Indian Press Blackout: 2 जुलाई 1986 का दिन भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में एक अनोखा दिन था. सुबह जब लोग अखबार पढ़ने के लिए उत्सुक थे, तो देश भर में अखबारों की दुकानों पर सन्नाटा पसरा हुआ. कोई अखबार नहीं छपा, कोई वितरण नहीं हुआ. यह कोई छुट्टी या प्राकृतिक आपदा नहीं थी, बल्कि मीडिया और राजीव गांधी सरकार के बीच टकराव का नतीजा था.
पृष्ठभूमि: वेतन बोर्ड और सरकार का फैसला
उस समय राजीव गांधी सरकार सत्ता में थी. वित्त मंत्री वी.पी. सिंह चौथे वेतन आयोग की रिपोर्ट पर काम कर रहे थे, जबकि प्रधानमंत्री राजीव गांधी मिजो पीस एकॉर्ड पर हस्ताक्षर कर रहे थे. ठीक उसी दिन, 1 जुलाई 1986 के इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने पर मुख्य खबर वेतन आयोग की बोनस से जुड़ी थी, लेकिन नीचे दाएं कोने में एक छोटा बॉक्स था जो अगले दिन की खबर दे रहा था: ‘कल अखबार नहीं निकलेगा’.
सरकार ने पत्रकारों और गैर-पत्रकार कर्मचारियों के वेतन निर्धारण के लिए एक वेज बोर्ड गठित किया था. इस बोर्ड ने कर्मचारियों के वेतन में अंतरिम 7.5% की बढ़ोतरी की सिफारिश की. सरकार ने इसे तुरंत लागू करने का फैसला लिया.
अखबार मालिकों का विरोध
अखबार मालिकों ने इस फैसले का तीखा विरोध किया. उनका तर्क था:
- सरकार ने एकतरफा फैसला लिया, उनकी राय नहीं ली गई.
- इससे छोटे और क्षेत्रीय अखबारों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा, कई बंद होने की कगार पर पहुंच सकते हैं.
- यह प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला है, क्योंकि इससे अखबारों की आर्थिक व्यवहार्यता प्रभावित होगी.
इंडियन न्यूजपेपर सोसाइटी (INS) ने पूरे देश में हड़ताल का आह्वान किया. नतीजा? 2 जुलाई 1986 को देश भर की प्रेस ठप हो गई. यह मालिकों द्वारा सरकार के खिलाफ एकजुट प्रदर्शन था.
राजीव गांधी युग में मीडिया-सरकार संबंध
राजीव गांधी की सरकार “मिस्टर क्लीन” की छवि के साथ शुरू हुई थी, लेकिन बाद में Bofors घोटाला और अन्य मुद्दों पर मीडिया के साथ उनके संबंध तनावपूर्ण हो गए. 1988 में डिफेमेशन बिल (जिसे बाद में वापस ले लिया गया) जैसे कदमों ने प्रेस को “गैग” करने की कोशिश के रूप में देखा गया. 1986 की यह घटना उस तनाव की शुरुआती झलक थी, जहां आर्थिक मुद्दे (वेतन) को लेकर मीडिया ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोला.
यह हड़ताल प्रेस की स्वतंत्रता और आर्थिक हितों के बीच संतुलन की बहस को रेखांकित करती है. एक तरफ कर्मचारियों के हक की बात, दूसरी तरफ प्रकाशकों की स्थिरता.
2 जुलाई 1986 का “प्रेस ब्लैकआउट” याद दिलाता है कि लोकतंत्र में मीडिया न सिर्फ चौथा स्तंभ है, बल्कि अपनी आर्थिक और व्यावसायिक स्वायत्तता की भी रक्षा करता है. राजीव गांधी सरकार के इस कदम ने अस्थायी रूप से प्रेस को ठप कर दिया, लेकिन लंबे समय में यह घटना मीडिया की सशक्त आवाज का प्रतीक बन गई. आज के डिजिटल युग में भी सरकारी नीतियां और मीडिया के आर्थिक हितों का टकराव जारी है.
यह घटना इतिहास का सबक है संवाद और समझौते से बेहतर कोई रास्ता नहीं. प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र की जान है, लेकिन उसकी स्थिरता भी उतनी ही जरूरी.
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-भारत एक्सप्रेस
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