Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में मद्रास हाईकोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले को बरकरार रखते हुए साफ कर दिया है कि हिंदू धर्म से इस्लाम में धर्म परिवर्तन करने वाला व्यक्ति सिर्फ इसी आधार पर पिछड़ा वर्ग (मुस्लिम) कोटे का लाभ नहीं ले सकता. तमिलनाडु सरकार के 2024 के एक आदेश को रद्द करने वाले इस फैसले ने जाति, आस्था और सकारात्मक कार्रवाई (affirmative action) के बीच के जटिल संबंधों पर फिर से चर्चा छेड़ दी है.
फैसला क्या कहता है?
अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि हिंदू सामाजिक व्यवस्था से गैर-हिंदू सामाजिक व्यवस्था में जाने वाला व्यक्ति अपने पूर्व-परिवर्तन की सामाजिक पिछड़ापन को नए धर्म में स्वतः नहीं ले जा सकता. जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने कहा कि धर्म परिवर्तन मात्र से कोई व्यक्ति राज्य द्वारा अधिसूचित सात पिछड़े मुस्लिम समुदायों में से किसी एक का सदस्य नहीं बन जाता. पूर्व जाति या समुदाय की स्थिति को मुस्लिम पिछड़ा वर्ग श्रेणी में स्वतः स्थानांतरित नहीं किया जा सकता.
यह फैसला सिर्फ कानूनी तकनीकी बात नहीं है. यह आरक्षण की संवैधानिक नींव को दोहराता है. अनुच्छेद 16(4) के तहत आरक्षण उन पिछड़े वर्गों के लिए है जो किसी विशेष सामाजिक व्यवस्था में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रखते. जब व्यक्ति उस सामाजिक व्यवस्था से बाहर निकल जाता है, तो उस व्यवस्था से जुड़ी पिछड़ापन की कानूनी मान्यता भी समाप्त हो जाती है.
तीन महत्वपूर्ण पहलू
पहला, यह फैसला अनुसूचित जाति (SC) से जुड़े पिछले निर्णयों से आगे जाता है. SC स्थिति के लिए संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 स्पष्ट रूप से हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म तक सीमित है. लेकिन अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के मामले में ऐसी कोई स्पष्ट राष्ट्रीय सूची या आदेश नहीं है. इसलिए OBC स्थिति अधिक तरल है. इस फैसले ने पहली बार बड़े पैमाने पर OBC आरक्षण और धर्म परिवर्तन के संबंध को संबोधित किया है, जो भारतीय आबादी और आरक्षण पाई का बड़ा हिस्सा है.
दूसरा, अदालत ने आकलन की प्रकृति पर सवाल खड़ा किया है. अगर पूर्व-परिवर्तन की स्थिति पर्याप्त नहीं है, तो नए धर्म में पिछड़ापन कैसे साबित होगा? कई राज्यों में कुछ मुस्लिम समुदायों को OBC सूची में शामिल किया गया है. क्या नया फैसला नए समुदायों को शामिल करने की प्रक्रिया को और कठिन बना देगा? यह स्पष्टता अभी बाकी है.
तीसरा, और सबसे महत्वपूर्ण, कानूनी बहस भले ही एक रेखा खींच दी गई हो, लेकिन सामाजिक बहस अभी भी अधूरी है. 2006 की सच्चर समिति ने मुस्लिम समुदाय के बड़े हिस्से की सामाजिक-आर्थिक कमजोरियों को रेखांकित किया था. 2007 की रंगनाथ मिश्रा आयोग ने SC स्थिति को धर्म-निरपेक्ष बनाने की सिफारिश की थी. 2008 की राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट में भी पाया गया था कि ईसाई और इस्लाम में धर्मांतरित दलित आर्थिक वंचना, व्यावसायिक अलगाव और सामाजिक अलगाव का सामना करते रहते हैं.
कानूनी स्थिति बनाम सामाजिक वास्तविकता
यहीं पर असली तनाव है. कानूनी रूप से धर्म परिवर्तन के साथ जाति-आधारित आरक्षण का दावा समाप्त हो जाता है, लेकिन सामाजिक वास्तविकता में कई लोग अपनी हाशिए की स्थिति से मुक्त नहीं हो पाते. जाति सिर्फ धार्मिक व्यवस्था का उत्पाद नहीं है; यह सामाजिक व्यवहार, आर्थिक अवसर और सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों में गहरी जड़ें जमाए हुए है. इसलिए कानूनी स्पष्टता के बावजूद, marginalisation का अनुभव जारी रहता है.
यह फैसला polarising दृष्टिकोणों को और तेज कर सकता है. एक तरफ वे लोग हैं जो कहते हैं कि आरक्षण को धर्म-आधारित नहीं बनाया जा सकता और धर्म परिवर्तन के साथ पुरानी पहचान छोड़ देनी चाहिए. दूसरी तरफ वे हैं जो तर्क देते हैं कि सामाजिक पिछड़ापन धर्म बदलने से गायब नहीं होता, इसलिए जरूरतमंदों को सहायता जारी रहनी चाहिए.
आगे का रास्ता
इस मुद्दे पर व्यापक और सूक्ष्म बहस की जरूरत है. आरक्षण की नीति को सिर्फ कानूनी तकनीकीताओं पर नहीं, बल्कि वास्तविक सामाजिक-आर्थिक संकेतकों पर आधारित करना चाहिए. साथ ही, यह भी सुनिश्चित करना होगा कि आरक्षण का दुरुपयोग न हो और वास्तव में वंचित वर्ग तक लाभ पहुंचे.
सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी सीमा रेखा खींच दी है. अब सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र को इस रेखा के इर्द-गिर्द अधिक nuance और समझदारी के साथ आगे बढ़ना होगा. जाति, आस्था और न्याय का यह त्रिकोण अभी भी कई अनुत्तरित प्रश्नों से भरा हुआ है.
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-भारत एक्सप्रेस
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