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आयुर्वेद दिवस: स्वतंत्रता संग्राम से आजादी के बाद तक, जानिए राष्ट्रीय पहचान और स्वास्थ्य का पूरा इतिहास

Ayurveda Day: स्वतंत्रता संग्राम में आयुर्वेद केवल एक चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वराज का प्रतीक था. जानिए आजादी के बाद भोर समिति की सिफारिशों और वैज्ञानिक मानकीकरण की कमी के कारण यह मुख्यधारा से पीछे कैसे छूटा.

स्वतंत्रता संग्राम में 'मेडिकल नेशनलिज्म' के जरिए आयुर्वेद सांस्कृतिक स्वराज का बड़ा प्रतीक बना. हालांकि, आजादी के बाद भोर समिति की सिफारिशों और वैज्ञानिक मानकीकरण की कमी के कारण यह मुख्यधारा से पिछड़ गया.
Edited by Shubhra Rai

Ayurveda Day: हर साल 23 सितंबर को मनाया जाने वाला ‘आयुर्वेद दिवस’ केवल हमारी प्राचीन चिकित्सा परंपरा का उत्सव नहीं है, बल्कि यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम के एक ऐसे अध्याय की याद दिलाता है जो समय के साथ अधूरा रह गया. 19वीं और 20वीं सदी में उभरा “मेडिकल नेशनलिज्म” (चिकित्सा राष्ट्रवाद) एलोपैथी के प्रभुत्व के खिलाफ भारत की सांस्कृतिक पहचान और स्वराज का प्रतीक था. हालांकि, आजादी के बाद नीतियों की कमी, औपनिवेशिक मानसिकता की निरंतरता और वैज्ञानिक मानकीकरण की चुनौतियों के कारण आयुर्वेद मुख्यधारा की स्वास्थ्य प्रणाली में वह स्थान नहीं पा सका, जिसका वह हकदार था.

आयुर्वेद दिवस और स्वतंत्रता संग्राम का अधूरा अध्याय

आज आयुर्वेद दिवस है. 2016 से धन्वंतरि जयंती (धनतेरस) पर मनाया जाने वाला यह दिवस अब स्थिर तिथि 23 सितंबरपर मनाया जाता है. यह दिन हमें याद दिलाता है कि आयुर्वेद केवल एक चिकित्सा पद्धति नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान का अभिन्न अंग रहा है. भारत की आजादी की लड़ाई कई मोर्चों पर लड़ी गई राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक. चिकित्सा का क्षेत्र इनमें से एक महत्वपूर्ण मोर्चा था. आयुर्वेद का पुनरुत्थान निःसंदेह इस लड़ाई का हिस्सा था, जो आजादी के बाद कहीं पीछे छूटता चला गया. इसके अपने ऐतिहासिक और चिकित्सीय कारण रहे, जिन पर बात होना जरूरी है.

स्वतंत्रता संग्राम में आयुर्वेद का पुनरुत्थान

उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में भारत में “मेडिकल नेशनलिज्म” का उदय हुआ. पश्चिमी चिकित्सा के बढ़ते प्रभुत्व के खिलाफ देशी चिकित्सा प्रणालियों- खासकर आयुर्वेद को “राष्ट्रीय चिकित्सा प्रणाली” के रूप में पेश किया जाने लगा. यह केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं था; यह सांस्कृतिक स्वराज और राष्ट्रीय पहचान का प्रतीक बन गया.

सौरव कुमार राय की पुस्तक Ayurveda, Nation and Society: United Provinces, c. 1890–1950 (ओरिएंट ब्लैकस्वान) इस प्रक्रिया को विस्तार से दर्शाती है. संयुक्त प्रांत (आज का उत्तर प्रदेश) में आयुर्वेदिक पुनरुत्थानवादी आंदोलन प्रिंट मीडिया, पत्रिकाओं, पैम्फलेट्स, विज्ञापनों और संगठनों के माध्यम से फैला. वैद्यों और प्रचारकों ने आयुर्वेद को “प्राचीन, समय-परीक्षित और भारतीय” बताते हुए पश्चिमी चिकित्सा को विदेशी और अपर्याप्त करार दिया. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस भी इस आंदोलन से जुड़ी. 1920 के आसपास कांग्रेस ने आयुर्वेदिक शिक्षा और अस्पतालों की स्थापना का समर्थन किया.

