समान नागरिक संहिता (UCC) का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में है. अलग-अलग राज्यों में इसे लेकर अलग राय देखने को मिल रही है. कोई इसे सामाजिक समानता की दिशा में बड़ा कदम बता रहा है तो कोई इसके असर और चुनौतियों पर चर्चा कर रहा है. भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों के तहत अनुच्छेद 44 में राज्य को सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करने की बात कही गई है. इसी विषय पर चर्चा के लिए भारत कलेक्टिव फाउंडेशन की ओर से एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें न्यायपालिका, राजनीति और कानून जगत की कई प्रमुख हस्तियों ने हिस्सा लिया.
कार्यक्रम में शामिल हुए कई प्रमुख चेहरे
इस आयोजन में सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस संजय करोल, राज्यसभा सांसद सुजीत कुमार, उत्तराखंड UCC समिति के सदस्य मनु गौड़ और सुप्रीम कोर्ट के कई वरिष्ठ वकील मौजूद रहे. कार्यक्रम के दौरान UCC के कानूनी, सामाजिक और संवैधानिक पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की गई.
जस्टिस संजय करोल ने रखे अपने विचार
जस्टिस संजय करोल ने कार्यक्रम में मौजूद लोगों की सक्रिय भागीदारी की सराहना की. उन्होंने कहा कि अपने गृह क्षेत्र में आकर हमेशा अच्छा महसूस होता है. UCC पर अपनी राय रखते हुए उन्होंने कहा कि एक समान कानून होने से सभी नागरिकों के लिए व्यवस्था स्पष्ट और समान हो सकती है. चर्चा के दौरान उन्होंने खाप पंचायतों, ट्रिपल तलाक और शाहबानो मामले का भी उल्लेख किया. उन्होंने उन कानूनी और सामाजिक चुनौतियों का जिक्र किया जिनका सामना अदालतों को ऐसे मामलों में करना पड़ा था.
अनुच्छेद 44 और बिहार का उदाहरण
अपने संबोधन में जस्टिस करोल ने अनुच्छेद 44 की प्रासंगिकता पर भी बात की. उन्होंने कहा कि अगर इसकी आवश्यकता को समझना हो तो बिहार जैसे राज्यों की सामाजिक परिस्थितियों को भी देखना चाहिए. उन्होंने छठ पर्व का जिक्र करते हुए समाज की विविधता और कानूनी समानता के बीच संतुलन की जरूरत बताई. उन्होंने लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े कानूनी पहलुओं पर भी चर्चा की और कहा कि ऐसा कानून देश की परिस्थितियों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाना चाहिए.
अंबेडकर के विचारों का भी हुआ जिक्र
दिल्ली हाई कोर्ट की वरिष्ठ वकील कीर्ति उप्पल ने कहा कि संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर भी समान नागरिक संहिता के महत्व को समझते थे. उनके अनुसार UCC का विचार केवल कानूनी बदलाव नहीं बल्कि एक व्यापक सामाजिक दृष्टिकोण से जुड़ा विषय है.
सांसद सुजीत कुमार ने साझा किए आंकड़े
राज्यसभा सांसद सुजीत कुमार ने बताया कि UCC को लेकर देशभर से बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी राय दी है. उनके मुताबिक लगभग 80 लाख लोगों ने सुझाव भेजकर इस विषय पर अपनी भागीदारी दर्ज कराई है. उन्होंने कहा कि इतने बड़े पैमाने पर लोगों की हिस्सेदारी इस मुद्दे के महत्व को दर्शाती है.
उत्तराखंड मॉडल पर मनु गौड़ का जोर
उत्तराखंड UCC समिति के सदस्य मनु गौड़ ने आयोजन के लिए आयोजकों का आभार जताया. उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में करीब पौने दो साल पहले समान नागरिक संहिता लागू की गई थी और ऐसा करने वाला वह देश का पहला राज्य बना. उन्होंने कहा कि भले ही लोग अलग-अलग धर्मों और परंपराओं से आते हों, लेकिन राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के लिए समान नागरिक संहिता महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. उन्होंने विवाह संबंधी विभिन्न धार्मिक परंपराओं का भी उल्लेख किया.
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था मामला
मनु गौड़ ने बताया कि जब उत्तराखंड सरकार ने UCC का मसौदा तैयार करने के लिए समिति बनाई थी, तब इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी. हालांकि अदालत ने उस याचिका को खारिज कर दिया था. उन्होंने यह भी कहा कि संविधान के तहत केंद्र और राज्य सरकार दोनों को कानून बनाने का अधिकार है. उत्तराखंड में UCC लागू करने से पहले गांवों और जिलों में व्यापक स्तर पर बैठकें आयोजित की गई थीं, जहां लोगों से सुझाव लिए गए थे.
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अब पूरे देश की निगाहें अगले कदम पर
फिलहाल कई राज्य समान नागरिक संहिता को लेकर विचार कर रहे हैं और भविष्य में इसे लागू करने की दिशा में कदम उठा सकते हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आजादी के करीब 79 साल बाद क्या पूरे देश में एक समान नागरिक संहिता लागू हो पाएगी या नहीं. आने वाले समय में इस मुद्दे पर राजनीतिक और कानूनी बहस और तेज होने की संभावना है.
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