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शी के स्वांग के पीछे छिपी है मजबूरी: दिल्ली को बीजिंग से सख्ती से सौदा क्यों करना चाहिए?

China Structural Challenges: चीन की अर्थव्यवस्था (Economy) धीमी पड़ रही है और जनसांख्यिकीय संकट गहराता जा रहा है.

शी के स्वांग के पीछे छिपी है मजबूरी

China Structural Challenges: चीन का सार्वजनिक रुख अभी भी आत्मविश्वास से भरा और आक्रामक दिखता है. राष्ट्रपति शी जिनपिंग सैन्य आधुनिकीकरण, तकनीकी आत्मनिर्भरता और क्षेत्रीय दावों पर अडिग रुख के जरिए ताकत का प्रदर्शन करते रहते हैं. लेकिन इस स्वांग के पीछे एक शांत और दबावपूर्ण हकीकत छिपी है. ऐसी संरचनात्मक चुनौतियां जो बीजिंग की कार्यक्षमता को लगातार सीमित कर रही हैं. अगर अगले महीने शी जिनपिंग दिल्ली आते हैं (जैसा कि कई अनुमान लगा रहे हैं) तो भारत को इस मुलाकात में स्पष्ट शक्ति की स्थिति से बात करनी चाहिए. चीन जितना बताना चाहता है उससे कहीं ज्यादा झुकने को तैयार हो सकता है.

चीन की विकास गाथा अब वैसी नहीं रही जैसी कभी थी. चार दशकों तक देश को बदलने वाली असाधारण वृद्धि अब धीमी पड़ रही है और इसके कारण चक्रीय नहीं बल्कि संरचनात्मक हैं. रियल एस्टेट संकट, कमजोर घरेलू मांग, स्थानीय सरकारों का भारी कर्ज और निवेश-आधारित मॉडल की घटती उपयोगिता, इन सबने मिलकर आर्थिक दृष्टिकोण को सुस्त बना दिया है. बीजिंग खुद अब विकास के लक्ष्यों को लेकर ज्यादा सतर्कता से बात कर रहा है और स्वीकार कर रहा है कि पुराना फॉर्मूला पहले जैसा नतीजा नहीं दे रहा.

सबसे गंभीर है जनसांख्यिकी की समस्या. दशकों की जबरदस्ती जनसंख्या नियंत्रण नीति का नतीजा अब सामने है; सिकुड़ता कार्यबल, तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी और बिगड़ता निर्भरता अनुपात. चीन अब उस स्थिति का सामना कर रहा है जहां वह वास्तव में अमीर बनने से पहले ही बुजुर्ग हो जाएगा. यह चुनौती अस्थायी नहीं है. यह आने वाले दशकों तक चीन की आर्थिक और रणनीतिक पसंद को आकार देगी. बीजिंग के नीति-निर्माता इस मजबूरी को अच्छी तरह समझते हैं.

ये आंतरिक दबाव चीन की महत्वाकांक्षाओं को खत्म नहीं करते. लेकिन ये जोखिम और फायदे के हिसाब-किताब को जरूर बदल देते हैं. जिस चीन को धीमी वृद्धि, बुजुर्ग होती आबादी और बाहरी माहौल को स्थिर रखने की जरूरत है, वह सामरिक समझौते को उपयोगी मान सकता है. खासकर भारत जैसे बड़े, गतिशील और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण पड़ोसी के साथ. दिल्ली के साथ संबंध सुधारने से बीजिंग पर एक दबाव कम हो सकता है, कूटनीतिक ऊर्जा बच सकती है और घरेलू प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित करने की गुंजाइश बन सकती है.

भारत के लिए भी सामान्यीकरण की दिशा में आगे बढ़ना तर्कसंगत है. स्थायी दुश्मनी किसी के हित में नहीं. आर्थिक पूरकता, क्षेत्रीय स्थिरता और लंबी जटिल सीमा का प्रबंधन; ये सब व्यावहारिक संवाद की मांग करते हैं. लेकिन परिपक्वता का मतलब इतिहास को भूल जाना नहीं है. 2020 की घटनाएं और उसके बाद की सैन्य तनातनी एक कड़वी सच्चाई है. विश्वास सिर्फ घोषणाओं से नहीं लौटता; इसे ठोस कार्रवाई, आपसी संयम और जमीनी प्रगति से दोबारा बनाना होगा.

इसीलिए दिल्ली को सख्ती से सौदा करना चाहिए. भारत की सौदेबाजी की क्षमता बढ़ी है. उसकी अर्थव्यवस्था मजबूत गति से बढ़ रही है. उसकी जनसांख्यिकी अनुकूल है. उसके रणनीतिक साझेदारियां गहरी हुई हैं. और राजनयिक, आर्थिक व सैन्य स्तर पर कीमत चुकाने की उसकी क्षमता बढ़ी है. चीन को अपनी दक्षिणी सीमा पर स्थिरता की जरूरत भारत से ज्यादा है. यही असमानता एजेंडे को तय करे.

किसी भी शिखर वार्ता या उच्चस्तरीय बैठक में प्रतीकवाद से ज्यादा ठोस मुद्दों पर ध्यान देना होगा. वास्तविक नियंत्रण रेखा पर सैनिकों की वापसी और तनाव कम करने के अस्थायी इंतजामों से आगे बढ़कर स्थायी और सत्यापित व्यवस्थाएं बनानी होंगी. आर्थिक सहयोग को रणनीतिक कमजोरियों को कम करने की दिशा में मोड़ना होगा, न कि निर्भरता बढ़ाने की. और राजनीतिक संवाद को आपसी समानता पर आधारित रखना होगा, न कि चीन के एकतरफा ‘आपसी सम्मान’ के ढांचे पर.

अगर शी दिल्ली आते हैं, तो यह खुद बीजिंग की रुचि का संकेत होगा. भारत को इस अवसर का स्वागत करना चाहिए लेकिन बिना किसी भ्रम के. आत्मविश्वास भरे चेहरे के पीछे एक ऐसा चीन है जो संरचनात्मक सीमाओं से जूझ रहा है. दिल्ली का काम है इस मजबूरी को पहचानना, उसे सौदेबाजी के फायदे में बदलना और सुनिश्चित करना कि संबंधों में कोई भी सुधार कठोर हितों पर टिका हो, न कि आशावादी अनुमानों पर.

सामान्यीकरण वांछनीय है. समर्पण नहीं. भारत को ताकत की स्थिति से बात करनी चाहिए.

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-भारत एक्सप्रेस



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