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दुनिया की अनोखी ‘चलती सड़क’: बिना कदम बढ़ाए ऑफिस पहुंचा देता है यह एस्केलेटर, जानें हांगकांग के इस इंजीनियरिंग करिश्मे की कहानी

क्या आपने कभी ऐसी सड़क देखी है जो खुद चलती हो? हांगकांग में दुनिया का सबसे लंबा आउटडोर एस्केलेटर सिस्टम है, जो रोजाना 80 हजार लोगों को बिना थके उनकी मंजिल तक पहुंचाता है. भारत के पहाड़ी शहरों के लिए यह एक बेहतरीन मॉडल हो सकता है.

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Hong Kong Escalator Road: जरा कल्पना कीजिए कि आप सुबह-सुबह अपने घर के दरवाज़े से बाहर कदम रखते हैं और दफ्तर जाने के लिए आपको न तो अपनी कार की चाबी उठानी पड़ती है, न ही मेट्रो की भीड़ में धक्के खाने पड़ते हैं. आपके घर के ठीक बगल से एक सड़क गुज़र रही है, जो खुद-ब-खुद चल रही है. आप बस उस पर खड़े हो जाते हैं, अपना मोबाइल चेक करते हैं या आराम से अखबार पढ़ते हैं और बिना एक भी कदम बढ़ाए सीधे अपने ऑफिस के केबिन तक पहुँच जाते हैं. सुनने में यह किसी हॉलीवुड की साइंस-फिक्शन फिल्म का सीन लग सकता है, लेकिन हांगकांग के लोगों के लिए यह रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है.

दुनिया का सबसे बड़ा एस्केलेटर सिस्टम

हांगकांग में दुनिया का सबसे लंबा आउटडोर कवर्ड एस्केलेटर सिस्टम है, जिसे वहां के लोग ‘शहर की लाइफलाइन’ कहते हैं. करीब 800 मीटर लंबे इस सिस्टम पर खड़े होकर जब आप सफर करते हैं, तो पूरा शहर किसी सिनेमाई रील की तरह आपकी आंखों के सामने से गुजरता है.

एक तरफ बरसों पुरानी छोटी दुकानें दिखती हैं, तो दूसरी तरफ चकाचौंध से भरे आधुनिक रेस्टोरेंट्स. जैसे-जैसे आप ऊपर की ओर बढ़ते हैं, सड़कों पर फंसी टैक्सियों का शोर पीछे छूटता जाता है और ताज़ी हवा का अहसास होने लगता है.

पहाड़ बने मुसीबत, तब मिला अनोखा समाधान

दरअसल, हांगकांग दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले शहरों में से एक है. 1980 के दशक तक यहां की पहाड़ियों पर रहने वाले लोगों के लिए नीचे शहर तक आना एक दुःस्वप्न जैसा था. संकरी गलियों में गाड़ियां घंटों फंसी रहती थीं.

नई सड़कें बनाने की जगह नहीं थी, तब इंजीनियरों ने एक क्रांतिकारी रास्ता निकाला, एक ऐसी सड़क जो खुद चले. इसे बनाने में उस वक्त करीब 240 मिलियन हांगकांग डॉलर खर्च हुए. हालांकि शुरू में इसे ‘सफेद हाथी’ कहा गया, लेकिन आज यह दुनिया के लिए एक मिसाल है.

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समय के साथ बदलती है अपनी चाल

इस सिस्टम की सबसे दिलचस्प बात इसकी टाइमिंग है. यह 24 घंटे एक ही तरफ नहीं चलता. सुबह 6 से 10 बजे तक यह ऊपर से नीचे की तरफ चलता है ताकि लोग आसानी से दफ्तर पहुँच सकें. वहीं सुबह 10 बजे के बाद आधी रात तक इसकी दिशा बदल दी जाती है और यह नीचे से ऊपर की ओर चलने लगता है, ताकि दिनभर के थके-हारे लोग बिना मेहनत किए अपने घर पहुँच सकें.

क्या भारत के लिए है यह कोई सबक?

इस ‘चलती सड़क’ ने न सिर्फ ट्रैफिक जाम खत्म किया, बल्कि उस इलाके की अर्थव्यवस्था भी बदल दी. आज यहाँ रोज़ाना 80 हज़ार से ज़्यादा लोग सफर करते हैं.

हालांकि दुनिया में कई जगह ऐसे प्रयोग फेल भी हुए, जैसे पेरिस का ‘हाई-स्पीड’ वॉकवे जहाँ लोग रफ्तार के कारण गिरकर चोटिल होने लगे थे. लेकिन हांगकांग का मॉडल सिखाता है कि असली विकास वो है जो आम आदमी का पसीना बचाए. भारत के पहाड़ी शहरों जैसे शिमला या नैनीताल के लिए यह तकनीक एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है.

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-भारत एक्सप्रेस



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