यह आंदोलन केवल चिकित्सा तक सीमित नहीं रहा. इसमें जाति, वर्ग, समुदाय और लिंग के आयाम भी जुड़े. आयुर्वेदिक विमर्श में अक्सर “अन्य” को रोग फैलाने का दोषी ठहराया गया, और “हिंदू पुरुष” के स्वास्थ्य को राष्ट्र की शक्ति से जोड़ा गया. प्रिंट तकनीक और दवा बाजार के विस्तार ने आयुर्वेद को व्यावसायिक रूप भी दिया. इस तरह आयुर्वेद का पुनरुत्थान राष्ट्र-निर्माण और समाज-पुनर्निर्माण दोनों का हिस्सा बन गया.

आजादी के बाद पीछे छूटने के कारण

आजादी के बाद आयुर्वेद को वह केंद्र स्थान नहीं मिला जिसकी उम्मीद थी. ऐतिहासिक कारण प्रमुख हैं. 1946 की भोर समिति (Health Survey and Development Committee) ने पश्चिमी चिकित्सा को प्राथमिकता दी. उसने आयुर्वेद को पुराना और अपर्याप्त बताया- खासकर प्रसूति, स्त्री रोग और सर्जरी जैसे क्षेत्रों में. 1948 की देशी चिकित्सा प्रणालियों पर समिति और 1949 की संयुक्त प्रांत आयुर्वेदिक-यूनानी पुनर्गठन समिति ने भी मिश्रित सिफारिशें दीं. कई रिपोर्ट्स में “एक एकीकृत चिकित्सा प्रणाली” की बात की गई, लेकिन व्यवहार में एलोपैथी को सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं का मुख्य आधार बनाया गया.

औपनिवेशिक नीति की निरंतरता बनी रही. ब्रिटिश काल में आयुर्वेद को राजकीय संरक्षण नहीं मिला था; आजाद भारत में भी सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था में इसे सीमित जगह दी गई. शिक्षा प्रणाली, अस्पताल और अनुसंधान में पश्चिमी मॉडल हावी रहा. परिणामस्वरूप, आयुर्वेद मुख्य रूप से निजी क्षेत्र और पारंपरिक वैद्यों तक सीमित रह गया.

चिकित्सीय और वैज्ञानिक कारण भी कम महत्वपूर्ण नहीं. आयुर्वेद व्यक्तिगत प्रकृति (प्रकृति, दोष) पर आधारित है, जबकि आधुनिक चिकित्सा मानकीकरण, क्लिनिकल ट्रायल और तीव्र परिणामों पर जोर देती है. कई आयुर्वेदिक चिकित्सकों ने पश्चिमी चिकित्सा के कुछ तत्व अपनाए, लेकिन उसकी वैज्ञानिक जांच की भावना को पूरी तरह नहीं आत्मसात किया. मानकीकरण, गुणवत्ता नियंत्रण और बड़े पैमाने पर अनुसंधान की कमी ने इसे प्रतिस्पर्धा में पीछे रखा. साथ ही, सामाजिक पूर्वाग्रह- जाति और वर्ग आधारित ज्ञान का एकाधिकार- भी इसकी व्यापक स्वीकार्यता में बाधा बने.

आगे की राह

आयुर्वेद का पुनरुत्थान स्वतंत्रता संग्राम का महत्वपूर्ण अध्याय था, लेकिन आजादी के बाद इसे वैज्ञानिक आधुनिकीकरण और समावेशी दृष्टिकोण की जरूरत थी. आज आयुष मंत्रालय के प्रयासों, वैश्विक रुचि और अनुसंधान के बढ़ते अवसरों के बावजूद, चुनौतियां बाकी हैं- गुणवत्ता, साक्ष्य-आधारित अभ्यास और सार्वजनिक स्वास्थ्य में एकीकरण.

आयुर्वेद दिवस पर हमें सिर्फ परंपरा का गुणगान नहीं करना चाहिए. इतिहास हमें याद दिलाता है कि आयुर्वेद को राष्ट्र और समाज के साथ जोड़ने का प्रयास हुआ था. अब जरूरत है कि हम उसके ऐतिहासिक सबक को समझें- पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर, वैज्ञानिक कठोरता अपनाकर और जन स्वास्थ्य के व्यापक हित में इसका उपयोग करें. तभी यह अध्याय पूरा होगा.

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-भारत एक्सप्रेस 



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