Bharat Express DD Free Dish

मोबाइल से लेकर समंदर के जहाजों तक… जानिए क्या है पीएम मोदी के उस विजन के मायने, जो देश को बनाएगा सुपरपॉवर?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘चिप से शिप’ विजन में भारत को सिर्फ दुनिया का बड़ा बाजार नहीं, बल्कि तकनीक, नवाचार और मैन्युफैक्चरिंग का वैश्विक केंद्र बनाने की सोच दिखाई देती है.

भारत अब सिर्फ दुनिया का बड़ा बाजार बनकर संतुष्ट नहीं रहना चाहता है. देश की कोशिश है कि जिन तकनीकों और उत्पादों की जरूरत पूरी दुनिया को है, उन्हें बनाने में भी भारत की अहम भूमिका हो. इसी सोच को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT Delhi) में युवाओं और छात्रों के सामने ‘चिप से शिप’ के संदेश के जरिए सामने रखा है.

सुनने में यह नारा छोटा जरूर लगता है, लेकिन इसके पीछे भारत के औद्योगिक और तकनीकी भविष्य की एक बड़ी तस्वीर छिपी है. इसका मतलब सिर्फ सेमीकंडक्टर चिप बनाने से नहीं है. असल लक्ष्य ऐसी पूरी व्यवस्था खड़ी करना है, जिसमें किसी उत्पाद का आइडिया और डिजाइन भारत में तैयार हो, उस पर रिसर्च हो, जरूरी कंपोनेंट देश में बनें और आखिर में तैयार उत्पाद भी यहीं से दुनिया के बाजारों तक पहुंचे.

कई सालों से भारत इलेक्ट्रॉनिक्स, उन्नत मशीनों, सेमीकंडक्टर और दूसरे तकनीकी उपकरणों के लिए बड़ी मात्रा में आयात पर निर्भर रहा है. आत्मनिर्भरता की चर्चा इसी पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण हो जाती है.

हालांकि आत्मनिर्भर होने का मतलब यह नहीं कि भारत दुनिया से दूरी बना ले. इसका सीधा मतलब है कि देश अपनी तकनीकी और औद्योगिक ताकत इतनी बढ़ाए कि जरूरत के समय महत्वपूर्ण चीजें खुद बना सके और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी मजबूती से मुकाबला कर सके.

आज एक छोटी-सी चिप मोबाइल फोन, कार, सैटेलाइट, मेडिकल उपकरण से लेकर रक्षा प्रणालियों तक में इस्तेमाल होती है. इसलिए सेमीकंडक्टर क्षेत्र को मजबूत करना केवल एक उद्योग को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि आधुनिक अर्थव्यवस्था की कई दूसरी कड़ियों को मजबूत करना भी है.

चिप से आगे पूरी वैल्यू चेन पर नजर

भारत के सामने असली चुनौती सिर्फ चिप निर्माण की क्षमता खड़ी करने की नहीं है. इसके साथ चिप डिजाइन, रिसर्च, पैकेजिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, सॉफ्टवेयर और अंतिम उत्पाद निर्माण जैसे क्षेत्रों को भी साथ लेकर चलना होगा.

अगर देश इस पूरी वैल्यू चेन को मजबूत करने में सफल होता है, तो इसका फायदा कई उद्योगों को एक साथ मिल सकता है. इलेक्ट्रॉनिक्स से लेकर ऑटोमोबाइल, ऊर्जा, रक्षा, संचार और भारी उद्योग तक इसके असर दिखाई दे सकते हैं.

यही वजह है कि ‘चिप से शिप’ को केवल सेमीकंडक्टर नीति के रूप में देखना इस विचार को छोटा कर देना होगा. यह भारत के औद्योगिक ढांचे को नए सिरे से मजबूत करने की व्यापक सोच है.

‘मेक इन इंडिया’ से आगे की मंजिल

भारत में उत्पादन बढ़ाने के लिए ‘मेक इन इंडिया’ जैसी पहल ने विनिर्माण को चर्चा के केंद्र में लाया. अब अगली चुनौती यह है कि भारत में केवल दूसरे देशों के उत्पादों की असेंबली न हो, बल्कि देश खुद तकनीक और उत्पाद विकसित करने की क्षमता भी हासिल करे.

यानी भारतीय कंपनियां डिजाइन करें, यहां के इंजीनियर नई तकनीक विकसित करें, स्टार्टअप नए समाधान लेकर आएं और फिर वही उत्पाद भारत से दूसरे देशों में जाएं.

इस बदलाव का सीधा असर रोजगार पर भी पड़ सकता है. आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग में सिर्फ फैक्ट्री की नौकरी नहीं होती. रिसर्च, डिजाइन, इंजीनियरिंग, सॉफ्टवेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, लॉजिस्टिक्स, सप्लाई चेन और स्किल डेवलपमेंट जैसे कई क्षेत्र इससे जुड़े होते हैं.

इसलिए तकनीकी निर्माण का विस्तार जितना होगा, रोजगार और नए कारोबारी अवसरों की गुंजाइश भी उतनी ही बढ़ सकती है.

युवाओं की भूमिका सबसे अहम

प्रधानमंत्री के संदेश का एक बड़ा हिस्सा देश के युवाओं से जुड़ा है. भारत के पास बड़ी युवा आबादी है और यही ताकत आने वाले वर्षों में देश की सबसे बड़ी पूंजी बन सकती है.

