इनके प्रोटीन का केवल 4% हिस्सा ही पुराने डेटा से मेल खाता है.
समुद्र की अतल गहराइयों में जहां न तो सूर्य की रोशनी पहुंच पाती है और न ही जीवन के लिए जरूरी सामान्य पोषक तत्व मौजूद होते हैं, वहां जीवन किस रूप में सांस ले रहा है? इस रहस्य से पर्दा उठाते हुए वैज्ञानिकों ने प्रशांत महासागर की करीब 6,000 मीटर (6 किलोमीटर) गहरी तलहटी में वायरसों के विशाल और अज्ञात संसार की खोज की है. चीन की एक शोध टीम द्वारा क्लैरियन-क्लिपरटन जोन (Clarion-Clipperton Zone) की तलहटी से लिए गए गाद और मिट्टी के नमूनों के जीनोमिक विश्लेषण में 11,742 वायरस पाए गए, जिनमें से 11,662 वायरस पूरी तरह से नए हैं.
यह ऐतिहासिक शोध प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका ‘नेचर कम्युनिकेशंस’ (Nature Communications) में प्रकाशित हुआ है.
सिर्फ 4% प्रोटीन का पुराने डेटा से मिलान
शोधकर्ताओं ने पाया कि समुद्र की गहराई में मिले इन वायरसों का मौजूदा डेटाबेस से बहुत कम संबंध है. वैज्ञानिकों ने जब इन वायरसों में मौजूद प्रोटीन समूहों (जो वायरस की कार्यप्रणाली तय करते हैं) की विस्तृत जांच की, तो सामने आया कि इनके केवल करीब 4 फीसदी प्रोटीन का ही पुराने वैज्ञानिक डेटा से मिलान हुआ. इसका सीधा अर्थ यह है कि इस क्षेत्र में जैविक विविधता का ऐसा भंडार छिपा हुआ है जिससे आधुनिक विज्ञान अब तक पूरी तरह अनजान था.
इंसानों को नहीं, बैक्टीरिया को बनाते हैं निशाना
अध्ययन के मुताबिक, खोजे गए अधिकांश वायरस ‘कॉडोविरिसीट्स’ (Caudoviricetes) समूह से संबंधित हैं. इन वायरसों की शारीरिक संरचना में एक पूंछ जैसी बनावट होती है.
- ये वायरस इंसानों को सीधे संक्रमित करने वाले वायरसों से काफी अलग हैं और मुख्य रूप से समुद्र की तलहटी में मौजूद बैक्टीरिया पर हमला करते हैं.
- ये वायरस बैक्टीरिया के भीतर अपना जेनेटिक मटीरियल (आनुवंशिक सामग्री) डालकर उन्हें नष्ट करते हैं.

बैक्टीरिया के टूटने से जो जैविक तत्व और पोषक तत्व बाहर निकलते हैं, वे गहरे समुद्र के अन्य सूक्ष्मजीवों के लिए जीवनदायिनी आहार बनते हैं. इस प्रकार ये वायरस समुद्र में पोषक तत्वों के चक्र और पारिस्थितिक संतुलन (Ecological Balance) को सुचारु बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं.
डीप-सी माइनिंग से मंडराया इन पर संकट
क्लैरियन-क्लिपरटन जोन व्यावसायिक रूप से निकेल, कोबाल्ट और मैंगनीज जैसी बहुमूल्य धातुओं से समृद्ध माना जाता है. वैश्विक कंपनियां यहां बड़े पैमाने पर ‘डीप-सी माइनिंग’ (गहरे समुद्र में खनन) शुरू करने की तैयारी में हैं. वैज्ञानिकों ने गंभीर चिंता जताई है कि इस संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र को पूरी तरह समझे बिना यदि खनन की अनुमति दी गई, तो तलहटी में मौजूद इस अनूठी जैविक संपदा और पोषक तत्वों का चक्र हमेशा के लिए नष्ट हो सकता है.

संसार में पानी के 9 लाख प्रकार के जीव-जंतु
विज्ञान आज समुद्र की 6 किलोमीटर गहराई में हजारों नए सूक्ष्मजीवों और वायरसों की खोज कर रहा है, लेकिन सनातन धर्म के प्राचीन ग्रंथों और पुराणों में सृष्टि के भीतर जलचरों और सूक्ष्मजीवों की सटीक गणना सदियों पहले ही लिपिबद्ध कर दी गई थी.
धर्मग्रंथों के अनुसार, सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा द्वारा रचित इस संसार में समस्त प्राणियों को 84 लाख योनियों में वर्गीकृत किया गया है. मान्यता है कि प्रत्येक जीवात्मा अपने संचित कर्मफल के आधार पर ही अलग-अलग योनियों में जन्म लेती है और अंततः मनुष्य जीवन पाती है, जिसे सर्वश्रेष्ठ माना गया है.

धर्मग्रंथों में 84 लाख योनियों का जो कालजयी विभाजन दिया गया है, उसमें पानी के भीतर रहने वाले जीवों (जलचरों) की संख्या ठीक 9 लाख बताई गई है:
प्राणी / योनि का प्रकार | ग्रंथों के अनुसार संख्या
- पेड़-पौधे (स्थावर) 30 लाख
- कीड़े-मकोड़े (कृमि/सूक्ष्मजीव) 27 लाख
- पक्षी (नभचर) 14 लाख
- पानी के जीव-जंतु (जलचर) 9 लाख
- देवता, मनुष्य और पशु (थलचर) 4 लाख
- कुल योनियां 84 लाख
पुराणों के अनुसार, कलियुग में जब मनुष्य अपने कर्मों से भटकता है, तो उसे विभिन्न योनियों में भटकना पड़ता है. आज समुद्र की तलहटी में मिल रहे हजारों नए सूक्ष्मजीव और वायरस इस बात का वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत करते हैं कि जल के भीतर जीवन का विस्तार 9 लाख विभिन्न रूपों में फैला हुआ है, जिसकी थाह विज्ञान अब धीरे-धीरे ले पा रहा है.
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