Russian Maslenitsa Tradition Like Dussehra: शरद ऋतु की विदाई और उत्सवों की बहार के बीच भारत में जब दशहरे का पावन पर्व आता है, तो आकाश आतिशबाजी और जयकारों से गूंज उठता है. विशालकाय रावण के पुतले धू-धू कर जलते हैं और संदेश साफ होता है. अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की शाश्वत विजय. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हजारों मील दूर, बर्फीली हवाओं के देश रूस में भी बिल्कुल दशहरे जैसा ही एक त्योहार मनाया जाता है, जहां विशाल पुतले को अग्नि के हवाले कर उत्सव का समापन होता है?
रूस में इस सदियों पुराने लोकपर्व को ‘मस्लेनित्सा’ (Maslenitsa) कहा जाता है. जहां भारत में विजयादशमी पर रावण दहन अहंकार और बुराई के अंत का प्रतीक है, वहीं रूस में पुआल से बने पुतले को जलाकर कड़ाके की ठंड व अंधेरी सर्दियों को विदाई दी जाती है और नई शुरुआत व वसंत का स्वागत किया जाता है.
क्या है मस्लेनित्सा की 400 साल पुरानी विरासत? (Dussehra and Russian Festival Connection)
- मस्लेनित्सा स्लाविक परंपरा और ईसाई मान्यताओं से जुड़ा एक अत्यंत प्राचीन सांस्कृतिक उत्सव है, जिसका लिखित इतिहास 16वीं सदी से मिलता है.
- यह उत्सव पूरे एक सप्ताह तक चलता है, जो ईसाई उपवास (लेंट) शुरू होने से ठीक पहले आता है.
- इसकी तारीखें हर साल ईस्टर के कैलेंडर के अनुसार बदलती हैं. वर्ष 2026 में यह उत्सव 16 से 22 फरवरी तक धूमधाम से मनाया गया था.
- पारंपरिक रूप से मक्खन, दूध और अंडों से बने खास पैनकेक खाने की वजह से इसे ‘पैनकेक वीक’ या ‘बटर वीक’ भी कहा जाता है.
‘सूरज’ जैसे सुनहरे पैनकेक (Dussehra jaise videshi tyohar)
इस उत्सव के दो सबसे बड़े आधार हैं सूरज के रूप में ‘ब्लिनी’ (रूसी पैनकेक) और अंतिम दिन होने वाला पुतला दहन. रूसी संस्कृति में पैनकेक केवल एक व्यंजन नहीं है. गोल, गर्म और सुनहरा पैनकेक सीधे तौर पर चमकते सूरज और नई शुरुआत का प्रतीक माना जाता है. इसे कहीं शहद और मीठी बेरीज के साथ परोसा जाता है, तो कहीं मशरूम और नमकीन भरावन के साथ.
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त्योहार के अंतिम दिन यानी ‘फॉरगिवनेस संडे’ को खुले मैदान में जमा होकर लोग पुआल से बने ‘लेडी मस्लेनित्सा’ के पुतले को आग के हवाले करते हैं. यह अग्नि पुरानी नकारात्मकता, ठंड और आलस को भस्म कर जीवन में नई ऊष्मा के आगमन का ऐलान करती है.
7 दिनों का दिलचस्प ताना-बाना
- सोमवार (स्वागत): पुआल का पुतला बनाने की शुरुआत और घरों में गरमा-गरम पैनकेक पकना शुरू.
- मंगलवार (खेल-कूद): बर्फीली ढलानों पर स्लेजिंग और युवाओं के बीच रिश्तों की तलाश.
- बुधवार (सास की दावत): दामाद का अपनी सास के घर जाकर स्वादिष्ट पैनकेक का लुत्फ उठाना.
- गुरुवार (खुला मेला): कामकाज छोड़कर बाहर निकलना, घुड़सवारी, मुक्केबाजी और लोकनृत्य.
- शुक्रवार (सास की वापसी दावत): सास का दामाद के घर आना और सत्कार स्वीकार करना.
- शनिवार (कुटुंब मिलन): ननद, भाभी और परिवार की महिलाओं का साथ बैठकर बातें व भोजन करना.
- रविवार (माफी और विदाई): एक-दूसरे से सालभर की गलतियों की माफी मांगना और पुतले को जलाकर सर्दियों को हमेशा के लिए विदा करना.
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संस्कृतियों की साझा डोर (Dussehra Ravan Dahan vs Russian Effigy Burning)
सरहदें, भाषाएं और मौसम भले ही बदल जाएं, लेकिन अंधेरे को मिटाकर रोशनी की ओर बढ़ने की मानवीय चाहत हर कोने में एक जैसी है. भारत का दशहरा जहां आसुरी प्रवृत्तियों को जलाकर धर्म की लौ जलाता है, वहीं रूस का मस्लेनित्सा कड़कड़ाती ठंड की विदाई कर प्रकृति के नए जीवन का उत्सव मनाता है. आग की लपटों में पुतले का स्वाहा होना इस बात का सबूत है कि दुनिया चाहे कितनी भी अलग हो, अंत में हर सभ्यता पुराने को त्यागकर एक नई और उजली शुरुआत की ही कामना करती है.
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