कहते हैं कि इंसान चाहे जिंदगी में कितनी भी दूर क्यों न चला जाए, उसका बचपन और उसका शहर हमेशा उसके साथ चलते हैं. वक्त बदलता है, रहने की जगह बदल जाती है, काम करने का तरीका बदल जाता है, लेकिन कुछ यादें ऐसी होती हैं जो कभी पुरानी नहीं पड़तीं. पटना से निकलकर दिल्ली और फिर कॉर्पोरेट दुनिया तक का सफर तय करने वाले रणि की किताब ‘द ब्यूरोक्रेटिक कोलोन और अन्य प्रतिनिधि कहानियां’ कुछ ऐसी ही यादों और अनुभवों की कहानी है.
यह किताब सिर्फ कहानियों का संग्रह नहीं है, बल्कि उस शहर से जुड़ाव की एक भावनात्मक यात्रा है, जहां लेखक ने अपने जीवन के शुरुआती साल बिताए. पटना भले ही उनके रोजमर्रा के जीवन से दूर होता गया, लेकिन उसकी गलियां, वहां के लोग, बोलचाल का अंदाज और छोटी-बड़ी घटनाएं उनकी स्मृतियों में हमेशा जिंदा रहीं. किताब के पन्नों में यही पुराना पटना बार-बार सामने आता है.
शहर बदल गया, लेकिन जड़ें आज भी वहीं हैं
रणि की कहानियां पढ़ते हुए महसूस होता है कि उन्हें अपने आसपास की जगहों और वहां रहने वाले लोगों को समझने में खास दिलचस्पी है. उनके लिए शहर महज मकान, सड़कें और बाजार नहीं हैं. शहर की असली पहचान वहां के लोग, उनकी आदतें, संघर्ष, रिश्ते और रोजमर्रा की जिंदगी है. लेखक ने इन्हीं छोटी-छोटी बातों को अपनी कहानियों का हिस्सा बनाया है.
खास बात यह है कि रणि पेशे से लेखक नहीं हैं. शायद यही वजह है कि उनकी कहानियों में बनावटी साहित्यिक अंदाज के बजाय जीवन के वास्तविक अनुभव ज्यादा दिखाई देते हैं. यहां घटनाओं को जरूरत से ज्यादा सजाने की कोशिश नहीं की गई है. जो देखा, महसूस किया और जिया, उसे सहज तरीके से पाठकों के सामने रखा गया है.
बचपन की शरारतों से लेकर युवावस्था की उलझनों तक, किताब में कई ऐसे प्रसंग मिलते हैं जो पाठकों को अपने जीवन की याद दिला सकते हैं. लेखक ने आम लोगों की जिंदगी में छिपी खास बातों को भी बखूबी सामने रखा है.
पटना से दिल्ली और फिर कॉर्पोरेट जिंदगी का सफर
इस संग्रह की एक दिलचस्प बात यह है कि इसमें लेखक के जीवन से जुड़े अलग-अलग शहर और उनके अनुभव एक साथ दिखाई देते हैं. पटना के भिखना पहाड़ी, काजीपुर, कृष्णा घाट और हनुमान नगर से लेकर दिल्ली के मुनीरका, सीआर पार्क और अलकनंदा तक की झलक कहानियों में मिलती है.
इन जगहों के साथ केवल भौगोलिक जुड़ाव नहीं दिखता, बल्कि उनसे जुड़े लोगों और बीते समय की तस्वीर भी सामने आती है. एक तरफ पुराने शहर की गलियां हैं, जहां जिंदगी अपने पारंपरिक अंदाज में चलती है, तो दूसरी तरफ दिल्ली की तेज रफ्तार और कॉर्पोरेट दुनिया है, जहां समय का हिसाब ईमेल, मीटिंग, एक्सेल शीट और पावरपॉइंट से लगाया जाता है.
लेकिन तकनीक और आधुनिक जीवनशैली के बीच भी इंसान अपने पुराने शहर को भूल नहीं पाता. यही इस किताब का एक अहम भाव है. जिंदगी में मेट्रो आ सकती है, कामकाज डिजिटल हो सकता है और यादें क्लाउड में सुरक्षित रखी जा सकती हैं, लेकिन मन के भीतर बसी पुरानी आवाजों और चेहरों की जगह कोई तकनीक नहीं ले सकती.
