जीवन बीमा निगम (LIC) के निवेश को लेकर शोर बढ़ रहा है, कुछ समूह इसे अदाणी और रिलायंस जैसे ग्रुप्स के साथ टारगेट कर रहे हैं और इसे “रिस्की” कह रहे हैं. यह मीडिया और सोशल मीडिया के दबाव के जरिए LIC के फैसलों पर असर डालने की एक कोशिश है.
2010 और 2013 के बीच भारत के कोयला, एनर्जी और पावर और डिफ़ेंस सेक्टर्स को टारगेट करने वाले ऐसे ही कैंपेन की वजह से पॉलिसी पैरालिसिस हो गया, जिसका नतीजा यह हुआ कि आर्थिक नाकामी हुई और पब्लिक सेक्टर बैंकों में बड़े NPA हो गए. कोल इंडिया, NTPC, ONGC, BHEL, और हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स जैसे स्टॉक्स को बाहरी दबाव की वजह से फैसले रुकने का सामना करना पड़ा.
अगर LIC जनता के दबाव या चुनिंदा आलोचना की वजह से हिचकिचाती है, तो इससे भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर और कैपिटल मार्केट में जरूरी लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टमेंट में देरी हो सकती है, जिससे देश की फ़ाइनेंशियल स्टेबिलिटी को नुकसान पहुंच सकता है.
यह जरूरी है कि LIC अपने स्टैंड पर मज़बूत रहे ताकि यह पॉलिसीहोल्डर्स के पैसे की सुरक्षा करे और भारत की लॉन्ग-टर्म ग्रोथ को सपोर्ट करे.
देश की सेविंग्स का ₹55 लाख करोड़ मैनेज करता है LIC
LIC सिर्फ एक और कंपनी नहीं है. यह भारत का सबसे बड़ा फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन है, जो देश की सेविंग्स का ₹55 लाख करोड़ मैनेज करता है. लगभग हर भारतीय परिवार का LIC से कोई न कोई कनेक्शन है. इसीलिए LIC की क्रेडिबिलिटी पर कोई भी अटैक सिर्फ LIC पर ही असर नहीं डालता — यह भारत के अपने इंस्टीट्यूशन्स पर भरोसे को भी प्रभावित करता है.
कुछ संगठित समूह सेलेक्टिव जानकारी फैला रहे हैं, लेकिन वे आपको यह नहीं बताते कि SBI Life, HDFC Life, HDFC, ICICI, Kotak जैसे प्राइवेट इंस्टीट्यूशन्स और कई म्यूचुअल फंड्स का उन्हीं कंपनियों में ऐसा ही या कभी-कभी बड़ा एक्सपोजर है. सिर्फ LIC को अलग करने से कन्फ्यूजन और बेवजह का डर पैदा होता है.
इसके अलावा LIC सख्त नियमों का पालन करता है — किसी के साथ कोई स्पेशल ट्रीटमेंट नहीं. LIC अपने टोटल फंड का 1% से ज्यादा किसी भी कॉर्पोरेट ग्रुप में इन्वेस्ट नहीं कर सकता.
हर इन्वेस्टमेंट को इनसे गुजरना होता है:
- डिटेल्ड चेक,
- IRDAI रेगुलेशन,
- बोर्ड अप्रूवल.
- प्रॉक्सी एडवाइजर्स पर भरोसा
कोई भी एक ऑफिसर या पॉलिटिशियन यह तय नहीं कर सकता कि LIC कहां इन्वेस्ट करे. LIC का पैसा पूरी इकॉनमी में फैला हुआ है. LIC का 300+ टॉप इंडियन कंपनियों में इन्वेस्टमेंट है — अदाणी, रिलायंस, टाटा, आदित्य बिड़ला और भी कई. यह किसी एक ग्रुप या एक सेक्टर पर निर्भर नहीं है. असल में इस डिसिप्लिन्ड अप्रोच की वजह से LIC का इन्वेस्टमेंट कई गुना बढ़ गया है.
इक्विटी पोर्टफोलियो 10 गुना बढ़कर ₹15.5 लाख करोड़ पहुंचा
LIC का इक्विटी पोर्टफोलियो 2014 में ₹1.5 लाख करोड़ से 10 गुना की बढ़ोतरी के बाद आज ₹15.5 लाख करोड़ हो गया है. बाकी फंड का ज्यादातर हिस्सा — लगभग ₹40 लाख करोड़ — AAA-रेटेड सरकारी डेट और अदाणी, टाटा और रिलायंस जैसी दूसरी कंपनियों के ‘AAA’ रेटेड एसेट्स में है – जो इन्वेस्टमेंट की सबसे सेफ कैटेगरी है.
लेकिन अब LIC को टारगेट क्यों किया जा रहा है?
