नेपाल में बिना बारिश आई वह बाढ़ सिर्फ़ नेपाल की चेतावनी नहीं थी. हिमालय ने जो भेजा, वह आपदा नहीं रसीद थी और रसीद हमेशा नीचे वालों के नाम कटती है.
सुबह नौ बजे और आसमान साफ़ था
नेपाल के रसुवा जिले के तिमुरे गांव में 26 अगस्त 2026 की सुबह कुछ भी असामान्य नहीं था. बारिश नहीं हो रही थी. बादल नहीं फटा था. कोई चेतावनी बुलेटिन नहीं था.
फिर भी क़रीब नौ बजे भोटे कोसी की घाटी में पानी की दीवार उतर आई.
यही इस आपदा का सबसे डरावना तथ्य है – बिना बारिश की बाढ़. नेपाल के NDRRMA के भूवैज्ञानिक प्रकाश पोखरेल के अनुसार यह ‘हिमनद-जनित बाढ़’ थी, जो लेन्डे खोला में एक चट्टान-हिम हिमस्खलन से पैदा हुई. ग्लेशियर का हिस्सा टूटकर नदी में गिरा, नदी को बांध दिया, पीछे झील बनी और थोड़ी देर में वह बांध फट गया. भूकंपमापी यंत्रों ने इस ढहने को 5.2 तीव्रता की भूकंपीय घटना के रूप में दर्ज किया.
पहाड़ ने संकेत भेज दिया था. कमी उसे पढ़ने और नीचे पहुंचाने वाली व्यवस्था में थी.
193 किलोमीटर प्रति घंटा
प्लेनेटरी साइंस इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक जेफरी कारगेल के आकलन के मुताबिक़ पानी, चूर्ण बर्फ़ और चट्टान की यह लहर पहले २२ किलोमीटर औसतन 193 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ़्तार से उतरी. नीचे त्रिशूली में जलस्तर तीस मिनट में नौ मीटर चढ़ गया.
दोनों आंकड़ों को साथ रखिए. सात मिनट में कोई गांव खाली नहीं होता. तीस मिनट में तीन मंज़िल ऊंचा पानी भागने का मौक़ा नहीं देता. इस स्तर की आपदा में ‘राहत’ शब्द अर्थहीन है. सिर्फ़ ‘पूर्वानुमान’ काम करता है.
नेपाल पुलिस के 30 अगस्त तक के बुलेटिन में 768 मौतें पुष्ट थीं, 2502 लोग लापता. 90,000 से अधिक प्रभावित, 8000 से ज़्यादा बचाए गए. 32 पुल और लगभग 40 किलोमीटर सड़क बह गई – काठमांडू को तिब्बत से जोड़ने वाली सड़क सहित. दर्जन भर से ज़्यादा जलविद्युत परियोजनाएं क्षतिग्रस्त. (आंकड़े अस्थायी हैं.)
और वह झील किसी सूची में नहीं थी
अब वह विडंबना जो पूरी बहस की धुरी है.
इसी दौरान ICIMOD और UNDP ने कोसी, गंडकी और कर्णाली बेसिन की नई सूची जारी की- 3624 हिमनद झीलें (2070 नेपाल, 1509 तिब्बत, 45 भारत), जिनमें 47 ‘संभावित ख़तरनाक’ घोषित हुईं. और इनमें से 42 अकेले कोसी बेसिन में हैं.
यानी दुनिया का सबसे जोखिमग्रस्त हिमनद झील बेसिन वही है जिसका पानी अंततः बिहार में उतरता है.
पर 26 अगस्त को जो बांध टूटा, वह इस सूची में नहीं था क्योंकि कुछ घंटे पहले तक उसका अस्तित्व ही नहीं था. वह झील हिमस्खलन ने उसी सुबह बनाई थी.
यह हमारी निगरानी-दृष्टि की जड़ पर चोट है. स्थिर सूची से चलती आपदा नहीं पकड़ी जाती.
चौदह महीने में दूसरी बार, उसी नदी में
इसे ‘सदी की घटना’ कहकर टालने से पहले एक तथ्य याद रखिए.
8 जुलाई 2025 को इसी लेन्डे खोला में बाढ़ आई थी तब स्रोत रसुवागढ़ी से लगभग 35 किलोमीटर ऊपर तिब्बत के भीतर था. उसने नेपाल-चीन को जोड़ने वाला मितेरी पुल बहाया, नौ जानें लीं, और रसुवागढ़ी जलविद्युत को नुक़सान पहुंचाकर लगभग 211 मेगावाट आपूर्ति प्रभावित की.
पुल दोबारा बना. चौदह महीने बाद वही नदी फिर उठ खड़ी हुई.
यह संयोग नहीं, उस नदी का नया चरित्र है. ICIMOD के विशेषज्ञ सस्वत सान्याल का आकलन साफ़ है ग्लेशियर पतले हो रहे हैं, ऊंची ढलानों को जोड़े रखने वाला पर्माफ्रॉस्ट पिघल रहा है, इसीलिए चट्टान-बर्फ़ के ढहने बढ़ रहे हैं. नेपाल औसतन हर साल 333 जानें चरम मौसमी घटनाओं में गंवाता है; 1977 के बाद वहां 26 GLOF घटनाएं दर्ज हैं.
