लद्दाख क्यों मांग रहा है अनुच्छेद 371K का ड्राफ्ट
Ladakh Article 371K Demand: 2019 से पहले लद्दाख जम्मू-कश्मीर विधानसभा में चार विधायकों के माध्यम से प्रतिनिधित्व करता था. केंद्रशासित प्रदेश बनने के बाद प्रशासन मुख्य रूप से लेफ्टिनेंट गवर्नर और केंद्रीय अधिकारियों के हाथ में चला गया. लेह और कारगिल के पहाड़ी विकास परिषद (Hill Councils) हैं, लेकिन उनके पास सीमित शक्तियां हैं और वे छठी अनुसूची के तहत नहीं आते.
लद्दाख के नेताओं की मुख्य मांगें थीं पूर्ण राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची में शामिल होना, भूमि-रोजगार की सुरक्षा, स्थानीय नौकरियों में आरक्षण और लोकसभा में दो सीटें. केंद्र ने राज्य का दर्जा फिलहाल खारिज करते हुए “स्यूई जेनेरिस” (विशिष्ट) मॉडल का प्रस्ताव रखा. सितंबर 2026 की बैठकों में गृह मंत्रालय ने अनुच्छेद 371K जोड़ने की पेशकश की. इसमें एक सीधे चुनी हुई केंद्रशासित प्रदेश स्तर की संस्था बनाने का प्रावधान है, जिसे भूमि, संस्कृति, भाषा, वन, पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधन और अनुच्छेद 240 के तहत आरक्षित विषयों पर विधायी शक्तियां मिलेंगी.
नेताओं का क्या कहना?
नेताओं का कहना है कि मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं. उन्हें ड्राफ्ट चाहिए जिसमें स्पष्ट हो कि इस चुनी हुई संस्था को कार्यकारी, बजटीय, नियोजन और वित्तीय शक्तियां कितनी मिलेंगी, सिविल सेवकों पर नियंत्रण कैसा होगा, और कानून-व्यवस्था (पुलिस) का नियंत्रण किसे मिलेगा. लद्दाख पक्ष पुदुच्चेरी मॉडल चाहता है (जहां पुलिस चुनी हुई सरकार के अधीन हो), जबकि केंद्र का रुझान दिल्ली मॉडल (कानून-व्यवस्था लेफ्टिनेंट गवर्नर के पास) की ओर दिखता है. ड्राफ्ट के अभाव में नेता इसे अधूरा मान रहे हैं. आगे अक्टूबर में ड्राफ्ट पर चर्चा की उम्मीद है. संवैधानिक संशोधन के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होगी.
यह मांग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लद्दाख की लगभग 97 प्रतिशत आबादी अनुसूचित जनजाति है और क्षेत्र पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील है. भूमि और संसाधनों पर बाहरी दबाव से संस्कृति और आजीविका को खतरा महसूस किया जा रहा है.
अनुच्छेद 371 क्या है?
भारतीय संविधान के भाग XXI (अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान) में अनुच्छेद 371 और उसके उप-अनुच्छेद (371A से 371J) शामिल हैं. ये कुछ राज्यों को उनकी विशिष्ट सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक या ऐतिहासिक परिस्थितियों के आधार पर विशेष व्यवस्था देते हैं. यह भारत के “असमान संघवाद” का उदाहरण है जहां सभी राज्य एक समान नहीं, बल्कि जरूरत के अनुसार अलग-अलग सुरक्षा पाते हैं.
अनुच्छेद 371 (महाराष्ट्र और गुजरात): राज्यपाल को विदर्भ, मराठवाड़ा, सौराष्ट्र, कच्छ जैसे क्षेत्रों के लिए अलग विकास बोर्ड बनाने, समान विकास व्यय और रोजगार-शिक्षा के अवसर सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी.
371A (नागालैंड, 1962): नगाओं की धार्मिक-सामाजिक प्रथाएं, प्रथागत कानून, भूमि और संसाधनों पर संसद का कानून तभी लागू होगा जब राज्य विधानसभा प्रस्ताव पास करे. राज्यपाल को कानून-व्यवस्था की विशेष जिम्मेदारी.
