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राज कुमार की 100वीं जयंती: पुलिस इंस्पेक्टर से पर्दे के ‘बादशाह’ बनने तक, कोई नहीं दोहरा पाया उनका वह अंदाज

8 अक्टूबर 2026 को हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता राज कुमार की 100वीं जयंती है. पुलिस की नौकरी से लेकर पर्दे के बेताज बादशाह बनने तक के उनके सफर, उनकी फिल्मों और ‘पाकीजा’ के री-रिलीज की कहानी.

Raj Kumar 100th Birth Anniversary Legacy Iconic Dialogues And Films
Edited by Vaibhav Gupta

Raaj Kumar 100th Birth Anniversary: बीते 8 अक्टूबर 2026 को हिंदी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता राज कुमार की 100वीं जयंती थी। पुलिस की नौकरी से लेकर पर्दे के बेताज बादशाह बनने तक के उनके सफर, उनकी फिल्मों और ‘पाकीजा’ के री-रिलीज की कहानी.

पुलिस इंस्पेक्टर से पर्दे के बादशाह तक

कुलभूषण पंडित के रूप में 8 अक्टूबर 1926 को लोरलाई (तब ब्रिटिश भारत, अब पाकिस्तान) में जन्मे राज कुमार कश्मीरी पंडित परिवार से थे. मुंबई आने के बाद उन्होंने पुलिस सब-इंस्पेक्टर के रूप में काम किया. लेकिन सिनेमा ने उन्हें बुला लिया. 1952 में ‘रंगीली’ से शुरुआत हुई, लेकिन असली पहचान 1957 में ‘मदर इंडिया’ और ‘नौशेरवान-ए-आदिल’ से मिली. उसके बाद चार दशकों तक 70 से अधिक फिल्मों में उन्होंने ऐसा कद बनाया कि उनकी मौजूदगी ही फिल्म का केंद्र बन जाती थी.

‘वाक्त’, ‘दिल एक मंदिर’, ‘हीर रांझा’, ‘पाकीजा’, ‘सौदागर’, ‘तिरंगा’- इन फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग रंग दिखाए. कभी रोमांटिक नायक, कभी ट्रेजिक हीरो, कभी अभिजात्य, कभी विलक्षण. फिल्म आलोचक शांतनु रे चौधुरी ने ठीक ही लिखा है कि ‘मदर इंडिया देखिए, हीर रांझा देखिए, पाकीजा देखिए, वाक्त देखिए. सौदागर देखिए और शुद्ध आनंद के लिए तिरंगा देखिए. आपको एक करियर का सूक्ष्म चित्र दिखेगा- अभिनेता, स्टार, रोमांटिक, ट्रेजिक हीरो, अभिजात्य, विलक्षण, और अंत में वह व्यक्ति जो इतना पूर्णतः राज कुमार बन चुका था कि कोई और राज कुमार नहीं खेल सकता था. यह सिनेमा किसी अभिनेता को दे सकने वाली सबसे बड़ी तारीफ है.’

‘पाकीजा’ की बहाली और नई पीढ़ी तक पहुंच

इसी शताब्दी वर्ष में फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन (FHF) ने कमाल अमरोही की महान कृति ‘पाकीजा’ (1972) की 4K बहाली पूरी की है. राज कुमार का इसमें सलीम वाला किरदार आज भी याद किया जाता है. यह बहाल संस्करण 18 अक्टूबर 2026 को बीएफआई लंदन फिल्म फेस्टिवल में यूके प्रीमियर के लिए निर्धारित है. यह सिर्फ एक फिल्म की वापसी नहीं, बल्कि उस कलाकार की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास है.

व्यक्तित्व और विद्वत्ता

सुभाष घई, जिन्होंने ‘सौदागर’ में उनके साथ काम किया, याद करते हैं कि राज कुमार वेद, उपनिषद और शास्त्रों के ज्ञाता थे. लोगों से दूरी बनाए रखने के लिए उन्होंने जान-बूझकर एक कठोर मुखौटा पहन रखा था. वे कहते हैं कि ‘वे बहुत परिपक्व और ज्ञानी थे. जीवन को वे कॉमेडी मानते थे और लोगों को कॉमेडियन.’ उनकी स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और बेबाकी उनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग थे.

अमर संवाद और अंदाज

उनके संवाद सिर्फ शब्द नहीं थे, वे घटनाएं बन जाते थे. ‘जानी’ कहने का उनका तरीका आज भी नकल किया जाता है. चाहे ‘वाक्त’ के गहरे संवाद हों या ‘तिरंगा’ और ‘सौदागर’ की दमदार लाइनें, राज कुमार की आवाज और उनका ठहराव दर्शकों को बांध लेते थे.

आज जब उनकी शताब्दी मनाई जा रही है, तो सिर्फ याद नहीं की जा रही, बल्कि उनकी फिल्में फिर से देखी जा रही हैं. अल्ट्रा प्ले जैसे प्लेटफॉर्म पर उनके करियर की महत्वपूर्ण फिल्मों का उत्सव चल रहा है. नई पीढ़ी उनके संवादों के रील्स देखकर उनसे परिचित हो रही है. पुरानी पीढ़ी फिर से उन फिल्मों में डूब रही है जिनमें राज कुमार सिर्फ अभिनय नहीं कर रहे थे, वे राज कुमार बन रहे थे.

राज कुमार फिल्मों में गायब नहीं हुए. फिल्में उनकी मिथक का हिस्सा बन गईं. और यही उनकी सबसे बड़ी सफलता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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