चमोली की वह ढाई घंटे
अब भारत की ओर, क्योंकि तर्क यहां भी वही है.
देहरादून के वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान ने Scientific Reports (2022) में जो दर्ज किया, वह हर नीति-निर्माता को कंठस्थ होना चाहिए – 7 फरवरी 2021 की चमोली आपदा से पहले पूर्वगामी भूकंपीय संकेत लगभग ढाई घंटे सक्रिय रहे थे. उस दिन 200 से ज़्यादा लोग मारे गए; लगभग 2.5 करोड़ घन मीटर चट्टान और बर्फ़ एक साथ गिरी.
Science में प्रकाशित शोध आगे बताता है कि उत्तराखंड के भूकंपमापी नेटवर्क से यह घटना 100 किलोमीटर दूर तक पकड़ी जा सकती थी और कुछ मिनटों में नीचे चेतावनी भेजी जा सकती थी.
तकनीक थी. आंकड़ा दर्ज भी हुआ. नहीं था तो वह पुल, जो आंकड़े को गांव के सायरन तक पहुँचाता.
उत्तराखंड ने 4 अगस्त 2021 को राज्य भूकंप पूर्व-चेतावनी प्रणाली शुरू की – लगभग 170 एक्सेलेरोमीटर, मोबाइल ऐप और सायरन से जुड़े. सही दिशा. पर वह भूकंप के लिए है; भूस्खलन-बांध और हिमनद बाढ़ के लिए वैसा तंत्र अभी बनना बाक़ी है.
और आंकड़े इंतज़ार नहीं कर रहे. Journal of Earth System Science (2026) में उत्तराखंड हिमालय के 64 घातक भूस्खलनों का दस्तावेजीकरण हुआ, 1516 से अधिक मौतें और इनमें लगभग 67 प्रतिशत सन् 2000 के बाद. जोशीमठ की दरारें, धराली और ऋषिगंगा की तबाही – अलग-अलग खबरें नहीं, एक ही ग्राफ़ के बिंदु हैं.
पानी हमेशा नीचे उतरता है और नीचे मैदान है
अब वह हिस्सा जिसे भारतीय बहस लगातार छोड़ देती है.
26 अगस्त की बाढ़ में सबसे ज़्यादा मौतें रसुवा में नहीं हुईं. नेपाल पुलिस के जिलेवार आंकड़ों में सबसे ऊपर चितवन और नवलपरासी (पूर्व) हैं- यानी पहाड़ नहीं, तराई. आपदा पहाड़ में जन्मी, मरे मैदान के लोग.
यह भूगोल का सामान्य नियम है और इस नियम के अगले पड़ाव का नाम बिहार है. त्रिशूली आगे नारायणी बनती है, नारायणी भारत में घुसते ही गंडक, और गंडक वाल्मीकिनगर से पश्चिम चंपारण में उतरती है.
इसीलिए उसी दिन बिहार हाई अलर्ट पर चला गया. उपमुख्यमंत्री एवं जल संसाधन मंत्री विजय कुमार चौधरी के अनुसार वाल्मीकिनगर गंडक बैराज के सभी 36 फाटक खोले गए; दोपहर तक क़रीब 86,000 और रात 11 बजे तक लगभग 1.50 लाख क्यूसेक पानी छोड़ा गया. गोपालगंज में NDRF तैनात, मुज़फ़्फ़रपुर में स्टैंडबाय, SSB की QRT तैयार.
इस बार पानी संभल गया लेकिन यह प्रबंधन की जीत नहीं भूगोल की मेहरबानी थी. वही हिमस्खलन अगर कोसी या गंडक की मुख्य धारा के ऊपर हुआ होता, तो शायद फाटक खोलने का समय भी न मिलता.
बिहार का असली भूगोल
बिहार सरकार की बाढ़ प्रबंधन सूचना प्रणाली के अनुसार राज्य के 94,163 वर्ग किलोमीटर में से 68,800 यानी 73.06 प्रतिशत बाढ़ प्रभावित है. उत्तर बिहार की लगभग 76 प्रतिशत आबादी हर साल इस ख़तरे के नीचे जीती है. देश की कुल बाढ़ प्रभावित आबादी का 22 प्रतिशत से अधिक अकेले यहां है.
तीन तथ्य, जो पूरी बहस बदल देते हैं:
एक – नियंत्रण सीमा के पार है. कोसी के जलग्रहण क्षेत्र का लगभग 85 प्रतिशत तिब्बत और नेपाल में है, भारत में सिर्फ़ 15 प्रतिशत. गंडक, बागमती, कमला बलान सबकी यही कहानी. बिहार की बाढ़ का फ़ैसला बिहार में नहीं होता.
दो – गाद. ICIMOD के आकलन के अनुसार कोसी बेसिन गंगा तंत्र का मात्र 9 प्रतिशत है, पर उसकी कुल गाद का लगभग 25 प्रतिशत सालाना 10 से 13.5 करोड़ टन यही नदी लाती है. हिमालय जितना दरकेगा, गाद उतनी बढ़ेगी और गाद बाढ़ की मां है.
