Pushpamitra Book Review: पुष्पमित्र की ‘गांधी का सैंतालीस’ (ईश्वर अल्लाह तेरो नाम) महात्मा गांधी के जीवन के अंतिम और सबसे कठिन दौर की गहन, तथ्यात्मक और भावपूर्ण कथा है. राजकमल प्रकाशन से 2026 में प्रकाशित यह लगभग 300-320 पृष्ठों की पुस्तक अक्टूबर 1946 से 30 जनवरी 1948 तक के कालखंड पर केंद्रित है- वह समय जब देश आजादी की दहलीज पर खड़ा था, लेकिन सांप्रदायिक हिंसा ने पूरे उपमहाद्वीप को लहूलुहान कर रखा था.
यह गांधी के आखिरी साल का रोजनामा नहीं, बल्कि उनकी अंतिम लड़ाई की कहानी है. लेखक पुष्पमित्र (पुष्यमित्र) स्पष्ट करते हैं कि 1947 के आसपास का कालखंड गांधी के जीवन का सर्वश्रेष्ठ दौर था- जब 77-78 वर्ष के वृद्ध महात्मा ने अकेले ही सांप्रदायिकता के जहर के खिलाफ संघर्ष किया. लॉर्ड माउंटबेटन की गांधी-प्रशंसा ने लेखक को इस पुस्तक के लिए प्रेरित किया.
पुस्तक आठ अध्यायों में बंटी है:
वह अकेला यात्री
नोआखली यात्रा की शुरुआत. 2 जनवरी 1947 को गांधी ने पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के नोआखली के 47 गांवों की 57 दिवसीय पदयात्रा शुरू की. टैगोर का ‘एकला चलो रे’ उनका मंत्र बन गया. नंगे पैर, लाठी थामे, वे प्रेम और पश्चात्ताप का संदेश लेकर निकले.
फ्लैशबैक और नोआखली
नवंबर 1946 से मार्च 1947 तक की यात्राएं. डायरेक्ट एक्शन डे के बाद शुरू हुए दंगों में गांधी ने पीड़ितों के घावों पर मरहम लगाया, हिंसा करने वालों को आत्ममंथन की ओर मोड़ा.
बिहार
मार्च-मई 1947. यहां हिंसा की प्रतिशोध वाली लहर थी. इसी दौरान निर्मल कुमार बोस के साथ ब्रह्मचर्य संबंधी मतभेद उभरे, जिसके बाद बोस अलग हो गए, लेकिन पत्राचार जारी रहा.
आजादी, बंटवारा और सत्ता के सवाल
गांधी बंटवारे के सख्त खिलाफ थे. वे जिन्ना से बार-बार मिलते रहे. सरदार पटेल की आपत्ति पर उनका जवाब था-‘देश की खातिर, भारत की अखंडता बचाने के लिए मुझे अगर जिन्ना साहब से हजार बार मिलना होगा तो हजार बार मिलूंगा.’
कलकत्ता और दिल्ली
अगस्त-सितंबर 1947 से शहादत तक. कलकत्ता में चमत्कारिक शांति, फिर दिल्ली में शरणार्थियों के बीच.
अंतिम दिन और उसके बाद
लेखक इतिहास के स्रोतों (मनुबेन की डायरी, प्यारेलाल, हरिजन आदि) पर आधारित रचनात्मक रिपोर्टिंग करते हैं. अंत में प्रमुख किरदारों का परिचय भी है.
कुछ अल्पज्ञात या कम चर्चा वाले प्रसंग
पुस्तक कई ऐसे ब्योरों को सामने लाती है जो सामान्य इतिहास की किताबों में छूट जाते हैं:
नोआखली की पदयात्रा का मानवीय पक्ष
47 गांवों की यात्रा सिर्फ सांख्यिकी नहीं थी. गांधी के साथ पोती मनुबेन और कुछ साथी थे. वे बांग्ला सीखने का अभ्यास करते रहे. पाकिस्तान बनने के बाद भी नोआखली में आबादी का पूर्ण आदान-प्रदान नहीं हुआ-इसमें गांधी के शांति-मिशन और उनके साथियों की भूमिका अहम थी. अंतिम दिनों में भी वे प्यारेलाल को निर्देश देते हैं कि नोआखली में डटे रहें, औरतों को तैयार करें, कायरों की तरह न भागें.
