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आरक्षण तो मिल गया, पर ‘आज़ादी’ कब? चलम की किताब से पीएम मोदी के संकल्प तक का सच

चलम ने अपनी रचनाओं में स्त्री को केवल माता, पत्नी या बहन के पारंपरिक रूपों में सीमित करने से इनकार किया. उन्होंने स्त्री को एक स्वतंत्र, इच्छाशक्ति-संपन्न और कामुक व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिला आरक्षण को लेकर जोरदार चर्चा की है. उन्होंने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को विकसित भारत का आधार बताते हुए कहा कि ‘नारी शक्ति’ से ही विकसित भारत बनेगा. सरकार अब इस अधिनियम में संशोधन कर 2029 से पहले इसे लागू करने की तैयारी कर रही है. संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण देकर देश को महिला-नेतृत्व वाली शासन व्यवस्था की ओर ले जाने का यह कदम 40 वर्षों के इंतजार को समाप्त करने वाला माना जा रहा है. लोकसभा की सीटें बढ़कर 816 होने पर लगभग 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी. प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि यह केवल राजनीतिक आरक्षण नहीं, बल्कि नारी शक्ति को निर्णय-प्रक्रिया में सशक्त बनाने का ऐतिहासिक संकल्प है.

इसी संदर्भ में वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित ‘स्त्री’ पुस्तक की चर्चा अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है. यह पुस्तक मूल तेलुगु भाषा में गुडिपाटि वेंकटचलम (लोकप्रिय नाम — चलम, 1894-1979) की रचना है, जिसका हिंदी अनुवाद जे. एन. रेड्डी ने किया है. यह 1925 में लिखी गई थी और इसे भारतीय स्त्रीवाद का पहला घोषणा-पत्र माना जाता है.

पुस्तक ‘स्त्री’ : 1925 का क्रांतिकारी दस्तावेज

चलम तेलुगु साहित्य के उन दुर्लभ लेखकों में से एक हैं जिन्होंने 1920 के दशक में ही स्त्री की देह, मन, कामेच्छा, स्वायत्तता और पितृसत्तात्मक बंधनों पर खुलकर, साहसपूर्वक लिखा. ‘स्त्री’ निबंधों का संग्रह है जिसमें चलम ने स्त्री को केवल माता, पत्नी या बहन के पारंपरिक भूमिकाओं में बांधने से इनकार किया. उन्होंने स्त्री को एक स्वतंत्र, इच्छाशक्ति-संपन्न और कामुक इंसान के रूप में चित्रित किया.

पुस्तक का कवर एक पुरानी, प्रभावशाली तस्वीर से सजाया गया है — तीन स्त्रियां (एक खड़ी और दो बैठी हुई) पारंपरिक साड़ी और आभूषणों में. ऊपर लिखा है:

  • “स्त्री मुक्ति के उद्योग में 1925 में रचित स्त्रीवाद का पहला भारतीय घोषणा-पत्र”
  • और एक महत्वपूर्ण उद्धरण — “प्रतिरोध का आदर्श है, प्रतिरोध की अस्वीकार्यता न रहना!”

चलम की लेखनी में स्त्री की मुक्ति बिना उसके यौनिक और मानसिक अधिकारों की स्वीकृति के अधूरी है. उन्होंने विवाह-संस्था, बाल-विवाह, दहेज, विधवा-पीड़ा और स्त्री-शिक्षा जैसे मुद्दों पर प्रगतिशील लेकिन कटु आलोचना की. उनकी रचनाएं पारंपरिक भारतीय समाज की जड़ों को हिलाने वाली थीं और आज भी प्रासंगिक हैं.

प्रधानमंत्री की चर्चा से ‘स्त्री’ का संबंध

जब प्रधानमंत्री मोदी नारी शक्ति को विकसित भारत का स्तंभ बताते हैं और 2029 से महिला आरक्षण लागू करने की बात करते हैं, तब चलम की यह 1925 वाली पुस्तक हमें याद दिलाती है कि राजनीतिक आरक्षण बाहरी संरचना मात्र है. सच्चा सशक्तिकरण तब संभव होगा जब समाज की मानसिकता बदले — जब स्त्री को प्रतिरोध करने का, अपनी इच्छा व्यक्त करने का और स्वतंत्र होने का अधिकार मिले.

‘स्त्री’ ठीक वही आंतरिक चेतना जगाती है जिसकी नींव पर आज का महिला आरक्षण टिका है. 1925 में जब स्वतंत्रता संग्राम चल रहा था, तब चलम ने स्त्री की मुक्ति की जो आवाज उठाई, वह आज 2026 में संसद में महिलाओं की भागीदारी के रूप में परिपक्व हो रही है. यह पुस्तक केवल साहित्य नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज है. जो पाठक नारी-विमर्श की जड़ों को, भारतीय स्त्रीवाद के प्रारंभिक विचारों को और साहित्य के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन को समझना चाहते हैं, उनके लिए ‘स्त्री’ अनिवार्य पढ़ने योग्य है.

प्रधानमंत्री की महिला आरक्षण चर्चा और चलम की ‘स्त्री’ एक-दूसरे को पूरक बनाती हैं. एक राजनीतिक इच्छाशक्ति है तो दूसरी साहित्यिक चेतना. दोनों मिलकर स्त्री को न केवल आरक्षण देते हैं, बल्कि उसे अपना भविष्य खुद लिखने का अधिकार भी देते हैं.

‘स्त्री’ पढ़िए — क्योंकि स्त्री की मुक्ति की यात्रा 1925 से शुरू हुई थी और 2029 में एक नया अध्याय लिखा जाएगा. साहित्य और राजनीति जब साथ चलते हैं, तब सच्चा परिवर्तन संभव होता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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