गुजरात के नमक के रेगिस्तानों और दूर-दराज के इलाकों में एक खामोश इंकलाब चल रहा है, जिसकी कमान युवा महिलाओं के हाथों में है. इन महिलाओं को प्यार से ‘सोलर महिलाएं’ कहा जाता है. पारंपरिक व्यवस्थाओं से दूर इन इलाकों में ये महिलाएं सिर्फ सोलर पैनल चलाना ही नहीं सीख रही हैं, बल्कि खुद तकनीक की मास्टर बनकर अपने समाज की तकदीर बदल रही हैं. SEWA, UNEP और ReNew जैसी संस्थाओं की मदद से नमक के खेतों (आगरिया) में काम करने वाली महिलाओं को सोलर पैनल और सोलर पंप ठीक करने की ट्रेनिंग दी जा रही है.
कठिन हालात और डीजल से महंगी होती खेती
कच्छ के लिटिल रण (Little Rann of Kutch) जैसे इलाकों में नमक बनाने का काम बेहद पसीना बहाने वाला और मौसम के मिजाज पर निर्भर होता है. मानसून में पानी भरने और बाकी महीनों में रेगिस्तान बन जाने वाले इस इलाके में परिवारों को जीने के लिए भारी संघर्ष करना पड़ता है. नमक के लिए पानी खींचने से लेकर रोशनी तक के लिए यहां बिजली की भारी किल्लत रहती है.
लंबे समय तक लोग इसके लिए डीजल पंपों पर निर्भर रहे, जिससे न सिर्फ जेब पर भारी खर्च पड़ता था बल्कि प्रदूषण और सप्लाई चेन की झंझट भी अलग से झेलनी पड़ती थी. ऐसे में सोलर एनर्जी ने इन परिवारों को उस जंजाल से बाहर निकाला है, जहां बार-बार डीजल ढोने की मजबूरी हुआ करती थी.
क्यों खास हैं ये महिला तकनीशियन?
जब घर के पास का कोई शख्स ही किसी तकनीकी खराबी को चुटकियों में सुलझा दे, तो जिंदगी कितनी आसान हो जाती है. रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2017 से गुजरात में एक सोलर वाटर पंप प्रोजेक्ट के जरिए लगभग 1,292 महिला नमक किसानों ने डीजल पंपों को छोड़कर सोलर सिस्टम अपनाए हैं.
इन महिला तकनीशियनों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे सिर्फ मशीनें नहीं सुधारतीं, बल्कि पूरे समुदाय को जोड़ती हैं. वे पैनलों की सफाई करने से लेकर छोटी-मोटी तकनीकी कमियों को दूर करने और फाइनेंस से जुड़ी जानकारी देने में माहिर हो चुकी हैं. जब कोई महिला हाथ में टूल्स लेकर किसी छत या पंप पर काम करती है, तो गांव की छोटी बच्चियों और परिवारों की वह पुरानी सोच भी बदलती है जिसमें तकनीक को सिर्फ पुरुषों का काम माना जाता था.
इस तरह की पहल ने यह साबित कर दिया है कि क्लाइमेट एक्शन और महिला सशक्तिकरण जब साथ मिलते हैं, तो बदलाव कितनी तेजी से आता है. नमक के मैदानों से उठी यह कहानी आज पूरे देश के लिए एक प्रेरणा बन चुकी है.
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-भारत एक्सप्रेस
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