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24 साल बाद अर्बन लैंड सीलिंग मामले में याचिका खारिज, अब दीवानी अदालत जाने की छूट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अर्बन लैंड सीलिंग के 24 साल पुराने मामले में देरी से दाखिल याचिका को खारिज कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि मूल भू-स्वामी को नोटिस की पूरी जानकारी थी और समय पर आपत्ति नहीं जताई गई थी.

Allahabad High Court Dismisses 24 Year Old Urban Land Ceiling Petition Prayagraj
Edited by Vaibhav Gupta

जमीन से जुड़े मामलों में लंबी कानूनी लड़ाई और देरी से कोर्ट पहुंचने वालों को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है. अदालत ने अर्बन लैंड सीलिंग (Urban Land Ceiling) के एक दो दशक से अधिक पुराने मामले में 24 साल की भारी-भरकम देरी से दाखिल की गई याचिका को खारिज कर दिया है. कोर्ट ने स्पष्ट रूप से टिप्पणी की है कि जब मूल भू-स्वामी को पूरी प्रक्रिया और नोटिस की जानकारी पहले से थी और उसने कभी समय पर आपत्ति दर्ज नहीं कराई, तो इतने साल बाद केवल प्रक्रियात्मक कमियों का हवाला देकर सीलिंग की पूरी कार्रवाई को रद्द नहीं किया जा सकता.

क्या था पूरा मामला और जमीन का विवाद?

यह पूरा मामला प्रयागराज के फूलपुर तहसील के अंतर्गत आने वाले झूंसी के छतनाग गांव का है, जहां 3,483 वर्ग मीटर जमीन से जुड़ा विवाद कोर्ट पहुंचा था. याचिकाकर्ता टुनटुन की तरफ से दलील दी गई थी कि उनके दादा मदन (जो मूल भू-स्वामी थे) ने सीलिंग रिटर्न दाखिल किया था.

याचिका में आरोप लगाया गया था कि अधिनियम की धारा 8(3) का नोटिस रजिस्टर्ड डाक के जरिए नहीं भेजा गया था. इसके साथ ही मार्च 1983 में जमीन को सरप्लस घोषित करने, फरवरी 1996 में धारा 10(5) का नोटिस तामील न होने और आगे की कानूनी प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए थे. याची का यह भी दावा था कि जमीन पर आज भी उनका कब्जा बरकरार है.

राज्य पक्ष ने कोर्ट में रखे पुख्ता दस्तावेज

दूसरी ओर, राज्य सरकार की तरफ से पक्ष रखते हुए सरकारी वकीलों ने अदालत में पूरे दस्तावेज और रिकॉर्ड पेश किए. रिकॉर्ड के हवाले से कोर्ट को बताया गया कि धारा 8(3) का कानूनी नोटिस मूल भू-स्वामी मदन लाल को अगस्त 1979 में ही तामील हो चुका था. इसके अलावा, अक्टूबर 1984 में धारा 9 का फाइनल स्टेटमेंट भी मिल चुका था.

सरकार की तरफ से यह भी स्पष्ट किया गया कि गजट में धारा 10(1) और 10(3) की अधिसूचनाएं क्रमशः 1986 और 1995 में प्रकाशित हो चुकी थीं. इतना ही नहीं, फरवरी 1996 में जारी नोटिस अप्रैल 1996 में खुद मूल भू-स्वामी मदन के हस्ताक्षर के साथ तामील हुआ था. नियत समय में कोई भी विरोध या आपत्ति दर्ज न होने के बाद कानून के मुताबिक 30 दिन की अवधि पूरी होने पर जमीन का कब्जा स्वतः राज्य सरकार को हस्तांतरित हो गया था और राजस्व रिकॉर्ड में भी सरकार का नाम दर्ज कर लिया गया था. बाद में दिसंबर 1996 के शासनादेश के तहत यह जमीन प्रयागराज विकास प्राधिकरण (PDA) को सौंप दी गई थी.

कोर्ट ने दीवानी वाद दायर करने की दी छूट

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सुधांशु चौहान की खंडपीठ ने पाया कि मूल भू-स्वामी को पूरी कार्यवाही की पुख्ता जानकारी थी. कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को यह राहत जरूर दी है कि यदि वह अपने कथित कब्जे को लेकर कोई दावा करना चाहते हैं, तो इसके लिए उचित दीवानी अदालत (Civil Court) में नया वाद दायर कर सकते हैं.

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-भारत एक्सप्रेस



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