44 साल से नोएडा में बंगाल की संस्कृति संजो रही कालीबाड़ी
Noida Kalibari Durga Puja: नोएडा की भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच सेक्टर-26 स्थित कालीबाड़ी बंगाल की संस्कृति और परंपराओं को संजोने का एक खास केंद्र है. दुर्गा पूजा के दौरान यहां का नजारा बदल जाता है. सजा हुआ पंडाल, मां दुर्गा की प्रतिमा, ढाक की आवाज, धुनुची नृत्य और भोग की खुशबू पूरे परिसर को उत्सव के रंग में रंग देते हैं. दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले बंगाली परिवारों के लिए यह जगह अपनी जड़ों से जुड़ने का मौका है. यही वजह है कि पूजा के दिनों में इसे ‘मिनी कोलकाता’ कहा जाता है.
नोएडा दुर्गा पूजा समिति इस साल भी उत्सव मना रही है. 15 से 21 अक्टूबर 2026 तक आयोजित इस महोत्सव का पंडाल ‘ग्राम बांग्ला’ यानी ग्रामीण बंगाल की थीम पर तैयार किया गया है. मिट्टी और कच्चे घरों की झलक के जरिए बंगाल के गांवों को दर्शाया गया है. इस पहल का मकसद नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराना भी है. मां दुर्गा की प्रतिमा को पारंपरिक ‘डाकेर साज’ शैली में सजाया गया है, जिसके लिए कोलकाता से कलाकार बुलाए जाते हैं.
कुछ परिवारों की पहल से हुई शुरुआत
नोएडा की स्थापना 1976 में हुई थी. उस समय शहर धीरे-धीरे विकसित हो रहा था. यहां रहने वाले कुछ बंगाली परिवारों ने अपनी भाषा, संस्कृति और त्योहारों को आगे बढ़ाने के लिए एक साझा मंच बनाने की पहल की. इसका उद्देश्य समुदाय को एकजुट करना और आने वाली पीढ़ियों तक परंपराओं को पहुंचाना था.
अक्टूबर 1983 में नोएडा क्लब, सेक्टर-27 में पहली दुर्गा पूजा आयोजित की गई. यह आयोजन आगे चलकर शहर की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा बन गया.
इस पहल को स्थायी रूप देने के लिए 1982 में नोएडा बंगाली सांस्कृतिक संघ (NBCA) की स्थापना हुई. फरवरी 1984 में इसका पंजीकरण कराया गया. संस्था का उद्देश्य धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं को बढ़ावा देने के साथ समाज सेवा और आपसी भाईचारे को मजबूत करना था.
मंदिर निर्माण से शुरू हुई नियमित पूजा
मई 1985 में नोएडा प्राधिकरण ने सेक्टर-26 में NBCA को जमीन आवंटित की. 16 अगस्त 1986 को भूमिपूजन हुआ और नई दिल्ली स्थित रामकृष्ण मिशन के सचिव स्वामी स्वानंदजी महाराज ने मंदिर निर्माण की नींव रखी.
उसी साल मंदिर के भूतल का निर्माण पूरा हुआ. 8 नवंबर को काली पूजा के अवसर पर मां काली की प्रतिमा स्थापित की गई और नियमित पूजा-अर्चना शुरू हुई. वर्ष 1989 में मंदिर में शिवलिंग स्थापित किया गया. बाद में पहली मंजिल का निर्माण पूरा हुआ. 13 मई 1994 को पश्चिम बंगाल के कृष्णानगर के कलाकार परेश पॉल की बनाई अष्टधातु की मां काली की नई प्रतिमा स्थापित की गई.
धीरे-धीरे कालीबाड़ी धार्मिक आयोजनों के साथ समुदाय के मेल-मिलाप का भी प्रमुख केंद्र बन गई. आज इससे 2,000 से अधिक बंगाली परिवार जुड़े होने की जानकारी है.
पूजा के साथ बंगाल के खानपान और कला का संगम
कालीबाड़ी में दुर्गा पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है. यहां भोग वितरण के साथ मंदिर की कैंटीन में बंगाली व्यंजन भी मिलते हैं. शाम की आरती के बाद संगीत, नृत्य और नाटक जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं. इन कार्यक्रमों के जरिए बंगाल की कला और परंपराओं की झलक देखने को मिलती है.
पूजा के दौरान बुजुर्ग अपनी परंपराओं से जुड़ते हैं, युवा सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं और बच्चे अपनी विरासत को करीब से समझते हैं. वहीं, दूसरे समुदायों के लोग भी इन आयोजनों में शामिल होकर बंगाल की संस्कृति से परिचित होते हैं.
संस्था की गतिविधियां पूरे साल जारी रहती हैं. पूजा के दौरान मिलने वाले दान और अन्य संसाधनों का इस्तेमाल मंदिर के रखरखाव तथा सामाजिक और धर्मार्थ कार्यों में किया जाता है.
बदलते नोएडा में संस्कृति की पुरानी पहचान
चार दशक से अधिक समय में नोएडा का स्वरूप काफी बदल चुका है. शहर में आबादी बढ़ी है और देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग यहां आकर बसे हैं. इस बदलाव के बीच कालीबाड़ी बंगाली समुदाय को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखने में अहम भूमिका निभा रही है.
1983 में एक छोटे आयोजन से शुरू हुई दुर्गा पूजा की परंपरा 2026 में अपने 44वें वर्ष में पहुंच चुकी है. हर साल सजता पंडाल और पूजा में जुटने वाली भीड़ इस परंपरा के प्रति लोगों के जुड़ाव को दिखाती है.
ये भी पढ़ें- दिवाली से पहले योगी सरकार का धमाका! यूपी के कर्मचारियों के बोनस और DA पर आई सबसे बड़ी खुशखबरी
नोएडा कालीबाड़ी की कहानी उन लोगों के प्रयासों की कहानी है, जिन्होंने अपने शहर में रहते हुए अपनी संस्कृति को जीवित रखने का रास्ता चुना. आज यह स्थान पूजा का केंद्र होने के साथ बंगाल की परंपराओं, सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है.
-भारत एक्सप्रेस
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.






