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एक नारा और बदल गई दुनिया, जानिए कैसे हर घर का हिस्सा बनी सिलाई मशीन

सिलाई मशीन की शुरुआत से लेकर आज तक का सफर तकनीक, रोजगार और आत्मनिर्भरता की एक दिलचस्प कहानी है. जानिए कैसे सिलाई मशीन घर-घर पहुंची और आज भी लाखों लोगों की आजीविका का सहारा बनी हुई है.

कभी सिलाई मशीन हर घर की जरूरत हुआ करती थी. घर की किसी महिला के पास मशीन हो, तो वह परिवार के कपड़े सिलने से लेकर पड़ोसियों के कपड़े तैयार करने तक, कई काम आसानी से कर लेती थी. धीरे-धीरे यही मशीन हजारों लोगों के लिए कमाई का जरिया बन गई. आज भले ही कपड़े सिलवाने का चलन बदल रहा हो, लेकिन सिलाई मशीन की अहमियत अब भी कम नहीं हुई है. इसके पीछे एक लंबा इतिहास है, जिसकी शुरुआत अमेरिका से हुई और जिसने भारत समेत पूरी दुनिया के कपड़ा उद्योग को नई दिशा दी.

27 अक्टूबर की तारीख इस इतिहास को याद करने का एक खास मौका है. साल 1811 में इसी दिन अमेरिका के न्यूयॉर्क के पिट्सटाउन में आइजेक मेरिट सिंगर का जन्म हुआ था. सिलाई मशीन को आम लोगों के घरों तक पहुंचाने में उनका बड़ा योगदान रहा.

जब सिलाई मशीन घर-घर पहुंचने लगी

सिलाई का काम मशीनों के आने से बहुत पहले से होता रहा है. पहले सुई और धागे की मदद से हाथों से कपड़े सिले जाते थे. यह काम मेहनत और समय दोनों मांगता था. सिंगर ने सिलाई मशीन को ज्यादा सुविधाजनक बनाया और उसके इस्तेमाल को आम लोगों के लिए आसान करने पर जोर दिया.

उनकी कंपनी ने मशीन बेचने के लिए किस्तों में भुगतान की सुविधा भी अपनाई. इससे उन परिवारों के लिए मशीन खरीदना आसान हुआ, जो एक बार में बड़ी रकम खर्च नहीं कर सकते थे. सिंगर का नारा था—हर घर में एक मशीन. यह विचार धीरे-धीरे लोकप्रिय होता गया और सिलाई मशीन अमेरिका से यूरोप होते हुए एशिया और अफ्रीका तक पहुंच गई.

हालांकि, सिलाई मशीन का आविष्कार किसी एक व्यक्ति की देन नहीं था. सिंगर से पहले वाल्टर हंट, एलियास होवे और फ्रांस के बार्थेलेमी थिमोनियर जैसे आविष्कारक भी इस दिशा में काम कर चुके थे. लेकिन सिंगर की मशीन अपने व्यावहारिक डिजाइन, घरेलू उपयोग की सुविधा और बिक्री के तरीके के कारण ज्यादा लोकप्रिय हुई.

इसका असर उनकी कंपनी के कारोबार पर भी दिखाई दिया. साल 1856 में कंपनी ने 2,564 मशीनें बनाईं. 1860 तक यह संख्या बढ़कर लगभग 13 हजार हो गई. बाद में कंपनी ने न्यू जर्सी के एलिजाबेथ में एक बड़ा उत्पादन केंद्र भी स्थापित किया.

सुई से शुरू हुई हजारों साल पुरानी कहानी

सिलाई मशीन का इतिहास समझने के लिए हमें उससे भी बहुत पीछे जाना होगा. इंसान हजारों साल से कपड़ों और दूसरे उपयोगी सामान को जोड़ने के लिए सुई का इस्तेमाल करता आया है. पुरातात्विक खोजों में करीब 32 हजार साल पुरानी हड्डी की सुइयों के प्रमाण मिले हैं. उस दौर में आज जैसी सिलाई मशीनों की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, लेकिन कपड़ों को जोड़ने और शरीर को ढकने की जरूरत तब भी थी.

समय के साथ सुई, धागे और कपड़े बनाने के तरीके बदलते गए. सिंधु घाटी सभ्यता में कपास के इस्तेमाल और वस्त्र निर्माण के प्रमाण मिलते हैं. भारत में कपड़ा बुनने की कला ने बहुत पहले ही मजबूत पहचान बना ली थी. बाद में यहां के सूती कपड़े और रेशमी वस्त्र दूर-दूर तक मशहूर हुए.

यही वजह थी कि भारत और चीन के कपड़ों की यूरोप में भी काफी मांग रही. यूरोपीय व्यापारी केवल मसालों के लिए ही एशिया नहीं आते थे, बल्कि यहां के उम्दा कपड़ों और रेशम का आकर्षण भी उन्हें खींचता था.

ढाका की मलमल, जिसकी दुनिया थी दीवानी

भारतीय कपड़ा उद्योग की चर्चा हो और ढाका की मलमल का नाम न आए, ऐसा हो नहीं सकता. अपनी बारीकी और हल्केपन के लिए मशहूर इस कपड़े की ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी.

