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स्वराज की पहली चिंगारी: अंग्रेज समझते रहे बेवकूफ, दादाभाई नौरोजी ने आंकड़ों के दम पर हिला दी लंदन की हुकूमत

Dadabhai Naoroji Birth Anniversary: दादाभाई नौरोजी ने तथ्यों और आंकड़ों के दम पर ब्रिटिश राज के आर्थिक पाखंड को बेनकाब किया. ‘ड्रेन ऑफ वेल्थ’ सिद्धांत और ‘स्वराज’ की मांग के जरिए उन्होंने भारत की आजादी की मजबूत नींव रखी.

'ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया' दादाभाई नौरोजी, जिन्होंने ब्रिटिश संसद में उठाई भारत की आवाज.

'ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया' दादाभाई नौरोजी, जिन्होंने ब्रिटिश संसद में उठाई भारत की आवाज.

Edited by Shubhra Rai

Dadabhai Naoroji Birth Anniversary: 4 सितंबर 1825 को मुंबई (तब बॉम्बे) के एक साधारण पारसी परिवार में जन्मे दादाभाई नौरोजी का जीवन भारतीय राष्ट्रवाद की नींव रखने वाले अध्यायों में से एक है. 2025 में उनकी 200वीं जयंती मनाई गई. आज भी उनकी विरासत प्रासंगिक है क्योंकि उन्होंने सिर्फ नारे नहीं लगाए, बल्कि आंकड़ों और तथ्यों के बल पर ब्रिटिश राज के आर्थिक पाखंड को दुनिया के सामने रखा. उनकी लड़ाई ने भारत की स्वतंत्रता की जमीन तैयार की.

नौरोजी को ‘ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया’ कहा जाता है. वे गणित और प्राकृतिक दर्शन के पहले भारतीय प्रोफेसर बने (एल्फिंस्टोन कॉलेज), व्यापारी रहे, समाज सुधारक बने और फिर राजनीति में उतरे. 1855 में वे व्यापार के सिलसिले में इंग्लैंड गए. वहां उन्होंने ब्रिटेन की समृद्धि और भारत की बढ़ती गरीबी के बीच का विरोधाभास देखा. इसी ने उनके विचारों को आकार दिया.

धन के निष्कासन का सिद्धांत (Drain of Wealth Theory)

नौरोजी का सबसे बड़ा योगदान उनका ‘ड्रेन ऑफ वेल्थ’ सिद्धांत है. उन्होंने दिखाया कि ब्रिटिश शासन भारत को समृद्ध नहीं कर रहा था, बल्कि व्यवस्थित रूप से उसकी संपदा को ब्रिटेन पहुंचा रहा था. 1867 में ईस्ट इंडिया एसोसिएशन में प्रस्तुत पेपर ‘इंग्लैंड्स ड्यूटीज टू इंडिया’ से लेकर 1901 की महान कृति ‘Poverty and Un-British Rule in India’ तक उन्होंने ब्रिटिश सरकार के ही आंकड़ों का इस्तेमाल किया.

वे बताते थे कि हर साल करोड़ों पाउंड भारत से ब्रिटेन जा रहे थे- ब्रिटिश अधिकारियों के वेतन और पेंशन (होम चार्जेस), ब्रिटिश कंपनियों के मुनाफे, कर्ज पर ब्याज, सैन्य खर्च और एकतरफा व्यापार के रूप में. उन्होंने अनुमान लगाया कि यह निकासी सालाना 30-40 मिलियन पाउंड तक पहुंचती थी. उन्होंने भारत की प्रति व्यक्ति आय का भी अनुमान लगाया, जो ब्रिटेन की तुलना में बेहद कम थी. इससे साबित हुआ कि भारत की गरीबी और अकाल सिर्फ प्राकृतिक या सांस्कृतिक कारणों से नहीं, बल्कि औपनिवेशिक नीति का नतीजा थे.

यह सिद्धांत ब्रिटिश दावों को झूठा साबित करता था कि राज ‘सभ्यता’ और ‘विकास’ ला रहा है. नौरोजी ने इसे ‘अन-ब्रिटिश’ शासन कहा- यानी ब्रिटिश सिद्धांतों के ही खिलाफ. उनके आंकड़ों ने बाद में आर.सी. दत्त, गोखले और अन्य नेताओं को प्रेरणा दी. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी 1896 में इस सिद्धांत को अपनाया.

राजनीतिक संघर्ष और स्वराज की मांग

नौरोजी सिर्फ अर्थशास्त्री नहीं थे. वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और 1886, 1893 तथा 1906 में इसके अध्यक्ष रहे. 1906 के कलकत्ता अधिवेशन में उन्होंने स्पष्ट रूप से ‘स्वराज’ (आत्म-शासन) की मांग रखी- जो उस समय कांग्रेस के लक्ष्य के रूप में स्थापित हुई.

1892 में वे ब्रिटिश संसद (हाउस ऑफ कॉमन्स) के पहले भारतीय सदस्य चुने गए (सेंट्रल फिन्सबरी से लिबरल पार्टी के टिकट पर, मात्र पांच वोटों के अंतर से). संसद में उन्होंने भारत की समस्याओं को उठाया, खर्च पर रॉयल कमीशन की मांग की और भारतीयकरण तथा सुधारों की वकालत की. इससे पहले उन्होंने लंदन इंडियन सोसाइटी और ईस्ट इंडिया एसोसिएशन की स्थापना कर ब्रिटेन में भारत के पक्ष में आवाज बुलंद की.

वे मध्यमार्गी थे, याचिका और संवैधानिक तरीकों पर विश्वास करते थे, फिर भी उनका काम कट्टरपंथियों और नरमपंथियों दोनों को स्वीकार था. गांधीजी ने उन्हें ‘महात्मा’ और ‘फादर ऑफ द नेशन’ कहा. उन्होंने तिलक, गोखले और बाद के नेताओं को प्रभावित किया.

समाज सुधार और शिक्षा

पारसी समाज में सुधार के लिए उन्होंने रहनुमाई मजदयसन सभा और रस्त गोफ्तार अखबार शुरू किया. उन्होंने लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कूल खोले और ज्ञानप्रसारक मंडली जैसी संस्थाओं से जुड़े. शिक्षा और सामाजिक जागरण को वे राष्ट्र निर्माण का आधार मानते थे.

विरासत

30 जून 1917 को मुंबई में 91 वर्ष की आयु में उनका निधन हुआ. वे स्वतंत्रता देखने के लिए जीवित नहीं रहे, लेकिन उनके तथ्यों और तर्कों ने ब्रिटिश राज की नैतिक और आर्थिक वैधता को कमजोर कर दिया. उन्होंने साबित किया कि साम्राज्य का दावा ‘कल्याण’ का नहीं, बल्कि शोषण का था. आज जब उपनिवेशवाद, क्षतिपूर्ति और आर्थिक न्याय की चर्चा होती है, तो नौरोजी के आंकड़े और उनका सिद्धांत फिर प्रासंगिक हो उठते हैं.

दादाभाई नौरोजी की जयंती सिर्फ याद करने का दिन नहीं है. यह याद दिलाने का अवसर है कि सच्चाई और तथ्यों की शक्ति कितनी बड़ी होती है. उन्होंने कलम और आंकड़ों से एक साम्राज्य को आईना दिखाया और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वतंत्रता की राह खोली. उनका जीवन हमें सिखाता है कि ज्ञान, साहस और निरंतरता से बड़े से बड़े अन्याय को चुनौती दी जा सकती है.

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-भारत एक्सप्रेस



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