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अलविदा ‘सुशासन बाबू’! लालू के बाद अब नीतीश भी राज्य की सक्रिय राजनीति से दूर, समाजवादी दौर से बाहर आया बिहार

आज बिहार की राजनीति में एक लंबा अध्याय समाप्त हो गया. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी आखिरी कैबिनेट बैठक की अध्यक्षता करने के बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया.

आज बिहार की राजनीति में एक लंबा अध्याय समाप्त हो गया. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपनी आखिरी कैबिनेट बैठक की अध्यक्षता की, इसके बाद मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया. लगभग दो दशक (2005 से 2026 तक) तक बिहार पर शासन करने वाले नीतीश कुमार अब राज्यसभा की ओर रुख कर रहे हैं. इस घटना के साथ 1974 के जेपी आंदोलन से शुरू हुई समाजवादी राजनीति का अंतिम प्रमुख सितारा भी बुझ गया माना जा रहा है.

जेपी आंदोलन का लंबा साया

1974 के छात्र आंदोलन ने बिहार की राजनीति को पूरी तरह बदल दिया था. जयप्रकाश नारायण (जेपी) के नेतृत्व में उठी लहर से निकले युवा नेता—लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान और नीतीश कुमार—ने दशकों तक राज्य की सत्ता और समाज को आकार दिया.

  • लालू प्रसाद यादव ने मंडल कमीशन के जरिए पिछड़ों-दलितों को मुख्यधारा में लाया, लेकिन “जंगल राज” की छवि भी उनके नाम जुड़ी.
  • नीतीश कुमार ने 2005 में सत्ता संभालते हुए “सुशासन” का नारा दिया. उन्होंने सड़कें, बिजली, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण (महिला आरक्षण, साइकिल योजना) और कानून-व्यवस्था में सुधार के लिए काम किया.

इन तीनों नेताओं की राजनीति किसी न किसी रूप में जेपी की विचारधारा—समाजवाद, सामाजिक न्याय और भ्रष्टाचार विरोध—से जुड़ी रही. आज लालू परिवार मुख्य रूप से परिवारवाद और विपक्ष की भूमिका में सिमट गया है, पासवान परिवार बंटा हुआ है, और नीतीश का सक्रिय राज्य-स्तरीय दौर समाप्त हो गया. बिहार अब उस पुराने फ्रेमवर्क से मुक्त होने की दिशा में बढ़ रहा है.

योगदान और आलोचना

नीतीश कुमार को “सुशासन बाबू” कहा जाता था. उनके कार्यकाल में बिहार “जंगल राज” से निकलकर सड़कों, बिजली और शांति की ओर बढ़ा. उन्होंने EBC (अत्यंत पिछड़ी जातियां), महादलित, कुर्मी-कोइरी और महिलाओं का सामाजिक गठबंधन बुनकर राजनीति को स्थिरता दी. बार-बार गठबंधन बदलने (NDA से महागठबंधन और फिर वापसी) की आलोचना हुई, लेकिन वे गठबंधन राजनीति के मास्टर साबित हुए.

अंतिम वर्षों में स्वास्थ्य, फैसले लेने की गति और बार-बार उलटफेर ने उनकी छवि प्रभावित की. फिर भी, इतिहास उन्हें बिहार को आधुनिक ट्रैक पर लाने वाले नेता के रूप में याद रखेगा.

कुल मिलाकर, 14 अप्रैल 2026 बिहार के लिए संक्रमण का दिन है. पुरानी समाजवादी राजनीति का युग समाप्त हो रहा है, लेकिन नई राजनीति को अपनी जगह बनाने में अभी समय लगेगा. बिहार की जनता अब विकास, युवा रोजगार और बेहतर शासन की उम्मीद कर रही है.

बिहार की राजनीति एक बार फिर मुड़ रही है. पुराने सितारों के जाने के बाद नए चेहरों और नई रणनीतियों का समय आ गया है. इतिहास देखेगा कि यह बदलाव बिहार को कितना आगे ले जाता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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