हिमालय को दक्षिण एशिया की ‘स्वच्छ ऊर्जा की तिजोरी’ माना जाता है. नेपाल की बड़ी नदियां न सिर्फ उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकती हैं, बल्कि भारत की बढ़ती बिजली जरूरतों को भी पूरा करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आई प्राकृतिक आपदाओं ने एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है. क्या हम सिर्फ जलविद्युत परियोजनाओं की स्थापित क्षमता यानी मेगावाट गिन रहे हैं, या फिर यह भी देख रहे हैं कि संकट के समय वास्तव में कितनी बिजली उपलब्ध रह पाएगी?
विशेषज्ञों का मानना है कि अब केवल बड़ी परियोजनाओं की संख्या बढ़ाने से काम नहीं चलेगा. यह समझना भी जरूरी है कि प्राकृतिक आपदा आने पर ये परियोजनाएं कितनी सुरक्षित रहेंगी और बिजली आपूर्ति कितनी जल्दी बहाल हो सकेगी.
सिक्किम और नेपाल की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता
अक्टूबर 2023 में सिक्किम की तीस्ता घाटी में आई ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) ने 1,200 मेगावाट की तीस्ता-III जलविद्युत परियोजना को पूरी तरह तबाह कर दिया. इस हादसे से सिर्फ एक परियोजना नहीं बल्कि नदी के किनारे मौजूद कई अन्य बुनियादी ढांचों को भी भारी नुकसान पहुंचा.
वैज्ञानिक अध्ययनों में सामने आया कि इस आपदा के पीछे सिर्फ झील फटना ही कारण नहीं था, बल्कि अस्थिर पहाड़ी ढलान, बर्फ के खिसकने, भूस्खलन और तेज रफ्तार बाढ़ जैसी कई घटनाएं एक साथ जुड़ी हुई थीं.
इसी तरह अगस्त 2026 में नेपाल के भोटे कोशी-त्रिशूली नदी तंत्र में भीषण आपदा आई. रिपोर्टों के मुताबिक, लांगटांग लिरुंग क्षेत्र से चट्टानों और बर्फ का बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे आया, जिसने आगे चलकर मलबे के भयंकर बहाव का रूप ले लिया.
हालांकि दोनों घटनाओं के कारण अलग थे, लेकिन बिजली क्षेत्र पर उनका असर काफी हद तक समान रहा. नेपाल में इस आपदा के कारण 12 चालू जलविद्युत परियोजनाएं, जिनकी कुल क्षमता करीब 431 मेगावाट थी, प्रभावित हुईं. इसके अलावा निर्माणाधीन 15 परियोजनाओं पर भी असर पड़ा, जिनकी क्षमता लगभग 470 मेगावाट थी.
हिमालय में आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ रहा
ये घटनाएं कोई अपवाद नहीं हैं. 2013 की केदारनाथ आपदा ने उत्तराखंड की कई बिजली परियोजनाओं को प्रभावित किया था. इसके बाद 2021 में चमोली में हुए रॉक-आइस एवलांच ने ऋषिगंगा परियोजना को नष्ट कर दिया और तपोवन-विष्णुगाड़ परियोजना को भारी नुकसान पहुंचाया.
2023 में हिमाचल प्रदेश में आई भीषण बाढ़ ने भी कई जलविद्युत परियोजनाओं को प्रभावित किया. इन घटनाओं से साफ है कि खतरा सिर्फ ग्लेशियर झीलों तक सीमित नहीं है. भूस्खलन, हिमस्खलन, भारी वर्षा और तेजी से बहने वाला मलबा भी बड़ी चुनौतियां बन चुके हैं.
एक परियोजना नहीं, पूरी नदी घाटी को देखना होगा
अभी तक अधिकांश जलविद्युत योजनाओं का मूल्यांकन अलग-अलग परियोजनाओं के रूप में किया जाता है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह तरीका अब पर्याप्त नहीं है.
किसी नदी पर स्थित कई बांध, सब-स्टेशन, सड़कें और ट्रांसमिशन लाइनें एक ही खतरे वाले इलाके में होती हैं. ऐसे में यदि नदी घाटी में एक बड़ा हादसा होता है तो कई परियोजनाएं एक साथ प्रभावित हो सकती हैं.
यानी एक मजबूत बांध होने भर से बिजली आपूर्ति की गारंटी नहीं मिलती, यदि उससे जुड़ा पूरा नेटवर्क जोखिम में हो.
भारत और नेपाल के लिए क्यों महत्वपूर्ण है साझेदारी?
