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हवा से रोज बनेगा 1,000 लीटर पीने का पानी…! नोबेल विजेता की खोज से मिटेगी दुनिया की प्यास?

नोबेल पुरस्कार विजेता केमिस्ट ओमार याघी ने ऐसी तकनीक विकसित की है, जो हवा में मौजूद नमी से पीने का पानी बना सकती है. MOFs तकनीक पर आधारित बड़े सिस्टम रोजाना 1,000 लीटर तक पानी बनाने में सक्षम बताए जा रहे हैं, लेकिन भूजल संरक्षण को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं.

पानी की हर एक बूंद के लिए तरसती दुनिया के लिए विज्ञान ने एक ऐसा करिश्मा कर दिखाया है जो कभी सिर्फ साइंस-फिक्शन फिल्मों में दिखता था. नोबेल पुरस्कार विजेता केमिस्ट ओमार याघी (Omar Yaghi) और उनकी कंपनी ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है, जो सीधे हवा (वायुमंडल) से शुद्ध पीने का पानी निचोड़ सकती है. इसके बड़े सिस्टम रोजाना 1,000 लीटर तक पानी बनाने की क्षमता रखते हैं.

लेकिन इस चमत्कारी खोज के बीच एक बड़ा और कड़वा सवाल खड़ा हो गया है-क्या विज्ञान की यह कामयाबी हमें हमारे पानी के प्रति और ज्यादा लापरवाह बना देगी?

हवा से पानी: कैसे काम करता है यह ‘जादू’?

प्रोफेसर ओमार याघी ने MOFs (Metal-Organic Frameworks) नाम के एक विशेष मटीरियल का आविष्कार किया है. यह मटीरियल एक स्पंज की तरह काम करता है, जो रात के समय हवा में मौजूद नमी (Moisture) को सोख लेता है. इसके बाद, दिन में सूरज की थोड़ी सी गर्मी मिलते ही यह उस सोखे हुए पानी को छोड़ देता है, जिसे इकट्ठा कर फिल्टर कर लिया जाता है. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि यह तकनीक दुनिया के सबसे सूखे इलाकों और रेगिस्तानों में भी बिना बिजली के काम कर सकती है.

सिक्का का दूसरा पहलू: ‘जेवन्स पैराडॉक्स’ का खतरा

जब भी कोई नई तकनीक आती है, तो इंसानी फितरत है कि वह लापरवाह हो जाता है. अर्थशास्त्र में इसे ‘Jevons Paradox’ कहते हैं. इसका मतलब है कि जब हमें लगता है कि किसी चीज की सप्लाई असीमित (Unlimited) होने वाली है, तो हम उसे और तेजी से बर्बाद करने लगते हैं.

वैज्ञानिक हवा से पानी तो बना रहे हैं, लेकिन हमारे पैरों के नीचे का ग्राउंडवाटर (भूजल) तेजी से खत्म हो रहा है. अगर हम यह सोचकर बैठ गए कि “अब तो हवा से पानी मिल ही जाएगा, तो पानी बचाने की क्या जरूरत है?” तो यह मानव इतिहास की सबसे बड़ी भूल होगी.

न्यूज़ एडिटर की कलम से: शुरुआत हमसे होगी

हवा से पानी बनाने की तकनीक एक बेहतरीन ‘बैकअप प्लान’ या सप्लीमेंट हो सकती है, लेकिन यह हमारे जल स्रोतों का विकल्प नहीं है. करोड़ों सालों में बने भूजल (Groundwater) को विज्ञान रातों-रात रिप्लेस नहीं कर सकता.
सड़क पर बहता हुआ नल, टपकती हुई पाइपलाइन या ब्रश करते समय खुला छोड़ दिया गया पानी-ये भले ही छोटी बातें लगें, लेकिन बूंद-बूंद से ही घड़ा भरता है और बूंद-बूंद से ही खाली भी होता है. पानी बचाना सिर्फ वैज्ञानिकों या सरकारों का काम नहीं है, यह हमारी आपकी व्यक्तिगत जिम्मेदारी है. अगली बार जब पानी बर्बाद होते देखें, तो आगे न बढ़ें, हाथ बढ़ाएं और उसे रोकें.

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-भारत एक्सप्रेस



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