तीन – नदी चलती है. कोसी दो शताब्दियों में लगभग 150 किलोमीटर पश्चिम खिसकी, और 2008 में कुसहा तटबंध टूटने पर लगभग 120 किलोमीटर पूर्व धारा बदल गई. एक ही मौसम में सुपौल, मधेपुरा, अररिया, सहरसा के लाखों लोग विस्थापित.
सितंबर 2024 याद कीजिए- नेपाल के जलग्रहण क्षेत्र में भारी वर्षा के बाद बीरपुर कोसी बैराज के सभी 56 फाटक खोलने पड़े, 5.3 लाख क्यूसेक से अधिक पानी छोड़ा गया, 1968 के बाद सर्वाधिक.
तटबंध – सबसे महंगी ग़लतफ़हमी
1950 के दशक में हमने तय किया कि नदी को दीवार से रोका जाएगा. सत्तर साल बाद नतीजा सामने है.
तटबंधों के बीच क़ैद नदी अपनी गाद बाहर नहीं फैला पाती. गाद तलहटी में जमती जाती है, नदी का पेट भरता जाता है, और एक दिन नदी गांवों से ऊंची बहने लगती है. फिर तटबंध टूटने पर बाढ़ नहीं आती- जमा किया हुआ पानी एक साथ गिरता है. कुसहा इसका प्रमाण है.
और तटबंध के भीतर फँसे लाखों लोग? वे न बाढ़ पीड़ित माने जाते हैं, न सुरक्षित. तटबंध ने बाढ़ रोकी नहीं – उसे टाला और ब्याज़ सहित लौटाया.
तो अब किया क्या जाए?
- पहाड़ में सेंसर, मैदान में सायरन. कोसी, गंडक और बागमती के हिमालयी जलग्रहण क्षेत्र में भूकंपमापी, वर्षामापी और जलस्तर सेंसरों का सघन नेटवर्क, और उससे स्वचालित रूप से जुड़ा डाउनस्ट्रीम अलर्ट. चमोली ने साबित किया कि यह संभव है और यह तटबंध से सस्ता है.
- सीमा-पार डेटा साझाकरण को संधि का दर्जा. कोसी बेसिन की 42 ख़तरनाक झीलों में अधिकतर भारत की सीमा के बाहर हैं. जो देश डेटा साझा नहीं करते, वे लाशें साझा करते हैं.
- सूची से आगे, चलती निगरानी. उपग्रह रडार इंटरफ़ेरोमेट्री (InSAR) से ढलानों की मिलीमीटर-स्तरीय खिसकन की नियमित निगरानी – क्योंकि 26 अगस्त की झील किसी सूची में नहीं थी.
- गाद प्रबंधन को नीति बनाइए. नदी को जगह दीजिए, बाढ़ के मैदान बहाल कीजिए, तटबंध के भीतर बसे गांवों का सम्मानजनक पुनर्वास कीजिए. सिर्फ़ ऊंची दीवार बनाते रहना अब इंजीनियरिंग नहीं, ज़िद है.
- हिमालय में निर्माण पर वैज्ञानिक अनुशासन. ढलान स्थिरता आकलन के बिना सड़क, सुरंग, जलविद्युत या बहुमंज़िला निर्माण नहीं. रसुवा की परियोजनाएं इसलिए बहीं क्योंकि वे उसी गली में बनी थीं जिससे पानी को आना ही था.
- अंतिम छोर तक चेतावनी. सेंसर का आंकड़ा तभी सार्थक है जब वह पंचायत के सायरन और सुपौल के किसान के मोबाइल तक पहुंचे और लोग उसका अर्थ समझते हों.
आख़िरी बात
आपदा को ‘दैवीय’ कह देना सबसे सस्ता वाक्य है और सबसे महंगी आदत.
चमोली ने ढाई घंटे दिए थे. लेन्डे खोला ने चौदह महीने में दो बार चेताया. कोसी दो सौ साल से एक ही बात कह रही है. पहाड़ ने कभी चुप्पी नहीं साधी. हमने कभी सुनने का ढांचा नहीं बनाया.
सबसे बड़ी नीतिगत भूल यह मानना है कि हिमालय और बिहार दो अलग विषय हैं. जोशीमठ की दरार, रसुवा का बहा हुआ पुल और सुपौल का डूबा गांव- तीन ख़बरें नहीं, एक ही वाक्य के तीन हिस्से हैं. हिमालय जो ऊपर खोता है, बिहार उसे नीचे ढोता है – गाद बनकर, पानी बनकर, विस्थापन बनकर.
अगली बार पहाड़ जब चिट्ठी भेजेगा, पता वही होगा.
सवाल यह नहीं कि चिट्ठी आएगी या नहीं. सवाल यह है कि उसे पढ़ने वाला कोई तैनात होगा या नहीं.
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मनीष राय (लेखक वरिष्ठ रणनीतिक सलाहकार एवं राजनीतिक पत्रकार हैं. हिंदी स्तंभ ‘बेबाक राय’ के लेखक.)
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