व्यंग्य के साथ समाज और व्यवस्था पर भी नजर
रणि की कहानियां सिर्फ बीते दिनों को याद करने तक सीमित नहीं रहतीं. इनमें समाज, संस्थाओं और व्यवस्था के उन पहलुओं पर भी नजर डाली गई है, जिनसे आम आदमी रोजाना जूझता है. लेखक कहीं हल्के हास्य के जरिए तो कहीं तीखे व्यंग्य के सहारे सामाजिक दिखावे और व्यवस्थागत खामियों को सामने लाते हैं.
इस लेखन की खासियत यह है कि पाठकों को सीधे उपदेश देने की कोशिश नहीं होती. घटनाएं और पात्र खुद अपनी बात कह देते हैं. कहानियों में देशज पटनिया अंदाज के साथ अंग्रेजी और कॉर्पोरेट दुनिया के शब्दों का इस्तेमाल भी मिलता है. ‘एनक्रिप्टेड’, ‘क्लाउड’, ‘रिमाइंडर’ और ‘मेट्रो’ जैसे शब्द पारंपरिक जीवन के संदर्भों के साथ मिलकर एक अलग तरह का प्रभाव पैदा करते हैं.
दौड़ी, दीया, खैनी, जोतसीजी और स्टेलोन दा जैसे संदर्भ कहानियों को स्थानीय रंग देते हैं. इनका जिक्र आते ही एक खास तरह का सामाजिक और सांस्कृतिक माहौल आंखों के सामने बनने लगता है. पात्र भी किसी फिल्मी दुनिया के नायक नहीं हैं. वे हमारे आसपास मिलने वाले साधारण लोग हैं, जिनकी बातचीत, परेशानियां और खुशियां जिंदगी से जुड़ी हुई हैं.
यादों में दर्ज लोगों को सलाम
किताब की शुरुआत में शामिल कविता इसके पूरे भाव को समझने की एक अहम कड़ी है. इसमें कवि के चुपचाप दुनिया से विदा हो जाने की बात कही गई है. वह पीछे कोई शोर या शब्द नहीं छोड़ना चाहता, लेकिन उसकी यादें अपने आप बहुत कुछ कह जाती हैं.
‘चला जाऊँगा एक दिन, आहिस्ते से उठकर…’ जैसी पंक्तियां आगे आने वाली कहानियों के भाव को भी जोड़ती हैं. जिंदगी में कई लोग ऐसे होते हैं जो वक्त के साथ हमारी आंखों से ओझल हो जाते हैं. कुछ शहर छूट जाते हैं, कुछ रिश्ते पीछे रह जाते हैं और कुछ चेहरे केवल यादों में दिखाई देते हैं. मगर इसका मतलब यह नहीं कि उनका महत्व खत्म हो गया.
दरअसल, यह संग्रह उन सभी लोगों, जगहों और पलों को याद करने की कोशिश है, जिन्होंने लेखक की जिंदगी को किसी न किसी तरह प्रभावित किया है.
छोटे शहरों से निकले पाठकों को जरूर जोड़ेंगी ये कहानियां
करीब 150 पन्नों की यह किताब खास तौर पर उन लोगों को पसंद आ सकती है, जिन्होंने छोटे शहरों से निकलकर बड़े महानगरों में अपनी नई दुनिया बसाई है. जो लोग आज दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु या किसी दूसरे शहर में नौकरी और परिवार की जिम्मेदारियों के बीच व्यस्त हैं, उनके लिए इन कहानियों में अपने अतीत की झलक मिल सकती है.
‘द ब्यूरोक्रेटिक कोलोन और अन्य प्रतिनिधि कहानियां’ पुरानी यादों को सिर्फ दोहराती नहीं, बल्कि यह भी बताती है कि इंसान की पहचान बनाने में उसकी मिट्टी, उसका परिवेश और उसके आसपास के लोगों की कितनी बड़ी भूमिका होती है.
रणि की यह किताब उन चेहरों और रिश्तों के नाम एक खूबसूरत श्रद्धांजलि है, जिन्हें वक्त ने भले ही हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से दूर कर दिया हो, लेकिन यादों से कभी बाहर नहीं कर पाया.
पुस्तक का नाम: द ब्यूरोक्रेटिक कोलोन और अन्य प्रतिनिधि कहानियां
लेखक: रणि
प्रकाशक: स्पर्श प्रकाशन
पृष्ठ संख्या: लगभग 150
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