गोलवलकर से मुलाकात और आरएसएस रैली
सितंबर 1947 में दिल्ली में आरएसएस प्रमुख माधव सदाशिव गोलवलकर गांधी से मिले. गांधी ने सीधे कहा-‘संघ के हाथ भी खून से रंगे हैं.’ गोलवलकर ने इनकार किया और शाखा/रैली में आमंत्रित किया. गांधी ने आमंत्रण स्वीकार कर 16 सितंबर को वाल्मीकि आश्रम के पास रैली में हिस्सा लिया. वहां उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनका हिंदू धर्म असहिष्णु या बहिष्कारवादी नहीं है; उसने सभी धर्मों की उत्तम बातें आत्मसात की हैं. वे मुसलमानों के दोस्त हैं (बचपन से) और हिंदू-सिखों के दुश्मन नहीं. यह मुलाकात और भाषण आज भी विवादित है, लेकिन पुस्तक इसे तथ्यों के साथ प्रस्तुत करती है.
30 जनवरी 1948 का अंतिम दिन-पूर्वाभास और बातें
मनुबेन की डायरी के अनुसार सुबह गांधी ने ‘थाके न थाके छताय हो…’ भजन सुनाने का आग्रह किया. खांसी की गोलियों के बारे में कहा-‘कौन जानता है, रात के पहले क्या होगा?’ वे बंगला अभ्यास करते रहे, हिंदू महासभा कार्यकर्ता के उग्र भाषण पर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी से बात करवाई, नोआखली के साथियों को निर्देश दिए, और सरदार पटेल से लंबी मुलाकात की. पटेल-नेहरू मतभेद पर उन्होंने दोनों को साथ रहने की सलाह दी और प्रार्थना सभा में बोलने का इरादा जताया. यह अंतिम आदेश बन गया.
‘ईश्वर अल्लाह तेरो नाम’ का संदर्भ
पुस्तक का उपशीर्षक इसी भजन पंक्ति से लिया गया है, जो 22 जनवरी 1947 के आसपास मनुबेन द्वारा रघुपति राघव राजा राम भजन में जोड़ी गई. यह गांधी के धर्म-समन्वय का जीवंत प्रतीक था.
अन्य बारीकियां
कलकत्ता में आजादी के जश्न के दौरान गांधी का अनशन और शांति प्रयास; दिल्ली में शरणार्थियों के बीच उनकी भूमिका; और यह कि वे वर्धा/पाकिस्तान जाने की योजना बना रहे थे, लेकिन दिल्ली की स्थिति ने रोक दिया.
पुस्तक का महत्व
पुष्पमित्र की लेखनी न तो महिमामंडन है और न निंदा. यह दिखाती है कि गांधी कैसे अकेले खड़े थे-अपने ही देशवासियों के मन में जमे सांप्रदायिक जहर के खिलाफ. नंगे पैर यात्रा, पीड़ितों की सेवा, हिंसक लोगों को पश्चात्ताप की ओर मोड़ना-ये तरीके आज के भारत में भी प्रासंगिक हैं या नहीं, यह सवाल पुस्तक छोड़ती है.
अशोक वाजपेयी जैसे लेखकों ने इसे गांधी-सचाई का महत्वपूर्ण संदर्भ-ग्रंथ बताया है, खासकर ऐसे समय में जब गांधी-निंदा का माहौल हो.
कुल मिलाकर, ‘गांधी का सैंतालीस’ सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि अहिंसा, अकेलापन और अंतिम संघर्ष की गाथा है. यह याद दिलाती है कि आज़ादी का असली अर्थ सिर्फ सत्ता हस्तांतरण नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने का साहस भी था. जो कोई 1947 के मानवीय अध्याय को गहराई से समझना चाहता है, उसके लिए यह अनिवार्य पढ़ाई है.
-भारत एक्सप्रेस
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