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9 दिनों में ₹60,000 करोड़ स्वाहा! 4 लाख करोड़ निकाल चुके FIIs, क्या घरेलू निवेशक बचा पाएंगे मार्केट?

भारतीय शेयर बाजार में लगातार गिरावट और विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है. कमजोर रुपया, महंगा कच्चा तेल और टैक्स का बोझ भी बाजार पर दबाव बना रहे हैं.

Indian Stock Market

भारतीय शेयर बाजार में पिछले कई महीनों से जारी गिरावट ने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है. हैरानी की बात यह है कि अमेरिकी बाजारों में तेजी आने के बावजूद भारतीय बाजार कई बार दबाव में नजर आते हैं. वहीं, जब अमेरिका में गिरावट होती है, तो उसका असर भी भारतीय शेयर बाजार पर दिखाई देता है. ऐसे में निवेशकों के मन में सवाल उठ रहा है कि आखिर भारतीय बाजार को राहत कब मिलेगी और लगातार गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह क्या है?

भारतीय शेयर बाजार में गिरावट की सबसे बड़ी वजह विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली मानी जा रही है. विदेशी संस्थागत निवेशक यानी FII जब भारतीय कंपनियों के शेयर बेचकर अपना पैसा निकालते हैं, तो बाजार पर दबाव बढ़ जाता है. इसका असर शेयरों की कीमतों के साथ प्रमुख सूचकांकों पर भी पड़ता है.

दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, साल 2026 में अब तक विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से 4 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम निकाल चुके हैं. वहीं, पिछले नौ दिनों में करीब 60 हजार करोड़ रुपये की निकासी ने बाजार की चिंता और बढ़ा दी है.

हालांकि, इस दौरान घरेलू निवेशकों ने बाजार को काफी हद तक सहारा दिया है. आम भारतीयों की सीधी शेयरों में खरीदारी और म्यूचुअल फंड में लगातार निवेश से बाजार को मजबूती मिली है. लेकिन सवाल यह है कि क्या घरेलू निवेशक लंबे समय तक विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली का असर रोक पाएंगे?

टैक्स का बोझ भी बन रहा है चिंता

शेयर बाजार में निवेशकों की परेशानी केवल विदेशी बिकवाली तक सीमित नहीं है. टैक्स से जुड़े फैसलों पर भी सवाल उठ रहे हैं. बजट में फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) कारोबार पर सिक्योरिटीज ट्रांजेक्शन टैक्स यानी STT बढ़ाने के फैसले का असर बाजार के कारोबारियों पर पड़ा था.

इसके अलावा, शेयरों से होने वाले मुनाफे पर लगने वाला टैक्स भी विदेशी निवेशकों के फैसलों को प्रभावित कर सकता है. फिलहाल लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) पर 12.5 प्रतिशत और शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स (STCG) पर 20 प्रतिशत टैक्स लगता है. बाजार से जुड़े कुछ जानकारों का मानना है कि टैक्स की मौजूदा व्यवस्था और कारोबार की लागत विदेशी निवेशकों के संभावित मुनाफे को कम कर सकती है.

हालांकि, विदेशी निवेशकों की बिकवाली के पीछे केवल टैक्स को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. वैश्विक आर्थिक हालात, दूसरे देशों में मिलने वाला रिटर्न और भारतीय कंपनियों के शेयरों की कीमतें भी उनके फैसलों को प्रभावित करती हैं.

कमजोर रुपये और महंगे कच्चे तेल की दोहरी मार

भारतीय शेयर बाजार पर रुपये की कमजोरी और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का भी असर पड़ रहा है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है. ऐसे में तेल महंगा होने पर देश का आयात बिल बढ़ सकता है. इसका असर महंगाई, कंपनियों की लागत और रुपये की कीमत पर भी पड़ सकता है.

रुपये में गिरावट विदेशी निवेशकों के लिए एक अलग जोखिम पैदा करती है. मान लीजिए कि किसी विदेशी निवेशक के शेयरों की कीमत में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ, लेकिन इसी दौरान रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हो गया. ऐसी स्थिति में निवेशक को डॉलर में अपना पैसा वापस बदलते समय नुकसान हो सकता है.

दूसरी ओर, अमेरिका में ब्याज दरों और सरकारी बॉन्ड से मिलने वाले रिटर्न का आकर्षण भी विदेशी निवेशकों को प्रभावित करता है. यदि उन्हें डॉलर में अपेक्षाकृत सुरक्षित निवेश से अच्छा रिटर्न मिल रहा है, तो वे भारतीय शेयर बाजार जैसे जोखिम वाले विकल्पों से पैसा निकालने का फैसला कर सकते हैं.

सरकार से राहत की उम्मीद क्यों?

बाजार में लगातार गिरावट के बीच निवेशकों की नजर सरकार के अगले कदमों पर टिकी है. मार्च में बाजार में बड़ी गिरावट के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने उद्योग जगत के विशेषज्ञों से बातचीत की बात कही थी. इससे निवेशकों के बीच उम्मीद जगी थी कि शेयर बाजार से जुड़े टैक्स में राहत मिल सकती है. लेकिन अब तक ऐसी किसी बड़ी राहत की उम्मीद पूरी नहीं हुई है.

बाजार के मौजूदा हालात में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से दूरी क्यों बना रहे हैं. क्या टैक्स की दरें इसकी बड़ी वजह हैं? क्या कारोबार की लागत कम करने की जरूरत है? या फिर रुपये की कमजोरी और वैश्विक बाजारों में बेहतर विकल्प मिलने से भारत का आकर्षण घट रहा है? इन सवालों के जवाब तलाशना जरूरी है.

छोटे निवेशकों की बचत पर भी असर

शेयर बाजार की गिरावट का असर अब छोटे निवेशकों पर भी साफ दिखाई दे रहा है. पिछले कुछ समय से बाजार में उतार-चढ़ाव और कमजोर प्रदर्शन के कारण कई निवेशकों के पोर्टफोलियो पर दबाव बढ़ा है. जिन लोगों ने अपनी मेहनत की कमाई का एक हिस्सा शेयरों या म्यूचुअल फंड में लगाया है, उनके लिए लगातार गिरावट चिंता का विषय बन सकती है.

निफ्टी अपने उच्चतम स्तर से 15 प्रतिशत से ज्यादा नीचे आने की बात भी बाजार में कमजोरी की गंभीरता को दिखाती है. हालांकि, बाजार में गिरावट के दौरान हर शेयर या हर निवेशक को एक जैसा नुकसान नहीं होता.

ऐसे समय में छोटे निवेशकों के लिए जरूरी है कि वे घबराहट में फैसले लेने से बचें और अपने निवेश के उद्देश्य, जोखिम उठाने की क्षमता तथा समयसीमा को ध्यान में रखें.

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-भारत एक्सप्रेस



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