अधिकतर बुराई LIC के एक या दो खास ग्रुप जैसे अदाणी और रिलायंस में इन्वेस्टमेंट पर फोकस है. लेकिन फैक्ट्स देखिए:
2017 से LIC ने अदाणी ग्रुप में लगभग ₹31,000 करोड़ इन्वेस्ट किए हैं.
आज इसकी वैल्यू लगभग ₹65,000 करोड़ है.
यह कोई नुकसान नहीं है — यह सही ड्यू डिलिजेंस की वजह से फायदा है.
कर्ज में LIC ने अदाणी के 5,000 करोड़ रुपये के ‘AAA’ रेटेड बॉन्ड इन्वेस्ट किए, जिसने इतना ध्यान खींचा. इस बीच LIC के इन्वेस्टमेंट के बाद से उसी ग्रुप में इसी तरह के या उससे बड़े इन्वेस्टमेंट US इंश्योरेंस कंपनियों जैसे एथेन लाइफ, मेटलाइफ (USD 750 Mn/ INR 6700 cr) और HDFC बैंक (Rs 10,000 करोड़+), जापान के सबसे बड़े बैंक जैसे MUFG और मिजुहो, और यूरोप के कुछ सबसे बड़े बैंक जैसे DZ वर्ल्ड (जर्मनी का सबसे बड़ा बैंक), BNP पारिबा, बार्कलेज और स्टैंडर्ड चार्टर्ड ने किए हैं.
दुनिया के सबसे बड़े फंड ब्लैकरॉक ने भी मई 2025 में अदाणी ग्रुप में इन्वेस्ट किया है. लेकिन कोई उन पर सवाल नहीं उठाता.
यह सिलेक्टिव आलोचना शक पैदा करती है, क्लैरिटी नहीं. इससे डिसीजन पैरालिसिस हो सकता है, जैसा भारत ने 2010 और 2013 के बीच झेला था, जब कोयला, पावर और डिफेंस को लेकर कन्फ्यूजन ने प्रोजेक्ट्स को रोक दिया था और इकॉनमी को धीमा कर दिया था.
LIC अदाणी और रिलायंस जैसी कंपनियों में इन्वेस्ट क्यों करती है जिनके पास इंफ्रास्ट्रक्चर है?
इसे समझने के लिए, बस इतना सोचें:
अगर आप स्टेबिलिटी चाहते हैं, तो आप किसी ऐसी चीज में इन्वेस्ट करें जो दे हर साल रेगुलर इनकम. इंफ्रास्ट्रक्चर — पावर लाइन, एयरपोर्ट, पोर्ट, एनर्जी डिस्ट्रीब्यूशन, और लॉजिस्टिक्स — ठीक यही देता है. यह अंदाज़ा लगाया जा सकने वाला और रेगुलर है, जैसे घर का किराया या दुकान से होने वाली इनकम. यह कोई इंडियन आइडिया नहीं है — यह एक ग्लोबल इंश्योरेंस मॉडल है.
वॉरेन बफेट की कंपनी, बर्कशायर हैथवे को देखें.
बहुत से लोग वॉरेन बफेट की तारीफ करते हैं. उनकी कंपनी नॉर्थ अमेरिका (US और कनाडा) में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर एसेट्स को कंट्रोल करती है:
- इलेक्ट्रिक जेनरेशन पावर प्लांट (कोयला, नेचुरल गैस और हाइड्रो)
- नॉर्थ अमेरिका (US और कनाडा) और UK में ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन एसेट्स
- सोलर और विंड प्लांट
- नेचुरल गैस स्टोरेज फैसिलिटी और पाइपलाइन
- नॉर्थ अमेरिका में सबसे बड़ी रेलरोड और रेल मेंटेनेंस कंपनियां
- इसकी कुछ कंपनियों में मिड अमेरिकन एनर्जी कंपनी, पैसिफिकॉर्प, NV एनर्जी, नॉर्दर्न पावरग्रिड, BHE पाइपलाइन ग्रुप, BHE रिन्यूएबल्स, BNSF रेलवे, अल्टालिंक्स वगैरह शामिल हैं.
बर्कशायर सिर्फ़ इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर से लगभग 20% प्रॉफ़िट जेनरेट करता है. मजेदार बात यह है कि ये वही इंफ्रास्ट्रक्चर एरिया हैं जहां भारत की सबसे बड़ी इंफ्रा कंपनी अदाणी उन एसेट्स के साथ काम करती है जिन्हें सभी रेटिंग एजेंसियों ने ‘AAA’ या किसी भी स्टैंडर्ड के हिसाब से सबसे सुरक्षित रेटिंग दी है. इसके बावजूद भारत विरोधी ताकतें चाहती हैं कि LIC अदाणी और रिलायंस जैसी कंपनियों में इन्वेस्ट न करे.
