दलाई लामा पर चीन का 'वेटिंग गेम'? (फोटो क्रेडिट- IANS)
तिब्बत से जुड़े मुद्दों पर चीन की नीति को लेकर एक नई रिपोर्ट में कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं. रिपोर्ट के मुताबिक, बीजिंग का दलाई लामा के साथ संवाद से लगातार बचना किसी असमंजस या कूटनीतिक मजबूरी का नतीजा नहीं है, बल्कि यह एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. दावा किया गया है कि चीन लंबे समय से ऐसी नीति पर काम कर रहा है, जिसके तहत वह भविष्य में दलाई लामा के उत्तराधिकार की प्रक्रिया पर प्रभाव स्थापित कर तिब्बत से जुड़े आंदोलन को कमजोर करना चाहता है.
तिब्बती बौद्ध परंपराओं की अनदेखी का आरोप
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह का दृष्टिकोण तिब्बती बौद्ध धर्म की परंपराओं और मूल सिद्धांतों के अनुरूप नहीं माना जा सकता. इसमें यह भी चेतावनी दी गई है कि यदि ऐसी कोशिशें जारी रहीं तो तिब्बत को लेकर विरोध और तेज हो सकता है. साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को पहले से अधिक समर्थन मिलने की संभावना भी बढ़ सकती है.
दलाई लामा के भतीजे ने कही बड़ी बात
14वें दलाई लामा के भतीजे खेद्रूब थोंडुप ने ‘द तिब्बत एक्सप्रेस’ में प्रकाशित अपने लेख में चीन की नीति की आलोचना की है. उन्होंने लिखा कि बीजिंग लंबे समय से दलाई लामा के साथ औपचारिक बातचीत से बचता रहा है. उनके अनुसार यह स्थिति किसी रणनीतिक उलझन की वजह से नहीं है, बल्कि चीनी नेतृत्व जानबूझकर समय बिताने की नीति अपना रहा है.
थोंडुप का मानना है कि चीन को उम्मीद है कि दलाई लामा के बाद वह उत्तराधिकार की प्रक्रिया को अपने नियंत्रण में लेकर तिब्बत के सवाल को कमजोर कर सकेगा. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी सोच से भले कुछ समय के लिए नियंत्रण हासिल हो जाए, लेकिन इसके दूरगामी नतीजे चीन के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हो सकते हैं.
वैधता को लेकर चीन की चिंता
खेद्रूब थोंडुप के अनुसार, बीजिंग को आशंका है कि अगर वह दलाई लामा से बातचीत शुरू करता है तो इससे उन्हें राजनीतिक मान्यता मिल सकती है. यह चीन के उस आधिकारिक रुख के विपरीत होगा, जिसमें दलाई लामा को अक्सर अलगाववादी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है.
उन्होंने यह भी कहा कि चीनी नेतृत्व को इस बात का डर है कि तिब्बत को किसी भी प्रकार की अतिरिक्त छूट या स्वायत्तता देने से दूसरे अल्पसंख्यक समुदायों और क्षेत्रों की मांगें भी मजबूत हो सकती हैं. इससे चीन की केंद्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है.
अगला दलाई लामा तय करने की मंशा?
थोंडुप ने अपने लेख में आरोप लगाया कि चीन धार्मिक नेतृत्व के अगले चरण को भी नियंत्रित करना चाहता है. उनका कहना है कि बीजिंग ऐसी व्यवस्था के जरिए अगले दलाई लामा के चयन में भूमिका तय करना चाहता है, जिससे धार्मिक मामलों में अपने अधिकार को और मजबूत दिखाया जा सके.
तीन मान्यताओं पर टिकी है ‘इंतजार की नीति’
थोंडुप के मुताबिक, बीजिंग की पूरी रणनीति तीन प्रमुख धारणाओं पर आधारित है. पहली, दलाई लामा की अनुपस्थिति में निर्वासन में रहने वाला तिब्बती समुदाय कमजोर और विभाजित हो जाएगा. दूसरी, सरकार समर्थित किसी उत्तराधिकारी को आगे लाकर निर्वासित तिब्बतियों द्वारा स्वीकार किए गए उत्तराधिकारी की वैधता को चुनौती दी जा सकेगी. तीसरी, दलाई लामा के बाद वैश्विक स्तर पर तिब्बत मुद्दे में रुचि कम हो जाएगी.
धार्मिक मान्यता सबसे बड़ी चुनौती
उन्होंने कहा कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले तिब्बती बौद्ध संभवतः सरकार द्वारा नियुक्त किसी दलाई लामा को स्वीकार नहीं करेंगे. ऐसी स्थिति में चीन की योजना को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पाएगा और उसके अधिकार संबंधी दावे भी कमजोर पड़ सकते हैं.
उल्टा पड़ सकती है बीजिंग की रणनीति
थोंडुप ने चेतावनी दी कि उत्तराधिकार को लेकर किसी प्रकार का विवाद तिब्बत के समर्थन को कम करने के बजाय और बढ़ा सकता है. उनका कहना है कि यदि किसी धार्मिक प्रक्रिया को जबरन नियंत्रित करने की कोशिश की गई तो लोगों में असंतोष बढ़ सकता है और तिब्बती समाज चीन से और अधिक दूरी बना सकता है.
अंतरराष्ट्रीय छवि पर भी पड़ सकता है असर
उन्होंने कहा कि इस नीति के जरिए चीन को भले अल्पकालिक लाभ दिखाई दे रहा हो, लेकिन दीर्घकाल में इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है. इसमें स्थिरता पर असर पड़ने के साथ-साथ वैश्विक मंच पर देश की साख को नुकसान पहुंचने की आशंका भी शामिल है.
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तिब्बतियों और दुनिया के लिए क्या संदेश?
खेद्रूब थोंडुप ने कहा कि निर्वासन में रह रहे तिब्बतियों के लिए अभी से उत्तराधिकार से जुड़ी तैयारियां करना और संगठनात्मक एकता बनाए रखना बेहद जरूरी होगा. वहीं अंतरराष्ट्रीय समुदाय को धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक संरक्षण से जुड़े मुद्दों पर लगातार सक्रिय रहना चाहिए, ताकि तिब्बत से जुड़े सवालों को कमजोर करने की किसी भी रणनीति को सफल न होने दिया जा सके.
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-भारत एक्सप्रेस
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