भारत और नेपाल के बीच बिजली सहयोग लगातार बढ़ रहा है. जनवरी 2024 में दोनों देशों के बीच ऐसा समझौता हुआ, जिसके तहत अगले 10 वर्षों में नेपाल से भारत को 10,000 मेगावाट तक बिजली निर्यात करने का लक्ष्य रखा गया.
नेपाल के पास विशाल जलविद्युत क्षमता है, जबकि भारत को बढ़ती ऊर्जा जरूरतों और सौर तथा पवन ऊर्जा के विस्तार के कारण अतिरिक्त बिजली लचीलेपन की जरूरत है. मुजफ्फरपुर-ढल्केबार जैसी ट्रांसमिशन लाइनें इस सहयोग को मजबूत बना रही हैं.
लेकिन इसके सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं. पहली, सूखे मौसम में नदी का जलस्तर कम होने से उत्पादन घट जाता है. दूसरी, प्राकृतिक आपदाएं अचानक कई परियोजनाओं को एक साथ बंद कर सकती हैं.
सिर्फ स्थापित क्षमता बताने से इन दोनों जोखिमों का आकलन नहीं हो पाता.
नया पैमाना अपनाने की जरूरत
विशेषज्ञों ने ‘क्लाइमेट एडजस्टेड डिपेंडेबल कैपेसिटी’ यानी CADC जैसी अवधारणा का सुझाव दिया है.
इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि जलवायु और भूगर्भीय जोखिमों को ध्यान में रखने के बाद किसी परियोजना से वास्तव में कितनी बिजली भरोसेमंद तरीके से मिल सकती है. इसमें मौसम, रखरखाव, ट्रांसमिशन बाधाएं, आपदाएं और रिकवरी के समय जैसे कारकों को शामिल किया जाएगा.
यह अभी कोई आधिकारिक मानक नहीं है लेकिन भविष्य की योजना बनाने के लिए एक उपयोगी ढांचा साबित हो सकता है.
नेपाल आपदा से मिला एक बड़ा सबक
नेपाल में आई आपदा के बाद एक और अहम बात सामने आई. आमतौर पर भारत-नेपाल बिजली व्यापार को नेपाल द्वारा भारत को बिजली बेचने के रूप में देखा जाता है.
लेकिन जब नेपाल की परियोजनाएं प्रभावित हुईं, तब भारत ने दिसंबर 2026 तक प्रतिदिन 18 घंटे के लिए 654 मेगावाट बिजली निर्यात करने की अनुमति दी.
इससे साबित हुआ कि सीमा पार बिजली नेटवर्क केवल व्यापार का माध्यम नहीं है, बल्कि आपदा के समय आपसी सहायता का भी मजबूत साधन बन सकता है.
आगे क्या करने की जरूरत है?
विशेषज्ञों का मानना है कि जलविद्युत परियोजनाओं की योजना बनाते समय पूरे नदी बेसिन का जोखिम मूल्यांकन किया जाना चाहिए. सिर्फ बांध ही नहीं, बल्कि ट्रांसमिशन लाइन, सड़क और अन्य बुनियादी ढांचे की सुरक्षा का भी आकलन होना चाहिए.
इसके साथ ही बिजली स्रोतों और क्षेत्रों में विविधता लानी होगी ताकि एक ही नदी या इलाके पर अत्यधिक निर्भरता कम हो सके.
जलाशय आधारित परियोजनाओं, पंप्ड स्टोरेज और बैटरी स्टोरेज को भी साथ लेकर योजना बनानी होगी. इसके अलावा बाढ़, भूस्खलन और अन्य आपदाओं की चेतावनी प्रणाली को सीधे बिजली संचालन तंत्र से जोड़ना जरूरी होगा.
मेगावाट से आगे देखने का समय
तीस्ता से लेकर त्रिशूली तक हुई घटनाएं यह नहीं बतातीं कि हिमालयी जलविद्युत का भविष्य खत्म हो गया है. बल्कि वे यह संकेत देती हैं कि अब सफलता को केवल स्थापित क्षमता के आधार पर नहीं मापा जा सकता.
असल सवाल यह है कि बिजली कितनी विश्वसनीय है, कितनी लागत पर उपलब्ध रहती है और आपदा आने के बाद व्यवस्था कितनी जल्दी सामान्य हो सकती है.
यदि भारत, नेपाल और भविष्य में भूटान जैसे देश मिलकर जलविद्युत, ट्रांसमिशन और आपदा प्रबंधन को एक साझा ढांचे में देखें, तो दक्षिण एशिया सिर्फ बिजली व्यापार ही नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय लचीलापन का भी मजबूत मॉडल बन सकता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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