LIC के अदाणी में हाल ही में किए गए 5,000 करोड़ रुपये (LIC के कुल AUM का 0.1%) के इन्वेस्टमेंट (मई 2025) ने इतना शोर मचाया, जबकि मेटा लाइफ, एथेन लाइफ जैसी US इंश्योरेंस कंपनियों ने जून 2025 में इससे ज़्यादा 6,700 करोड़ रुपये (USD 750 Mn) इन्वेस्ट किए.
भारत में कुछ ही ग्रुप हैं जो इतने बड़े, नेशनल लेवल के इंफ्रास्ट्रक्चर को ऑपरेट करते हैं.
अदाणी, रिलायंस और टाटा जैसे ग्रुप ये चलाते हैं:
ट्रांसमिशन लाइन, रिन्यूएबल एनर्जी, एनर्जी नेटवर्क, पोर्ट, लॉजिस्टिक्स चेन, सड़कें, एयरपोर्ट. इन एसेट्स को आमतौर पर रेटिंग एजेंसियों से AAA या हाई सेफ्टी रेटिंग मिलती है.
LIC जैसी इंश्योरेंस कंपनी के लिए — जिसे 20, 30, यहां तक कि 40 साल आगे के बारे में सोचना पड़ता है — ऐसी कंपनियां स्टेबिलिटी, सिक्योरिटी और रेगुलर इनकम देती हैं. यही वजह है कि ग्लोबल इंश्योरेंस कंपनियां इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी इन्वेस्ट करती हैं. LIC भी यही कर रही है — उन्हीं ग्लोबल बेस्ट प्रैक्टिस को फॉलो कर रही है.
इंश्योरेंस सेक्टर में सिस्टेमिक रिस्क पैदा करके भारतीय इकॉनमी को अस्थिर करने की बढ़ती कोशिश.
बड़ी ग्लोबल इंश्योरेंस कंपनियों के उलट, कई भारतीय इंश्योरेंस कंपनियों, सिर्फ़ LIC ही नहीं, बल्कि SBI लाइफ़ और ICICI प्रूडेंशियल का IT और बैंकिंग सेक्टर में काफी एक्सपोजर है – ये ऐसी इंडस्ट्री हैं जो टेक्नोलॉजी में रुकावट और जियोपॉलिटिकल झटकों के लिए बहुत कमजोर हैं.
हाल की घटनाओं, जैसे US 100,000 USD वीज़ा नियम ने भारत के IT सेक्टर में तुरंत झटके भेजे. आगे देखें तो, AI जैसे इनोवेशन IT सर्विसेज़ के बड़े हिस्से की जगह ले सकते हैं, जिससे TCS, इंफ़ोसिस और विप्रो जैसी कंपनियां प्रभावित होंगी.
सबसे जरूरी सवाल यह है:
अगर 2040 में कोई बड़ी प्राकृतिक आपदा, महामारी या आर्थिक झटका आता है, तो क्या अस्थिर सेक्टर में बहुत ज्यादा एक्सपोज़र वाली इंश्योरेंस कंपनियां अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर पाएंगी और क्लेम का पेमेंट कर पाएंगी? यह लंबे समय के स्थिर इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट के स्ट्रेटेजिक महत्व को दिखाता है, जो पॉलिसी होल्डर्स और बड़ी इकॉनमी दोनों को सुरक्षित रखते हैं.
तो सवाल यह नहीं है कि “LIC ने यहां इन्वेस्ट क्यों किया?” असली सवाल यह है कि “जब हर ग्लोबल इंश्योरेंस कंपनी यहां इन्वेस्ट करती है, तो LIC को यहां इन्वेस्ट क्यों नहीं करना चाहिए?”
LIC ने हमेशा पॉलिसी होल्डर्स को प्रोटेक्ट किया है — 1956 से पहले के समय में भी जब LIC का एक्सपोजर मुश्किल में फंसी कंपनियों में था, LIC ने कभी डिफॉल्ट नहीं किया या अपने कस्टमर्स को फेल नहीं किया. UPA सरकार के तहत LIC को इन्वेस्टमेंट पर बड़ा झटका लगा क्योंकि उसने माल्या की कंपनियों, DLF, GVK, गीतांजलि जेम्स, वक्रांगी वगैरह में बड़े इन्वेस्टमेंट किए थे — लेकिन पिछले दस सालों में ऐसा कोई मामला नहीं हुआ.
2014 के बाद से पहले जैसा एक भी बड़ा इन्वेस्टमेंट फेलियर नहीं हुआ है. जैसा कि पहले बताया गया है, LIC का इक्विटी पोर्टफोलियो 1.5 लाख करोड़ रुपये से 15.5 लाख करोड़ रुपये तक 10 गुना बढ़ गया है. अदाणी, टाटा और रिलायंस जैसी कंपनियों में इन्वेस्टमेंट एक बड़ा कारण है.
-भारत एक्सप्रेस
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