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जब एक भारतीय ने हिला दी थी लंदन की संसद: जानिए ‘ग्रैंड ओल्ड मैन’ दादाभाई नौरोजी की वो ऐतिहासिक जीत

Grand Old Man of India: 6 जुलाई 1892 को दादाभाई नौरोजी ब्रिटिश संसद के सदस्य बनने वाले पहले भारतीय बने. ‘ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया’ कहे जाने वाले नौरोजी ने अपनी ‘ड्रेन थ्योरी’ से अंग्रेजों की आर्थिक लूट को दुनिया के सामने उजागर किया और भारतीय राष्ट्रवाद को अंतरराष्ट्रीय मंच दिया.

Grand Old Man of India
Edited by Shubhra Rai

Grand Old Man of India: 19वीं शताब्दी के अंत में जब भारत ब्रिटिश साम्राज्य की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब एक साधारण लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति वाले भारतीय ने ब्रिटेन की संसद के द्वार खटखटाए. दादाभाई नौरोजी ब्रिटेन की हाउस ऑफ कॉमन्स (House of Commons) में चुने जाने वाले पहले भारतीय बने. उनकी यह जीत न सिर्फ व्यक्तिगत उपलब्धि थी, बल्कि पूरे भारतीय राष्ट्रवाद के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर साबित हुई.

चुनावी जीत और ऐतिहासिक क्षण

6 जुलाई 1892 को लंदन की सेंट्रल फिंसबरी (Central Finsbury) सीट से लिबरल पार्टी के उम्मीदवार के रूप में दादाभाई नौरोजी ने चुनाव जीता. वे ब्रिटिश संसद पहुंचने वाले पहले एशियाई और पहले भारतीय सांसद बने. उस समय की संसद की भव्य इमारत में भारतीय चेहरे को देखकर ब्रिटिश राजनीतिक वर्ग हैरान रह गया.

नौरोजी का मानना था कि भारत को अपनी आजादी की आवाज ब्रिटिश संसद के अंदर से ही उठानी चाहिए. उन्होंने संसद में भारत की गरीबी, ब्रिटिश शोषण और आर्थिक लूट के मुद्दों को जोरदार तरीके से उठाया. चुनाव जीतने के बाद उन्होंने ब्रिटिश शासन को एक “दुष्ट ताकत” करार दिया, जिसने अपने उपनिवेशों को गुलाम बनाकर रखा है. उन्होंने ब्रिटिश नीतियों को भारत की व्यापक गरीबी का जिम्मेदार ठहराया.

भारतीय राष्ट्रवाद के प्रतीक पुरुष

दादाभाई नौरोजी का जन्म 4 सितंबर 1825 को मुंबई में हुआ था. वे एक पारसी परिवार से थे. उन्होंने शिक्षा पूरी करने के बाद व्यापार और शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाई. वे लंदन चले गए और वहां भारतीयों के हितों के लिए निरंतर संघर्ष किया. उन्होंने East India Association की स्थापना की, जो ब्रिटेन में भारतीय स्वर को मजबूत करने वाला पहला संगठन था.

1892 के चुनाव से पहले उन्होंने 1886 में भी चुनाव लड़ा था, लेकिन हार गए. 1895 और 1900 में भी उन्होंने चुनाव लड़ा, परंतु सफलता नहीं मिली. अंततः उन्होंने इंग्लैंड छोड़ दिया और अपने जीवन के अंतिम वर्ष भारत में बिताए.

नौरोजी को ‘ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया’ के नाम से जाना जाता है. वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और तीन बार इसके अध्यक्ष भी चुने गए (1886, 1893 और 1906). उन्होंने ‘Drain Theory’ (निकासी सिद्धांत) दिया, जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि ब्रिटेन किस प्रकार भारत से धन की निकासी कर रहा है और इससे भारत की अर्थव्यवस्था कैसे बर्बाद हो रही है.

उनकी संसदीय उपस्थिति ने साबित कर दिया कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी लड़ना संभव है. उन्होंने ब्रिटिश संसद में भारत के लिए न्याय की मांग की और भारतीय छात्रों, व्यापारियों तथा राजनीतिक कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया.

भारत की गरीबी का कारण ब्रिटिश शासन की लूट है

आज जब हम दादाभाई नौरोजी की 1892 की उस ऐतिहासिक जीत को याद करते हैं, तो यह महज एक चुनावी जीत नहीं लगती. यह एक संदेश है – कि शिक्षा, दृढ़ता और सही मंच के माध्यम से उपनिवेशवाद के खिलाफ आवाज उठाई जा सकती है. उनकी सफलता ने बाद में मोतीलाल नेहरू, शापूरजी सकलतवाला और अन्य भारतीयों को ब्रिटिश संसद पहुंचने की राह दिखाई.

दादाभाई नौरोजी ने साबित किया कि भारत की आजादी की लड़ाई सिर्फ भारत की भूमि पर नहीं, बल्कि साम्राज्य की राजधानी लंदन में भी लड़ी जा सकती है.

दादाभाई नौरोजी भारतीय इतिहास के उन गिने-चुने व्यक्तियों में से एक हैं जिन्होंने बिना हथियार के, केवल बुद्धि, ज्ञान और साहस से साम्राज्य को चुनौती दी. ब्रिटेन की संसद में उनका पहुंचना भारतीय गौरव का प्रतीक है और आज भी युवा पीढ़ी को प्रेरित करता है कि सच्ची लड़ाई मंच पर भी लड़ी जा सकती है.

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-भारत एक्सप्रेस 



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