लेकिन इसके लिए युवाओं को सिर्फ नौकरी तलाशने वाले के रूप में नहीं देखना होगा. जरूरत ऐसे माहौल की है जहां युवा खुद समस्या पहचानें, उसका समाधान खोजें और जरूरत पड़ने पर अपना कारोबार या तकनीकी समाधान भी खड़ा करें.

किसी छात्र का स्टार्टअप शुरू करना, कोई नई मशीन विकसित करना, वैज्ञानिक शोध करना या भारतीय तकनीक को विदेशों तक पहुंचाना—ये सभी देश की आर्थिक क्षमता बढ़ाने में योगदान दे सकते हैं.

खासकर उन युवाओं के लिए यह सोच अहम है जिनके परिवार में पहले किसी ने उच्च तकनीकी शिक्षा, रिसर्च, उद्यमिता या आधुनिक उद्योग का अनुभव नहीं लिया. अगर ऐसे युवा आगे बढ़ते हैं, तो इसका असर सिर्फ एक व्यक्ति के करियर पर नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज पर पड़ सकता है.

‘शिप’ तक पहुंचना क्यों महत्वपूर्ण है?

‘चिप से शिप’ में ‘शिप’ का जिक्र यह बताता है कि लक्ष्य केवल हाई-टेक लैब या इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस तक सीमित नहीं है. भारत को बड़े और रणनीतिक विनिर्माण क्षेत्रों में भी अपनी ताकत बढ़ानी होगी.

एक आधुनिक जहाज केवल स्टील से तैयार नहीं होता. उसमें नेविगेशन सिस्टम, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक्स, संचार तकनीक, सॉफ्टवेयर और कई तरह के उन्नत उपकरण इस्तेमाल होते हैं. यानी जहाज निर्माण भी कई तकनीकी उद्योगों को एक साथ जोड़ता है.

यही बात आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग की खासियत है. एक क्षेत्र में क्षमता बढ़ती है तो उससे जुड़े कई दूसरे उद्योगों को भी बाजार मिलता है. सेमीकंडक्टर से इलेक्ट्रॉनिक्स, इलेक्ट्रॉनिक्स से ऑटोमोबाइल और ऑटोमोबाइल से बैटरी तथा नई ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में इसी तरह का आपसी जुड़ाव देखने को मिल सकता है.

वैश्विक कंपनियों के लिए भारत के पास बड़ा मौका

दुनिया की कंपनियां अब अपनी सप्लाई चेन को एक ही देश पर निर्भर रखने के बजाय अलग-अलग देशों में फैलाने की कोशिश कर रही हैं. ऐसे समय में भारत के पास खुद को एक भरोसेमंद वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने का अवसर है.

देश का बड़ा घरेलू बाजार, युवा कार्यबल, तेजी से बढ़ता डिजिटल इकोसिस्टम और तकनीकी प्रतिभा भारत के पक्ष में जाते हैं. लेकिन केवल निवेश आने से यह लक्ष्य हासिल नहीं होगा.

इसके लिए बेहतर शिक्षा, मजबूत रिसर्च सिस्टम, उद्योग और विश्वविद्यालयों के बीच सहयोग, आधुनिक कौशल प्रशिक्षण और स्टार्टअप के लिए अनुकूल माहौल भी जरूरी होगा.

इसी संदर्भ में IIT Delhi जैसे तकनीकी संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. ऐसे संस्थान केवल डिग्री देने तक सीमित न रहें, बल्कि नई तकनीक, रिसर्च, स्टार्टअप और औद्योगिक समाधान तैयार करने के केंद्र बनें, तो इसका असर लंबे समय तक दिखाई दे सकता है.

आत्मनिर्भर भारत का मतलब क्या है?

आत्मनिर्भर भारत का मतलब दुनिया से कट जाना नहीं है. बल्कि इसका मतलब ऐसी क्षमता विकसित करना है जिससे भारत अपनी जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण तकनीक और उत्पाद तैयार कर सके और साथ ही दुनिया को भी प्रतिस्पर्धी उत्पाद दे सके.

अगर भारत को विकसित अर्थव्यवस्था की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना है, तो उसे ज्ञान से रिसर्च, रिसर्च से नवाचार, नवाचार से तकनीक और तकनीक से बड़े पैमाने पर उत्पादन तक की पूरी श्रृंखला मजबूत करनी होगी. ‘चिप से शिप’ इसी लंबी यात्रा को आसान भाषा में समझाने की कोशिश है. संदेश साफ है कि भारत केवल दुनिया से सामान खरीदने वाला देश न रहे, बल्कि दुनिया के लिए सामान और तकनीक बनाने वाला देश बने.

आखिरकार यह यात्रा सिर्फ कारखानों, मशीनों और निवेश की नहीं है. इसके केंद्र में भारत के युवा, उनकी प्रतिभा, उनकी सोच और कुछ नया करने का साहस है.


लेखक- शक्ति सिंह, दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष


ये भी पढ़ें: रोमिला थापर की किताब ‘वर्तमान जैसा अतीत’, जानिए इतिहास को आंख मूंदकर स्वीकार करना क्यों है खतरनाक?

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read

Latest