के खिलाफ हिंसा एक पुरानी और गहरी बीमारी बनी हुई है. हर कुछ समय में कोई जघन्य घटना देश की आत्मा को हिला देती है, जिसके बाद जन-आक्रोश फूटता है, कानून सख्त किए जाते हैं और अंततः मामला फाइलों में दब जाता है. एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़े भले ही मामलों में मामूली गिरावट दिखाएं, लेकिन सड़क, घर, अस्पताल और सार्वजनिक स्थल आज भी महिलाओं के लिए पूरी तरह सुरक्षित नहीं हो सके हैं.
भारत में महिला सुरक्षा की स्थिति कड़े कानूनों के बावजूद चिंताजनक बनी हुई है. राजनीतिक हस्तक्षेप, पुलिस की लापरवाही, फॉरेंसिक जांच में देरी और अदालतों में मुकदमों का वर्षों तक लंबित रहना अपराधियों का मनोबल बढ़ाता है. महिला सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुलिस को स्वायत्तता देनी होगी, फास्ट ट्रैक न्याय प्रणाली को समयबद्ध बनाना होगा और पीड़िता सुरक्षा नीति को धरातल पर लागू करना होगा.
अपराध के आंकड़े और खौफनाक जमीनी हकीकत
एनसीआरबी के ताज़ा आंकड़ों के अनुसार 2024 में महिलाओं के विरुद्ध लगभग 4.41 लाख मामले दर्ज हुए, जिनमें 29,536 मामले बलात्कार के थे. हालांकि यह संख्या पिछले आंकड़ों से 1.5 प्रतिशत कम है, लेकिन यह सांत्वना देने वाली स्थिति नहीं है. इसका अर्थ यह है कि देश में आज भी लगभग हर 71 सेकंड में महिलाओं के खिलाफ एक अपराध दर्ज हो रहा है. महानगरों में दिल्ली इस सूची में सबसे आगे बनी हुई है.
निर्भया से लेकर आरजी कर तक: बार-बार टूटती व्यवस्था
दिसंबर 2012 का निर्भया कांड, 2017 का उन्नाव मामला और 2020 का हाथरस कांड-ये महज आपराधिक घटनाएं नहीं थीं, बल्कि राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था की साख पर बड़े सवाल थे. अगस्त 2024 में कोलकाता के आरजी कर अस्पताल में युवा डॉक्टर के साथ हुई बर्बरता, जून 2026 में बेगूसराय की घटना और सितंबर 2026 में दिल्ली के कालकाजी मंदिर के पास फर्जी पुलिस बनकर किशोरी से किया गया दुष्कर्म यह साबित करता है कि समय बीतने के बाद भी अपराध का पैटर्न वही है: एफआईआर में देरी, सबूतों से छेड़छाड़ और पीड़िता का अलग-थलग पड़ जाना.
राजनीतिक संरक्षण: निष्पक्ष जांच का सबसे बड़ा रोड़ा
अपराध मामलों में न्याय न मिलने का सबसे बड़ा कारण राजनीतिक हस्तक्षेप है. जब आरोपी किसी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता, जनप्रतिनिधि या स्थानीय दबंग होता है, तो थाने में एफआईआर दर्ज कराना ही पीड़िता के लिए सबसे बड़ा संघर्ष बन जाता है. उन्नाव से लेकर आरजी कर अस्पताल मामले तक पुलिस प्रशासन की भूमिका और राजनीतिक लीपापोती पर अदालतों ने भी गंभीर सवाल उठाए हैं. राजनीति इस गंभीर मुद्दे को ‘कानून-व्यवस्था बनाम विपक्ष’ के खेल में बदल देती है, जिससे पीड़िता न्याय के केंद्र से बाहर हो जाती है.
सुस्त अदालती प्रक्रिया: न्याय में देरी ही न्याय से वंचना
जांच के बाद दूसरा बड़ा अवरोध हमारी न्यायिक प्रक्रिया की धीमी गति है. बलात्कार के मामलों में अदालतों में मुकदमों की लंबितता (Pendency) लगभग 90 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है. देश भर में बलात्कार और पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के ढाई लाख से अधिक मामले लंबित हैं. फास्ट ट्रैक विशेष अदालतें कागजों पर तो तेजी का दावा करती हैं, लेकिन व्यावहारिक रूप से दोषसिद्धि दर काफी कम है. मुकदमों का सालों तक खिंचना अपराधियों को यह संदेश देता है कि सजा अनिश्चित है.
नारों से परे: ठोस सुधार और स्थायी समाधान की जरूरत
महिला सुरक्षा के लिए केवल नारों और वादों की नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है. सबसे पहले, गंभीर अपराधों में एफआईआर दर्ज न करने वाले पुलिसकर्मियों पर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए. संवेदनशील और बड़े मामलों की जांच को राजनीतिक प्रभाव से पूरी तरह मुक्त रखा जाए. इसके अलावा, फास्ट ट्रैक अदालतों में न्यायाधीशों और फॉरेंसिक विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाकर एक साल की समय-सीमा में न्याय सुनिश्चित किया जाना चाहिए.
सामाजिक सोच और पुलिस व्यवस्था में बदलाव अनिवार्य
कानून का डर तभी कायम हो सकता है जब सजा निश्चित और त्वरित हो. अस्पतालों, सार्वजनिक परिवहन और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर निगरानी तंत्र को मजबूत करना होगा. साथ ही, समाज में लड़कों और पुरुषों के समाजीकरण पर ध्यान देना होगा ताकि घर, स्कूल और कार्यस्थल पर महिलाओं की गरिमा और सहमति का सम्मान हो सके. भारत के पास कानूनों की कमी नहीं है, आवश्यकता केवल उनके पारदर्शी और ईमानदार क्रियान्वयन की है.
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-भारत एक्सप्रेस
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