ग्वालियर में दशहरे पर शस्त्र पूजन
MP News: दशहरा और विजयदशमी के अवसर पर देशभर की तरह ग्वालियर में भी उत्साह और श्रद्धा का माहौल देखने को मिला. शहर की ऐतिहासिक गंगादास की बड़ी शाला, जिसे गौशाला के नाम से भी जाना जाता है, में हर साल की तरह इस बार भी पारंपरिक शस्त्र पूजन का भव्य आयोजन किया गया. कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साधु-संत, श्रद्धालु और स्थानीय नागरिक शामिल हुए. पूरे परिसर में धार्मिक अनुष्ठानों और वैदिक मंत्रों की गूंज सुनाई दी.
1857 के वीर नागा साधुओं को किया नमन
इस आयोजन की सबसे खास बात उन 745 नागा साधुओं की शहादत को याद करना रहा, जिन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान रानी लक्ष्मीबाई की सुरक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर कर दिए थे. बड़ी शाला परिसर में आज भी इन वीर संतों की स्मृति से जुड़े स्थल मौजूद हैं, जहां लोग पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं. दशहरे के मौके पर विशेष रूप से इन शहीद साधुओं को याद कर उन्हें सम्मान दिया गया.
पुराने अस्त्र-शस्त्रों की हुई विधिवत पूजा
अखाड़े के संतों ने परंपरागत रीति-रिवाजों के अनुसार ऐतिहासिक हथियारों का पूजन किया. वर्षों पुराने तलवारों, भालों और अन्य शस्त्रों के साथ पारंपरिक राजचिह्नों को भी वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूजा गया. संतों का मानना है कि यह परंपरा केवल धार्मिक आस्था ही नहीं बल्कि देश और धर्म की रक्षा के लिए दिए गए बलिदानों की याद भी दिलाती है.
आकर्षण का केंद्र बनी ऐतिहासिक तोप
दशहरे के आयोजन में एक प्राचीन तोप भी लोगों के आकर्षण का केंद्र रही. बताया जाता है कि यह तोप मुगल काल से जुड़ी हुई है और वर्षों से बड़ी शाला परिसर में सुरक्षित रखी गई है. परंपरा के अनुसार विजयदशमी पर पहले इसका पूजन किया जाता है और फिर इसे चलाने की रस्म निभाई जाती है. इस दौरान श्रद्धालुओं में खास उत्साह देखने को मिला.
अखाड़ों का मिलन और ध्वज पूजन
इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में विभिन्न अखाड़ों के संत भी शामिल हुए. निर्वाणी और दिगंबर परंपरा से जुड़े साधुओं ने अपने पवित्र ध्वजों और निशानों का पूजन किया. इसे अखाड़ों के मिलन का प्रतीक माना जाता है. धार्मिक वातावरण के बीच श्रद्धालुओं ने संतों का आशीर्वाद लिया और इस विरासत से जुड़ी परंपराओं को करीब से देखा.
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श्रद्धा और इतिहास का अनोखा संगम
गंगादास की बड़ी शाला में आयोजित यह कार्यक्रम केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह इतिहास, परंपरा और शौर्य की यादों को संजोने का अवसर भी बना. दशहरे के इस विशेष आयोजन में शामिल लोगों ने वीर संतों को नमन करते हुए उनकी गौरवगाथा को याद किया और आने वाली पीढ़ियों तक इस विरासत को पहुंचाने का संकल्प लिया.
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-भारत एक्सप्रेस
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