371B (असम): जनजातीय क्षेत्रों के विधायकों की समिति.
371C (मणिपुर): पहाड़ी क्षेत्रों की समिति और राज्यपाल की विशेष जिम्मेदारी.
371D/E (आंध्र प्रदेश और तेलंगाना): रोजगार और शिक्षा में समान अवसर.
371F (सिक्किम): विलय के बाद पुराने कानूनों की सुरक्षा और राज्यपाल की जिम्मेदारी.
371G (मिजोरम): मिजो प्रथाओं, भूमि आदि की सुरक्षा.
371H (अरुणाचल प्रदेश): राज्यपाल को कानून-व्यवस्था की विशेष शक्ति.
371I (गोवा): विधानसभा की न्यूनतम संख्या.
371J (कर्नाटक, कल्याण कर्नाटक क्षेत्र): विकास बोर्ड और आरक्षण.
ये प्रावधान आमतौर पर राज्यों के लिए हैं. लद्दाख केंद्रशासित प्रदेश है और बिना विधायिका वाला, इसलिए प्रस्तावित 371K अनूठा होगा.
संविधान लागू होने के बाद अनुच्छेद 371 का विकास
मूल संविधान (26 जनवरी 1950) में अनुच्छेद 371 एक संक्रमणकालीन प्रावधान था. यह भाग B राज्यों (पूर्व रियासतों) की सरकारों को राष्ट्रपति के सामान्य नियंत्रण में रखता था, दस साल या संसद द्वारा निर्धारित अवधि तक.
1956 में राज्य पुनर्गठन अधिनियम और सातवें संवैधानिक संशोधन के बाद भाग A, B, C का वर्गीकरण समाप्त हो गया. मूल अनुच्छेद 371 बदल गया. नए रूप में यह महाराष्ट्र और गुजरात के क्षेत्रीय विकास असंतुलन को संबोधित करने लगा.
इसके बाद विभिन्न राजनीतिक समझौतों, विद्रोह-समाप्ति समझौतों और क्षेत्रीय मांगों के आधार पर उप-अनुच्छेद जोड़े गए:
1962 (13वां संशोधन): 371A (नागालैंड) 16-बिंदु समझौते का नतीजा.
1969 (22वां): 371B (असम).
1971 (27वां): 371C (मणिपुर).
1973 (32वां): 371D/E (आंध्र).
1975 (36वां): 371F (सिक्किम).
1986: 371G (मिजोरम, मिजो अकॉर्ड).
1986: 371H (अरुणाचल).
1987: 371I (गोवा).
2012 (98वां): 371J (कर्नाटक).
प्रत्येक प्रावधान अलग राजनीतिक समझौते या समस्या का समाधान था कोई एक टेम्पलेट नहीं. छठी अनुसूची (अनुच्छेद 244) से अलग, अनुच्छेद 371 संवैधानिक संशोधन से बदलता है, जबकि छठी अनुसूची को संसद साधारण कानून से संशोधित कर सकती है.
लद्दाख के लिए प्रस्तावित 371K मौजूदा प्रावधानों से अलग होगा क्योंकि यह बिना विधायिका वाले केंद्रशासित प्रदेश के लिए चुनी हुई संस्था बनाएगा. यह भूमि-संस्कृति की सुरक्षा (371A/G जैसी) और चुनी हुई संस्था को शक्तियां देने का मिश्रण हो सकता है. ड्राफ्ट आने और संसद में पारित होने तक यह सिर्फ प्रस्ताव है.
लद्दाख की मांग लोकतंत्र की बहाली, स्थानीय नियंत्रण और पहचान की सुरक्षा से जुड़ी है. केंद्र का प्रस्ताव आगे बढ़ने का संकेत है, लेकिन ड्राफ्ट और शक्तियों की स्पष्टता पर सहमति अभी बाकी है. यह भारतीय संघवाद की लचीलापन और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के बीच संतुलन का नया अध्याय बन सकता है.
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