मलमल की महीन बुनाई को लेकर कई लोककथाएं भी प्रचलित हैं. ऐसी ही एक कहानी मुगल बादशाह औरंगजेब और उनकी बेटी जेबुन्निसा से जुड़ी है. कहा जाता है कि जेबुन्निसा ने बेहद महीन मलमल की साड़ी पहनी थी. कपड़ा इतना हल्का था कि बादशाह को लगा कि उनकी बेटी ने ठीक से कपड़े नहीं पहने हैं. जवाब में उन्होंने बताया कि उन्होंने साड़ी की कई परतें लपेट रखी थीं. यह कहानी भले ही लोककथा के रूप में सुनाई जाती हो, लेकिन इससे ढाका की मलमल की महीन बुनाई का अंदाजा जरूर मिलता है.

ब्रिटिश शासन के दौरान भारतीय हस्तकरघा उद्योग को भारी नुकसान पहुंचा. ब्रिटेन की मिलों में बड़े पैमाने पर तैयार होने वाले कपड़ों को भारतीय बाजार में बढ़ावा मिला, जबकि पारंपरिक बुनकरों को मुश्किलों का सामना करना पड़ा. ढाका की मलमल जैसी प्रसिद्ध कला भी इस बदलाव से प्रभावित हुई. बाद के वर्षों में बांग्लादेश में इस पारंपरिक बुनाई को फिर से जीवित करने की कोशिशें हुईं.

मशीनों ने बदली दर्जियों की दुनिया

सिलाई मशीन के लोकप्रिय होने के साथ ही कपड़े सिलने का काम भी नए रूप में सामने आया. जो काम पहले पूरी तरह हाथों से होता था, वह अब कम समय में किया जाने लगा. इससे कपड़ों की सिलाई और उत्पादन की रफ्तार बढ़ी. दर्जियों के लिए भी काम के नए अवसर पैदा हुए.

भारत में दर्जी समुदाय का कपड़ों की सिलाई से पुराना रिश्ता रहा है. ‘दर्जी’ शब्द को आम तौर पर फारसी मूल के शब्द से जुड़ा माना जाता है. यह पेशा अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोगों के बीच फैला हुआ है. समय के साथ दर्जी केवल कपड़े सिलने वाले कारीगर नहीं रहे, बल्कि उन्होंने बदलते फैशन, नाप और डिजाइन के हिसाब से अपनी कला को भी विकसित किया.

दिलचस्प बात यह है कि सिलाई मशीन और उससे जुड़े उद्योग के विकास में पुरुष आविष्कारकों की भूमिका प्रमुख रही, लेकिन घरों में मशीन को लोकप्रिय बनाने और उससे काम करने में महिलाओं की बड़ी भूमिका थी. कई महिलाओं के लिए सिलाई घर बैठे आमदनी कमाने का साधन बनी. कपड़ों की मरम्मत, बच्चों के परिधान तैयार करने और दूसरे लोगों के कपड़े सिलने जैसे कामों से परिवार की आर्थिक मदद भी होने लगी.

औद्योगिक क्रांति और भारतीय कपड़ा उद्योग

यूरोप में औद्योगिक क्रांति के बाद कपड़ा उत्पादन का तरीका तेजी से बदला. बिजली, नई मशीनों और पावरलूम की मदद से कम समय में बड़ी मात्रा में कपड़े तैयार होने लगे. दूसरी ओर, भारत के पारंपरिक हथकरघा बुनकरों को मशीनों से बने सस्ते कपड़ों के साथ मुकाबला करना पड़ा.

इस बदलाव का असर केवल कारोबार तक सीमित नहीं था. इससे कारीगरों की आजीविका, स्थानीय अर्थव्यवस्था और सदियों पुरानी बुनाई की परंपराएं भी प्रभावित हुईं. फिर भी भारतीय हस्तकरघा और पारंपरिक वस्त्रों की पहचान पूरी तरह खत्म नहीं हुई. आज भी देश के अलग-अलग हिस्सों में बुनकर और कारीगर अपनी कला को आगे बढ़ा रहे हैं.

आज भी रोजगार और आत्मनिर्भरता का सहारा

आज सिलाई मशीन के कई आधुनिक रूप बाजार में मौजूद हैं. बिजली से चलने वाली मशीनों से लेकर कंप्यूटर आधारित औद्योगिक मशीनों तक, तकनीक ने इस काम को काफी बदल दिया है. कपड़ों की बड़ी फैक्ट्रियों में उत्पादन तेज हुआ है, तो घरों और छोटी दुकानों में सिलाई मशीन अब भी रोजमर्रा के काम का अहम हिस्सा है.

छोटे शहरों और गांवों में सिलाई का काम आज भी रोजगार का एक व्यावहारिक विकल्प है. कई लोग घर से ही कपड़े सिलकर या कपड़ों में बदलाव करके कमाई करते हैं. महिलाओं के लिए भी यह हुनर आत्मनिर्भर बनने का रास्ता खोलता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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