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Independence Day Special: 1857 से पहले ही अंग्रेजों के खिलाफ हो चुका था पहला विद्रोह, राजकाज छोड़ 3 दशक तक किया गुरिल्ला युद्ध

Independence Day 2025: अठारहवीं शताब्दी के वीर योद्धा महाराजा फतेह बहादुर साही ने 1857 से लगभग सौ वर्ष पहले अंग्रेजों की अधीनता स्वीकार करने से इंकार कर तीन दशकों तक गुरिल्ला युद्ध लड़ा.

Maharaja Fateh Bahadur Sahi

Independence Day 2025: आमतौर पर आपने पढ़ा ही होगा कि सन् 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ पहला विद्रोह हुआ था. इसे अंग्रेजों के खिलाफ पहला बड़ा विद्रोह, जिसे “1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” या “सिपाही विद्रोह” के नाम से जाना जाता है. ये घटना भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी. इस विद्रोह ने ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ व्यापक असंतोष और विद्रोह को जन्म दिया.

इस विद्रोह में बहादुर शाह ज़फर, रानी लक्ष्मी बाई, नाना साहिब और तात्या टोपे, बेगम हज़रत महल और मंगल पांडे का नाम प्रमुख है. इन लोगों ने प्रथम स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि इस क्रांति से पहले अंग्रेजों को चुनौती देने के लिए एक महाराजा ने अपना राज-काज छोड़कर 3 दशक तक अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था. आइए आपको बताते हैं महाराजा से गुरिल्ला योद्धा बनने वाले वीर सपूत की कहानी…

महाराजा ने कभी नहीं किया आत्मसमर्पण

अठारहवीं शताब्दी में उत्तर-पश्चिम बिहार के हुसेपुर पर शासन करने वाले एक महान राजा ने अंग्रेजों को चुनौती दी थी. ईस्ट इंडिया कंपनी से पराजित होने पर, वह गोरखपुर के जंगलों में भाग गए, और जन सेना का गठन कर लगभग तीस वर्षों तक अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध युद्ध लड़े. अंग्रेजों के फूट डालो शासन की गंदी नीति के कारण कई बार पराजित होने के बावजूद, भारत के सच्चे सपूत इस महान राजा ने कभी आत्मसमर्पण नहीं किया. वह थे महाराजा फतेह बहादुर साही.

बक्सर के युद्ध में हार के बाद भारत की राजनीतिक और प्रशासनिक स्थितियां और स्वरूप बदल गया था. सन 1765 ई. में जब शाह आलम ने बिहार, बंगाल और उड़ीसा की दीवानी अंग्रेजों को सौंप दी, तब सारण के कलेक्टर ने हुस्सेपुर राज के महाराज फतेह बहादुर साही से राजस्व की मांग की और उनसे कंपनी की अधीनता स्वीकार करने की भी बात कही. फतेह बहादुर साही ने इन दोनों बातों को मानने से इंकार कर दिया.

अमेरिका व फ्रांस की क्रांति से पहले की बात

वे एक योद्धा, देशभक्त और नवप्रवर्तक राजा थे. उन्होंने साम्राज्यवाद के खतरों को भांप लिया और चुनौती का सामना करने के लिए उठ खड़े हुए. उन्होंने अंग्रेजी सरकार को करारा जवाब दिया. यह युद्ध 1857 के भारतीय विद्रोह और अमेरिका व फ्रांस की क्रांति से पहले की बात है।

इतिहास ने अभी तक उन पर ध्यान नहीं दिया है, लेकिन मध्य-गंगा घाटी यानी बिहार पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के सीमा तक साही को एक महान और देशभक्त लोक नायक और जन-राजा के रूप में याद किया जाता है. महाराजा फतेह बहादुर साही ने इतने लंबे समय तक कैसे काम किया और कैसे जीवित रहे? क्या उन्हें भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का जनक माना जा सकता है? जेएन सिन्हा द्वारा लिखित “राजा, विद्रोही और साधु: ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध फतेह साही का युद्ध” से एक अंश.

फतेह बहादुर साही हुसेपुर के निन्यानवेवें राजा के रूप में गद्दी पर बैठे

1750 में, प्लासी के युद्ध से सात वर्ष और बक्सर के युद्ध से चौदह वर्ष पूर्व, फतेह बहादुर साही भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना की पूर्व संध्या पर, हुसेपुर के 99वें राजा के रूप में गद्दी पर बैठे. रॉबर्ट क्लाइव 1744 में ईस्ट इंडिया कंपनी में एक क्लर्क थे, उन्हें 1757 में बंगाल का पहला गवर्नर नियुक्त किया गया था.

हुसेपुर के महाराजा फतेह बहादुर साही ने ईस्ट इंडिया कंपनी का पुरजोर विरोध किया. जब उन्होंने ब्रिटिश सरकार को चुनौती देने के लिए कदम उठाया, तो यह उसके शुरुआती दिनों की बात थी. तब भी, यह असमान विरोधियों के बीच की लड़ाई थी.

जानिए कैसे सामने आया इस महाराजा का नाम

जेएन सिन्हा द्वारा लिखित पुस्तक इसलिए दिलचस्प है क्योंकि सिन्हा ने इस पात्र के बारे में जो खोजबीन और शोध किया है, वह इस कमी को पूरा करता है. शुरुआत कहां से हुई? लेखक कहते हैं: “इतिहासकार आनंद यांग की रचनाओं में मुझे फतेह बहादुर साही का नाम मिला.

हालांकि उन्होंने साही को स्वतंत्रता सेनानी नहीं माना और उन्हें राजस्व का बकाएदार माना, फिर भी उन्होंने साही के पड़ोसी और उनके चचेरे भाई के बारे में लिखा. उन्होंने कुछ स्रोतों का भी जिक्र किया, जिनसे मैंने अपने काम के लिए संपर्क किया. इसके अलावा, मैंने प्रचलित लोककथाओं से भी प्रेरणा ली.”

जनता को ब्रिटिश करों से बचने के लिए उठाए हथियार

सिन्हा को साही की विरासत से जुड़े सवालों से भी जूझना पड़ा. क्या वह एक क्रांतिकारी थे, जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी, या एक ऐसे कर्ज न चुकाने वाले व्यक्ति जिन्होंने ब्रिटिश करों से बचने के लिए हथियार उठाए? कुछ लोग यह भी कहते हैं कि वह एक डाकू थे.

इतिहास की किताबें उनके प्रति दयालु नहीं रही हैं क्योंकि कई लोग उन्हें एक डाकू के अलावा कुछ नहीं मानते, जिसने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शिविरों पर धावा बोला और उनके कर्मचारियों को मार डाला. यह याद रखना होगा कि उनकी हत्याओं का सिलसिला उनकी आजादी की चाहत से उपजा था, इसीलिए उन्होंने कंपनी की सेनाओं के साथ युद्ध किया,” सिन्हा कहते हैं. दुर्भाग्य से, साही ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं का मुकाबला नहीं कर पाए.

गुरिल्ला युद्ध के महारथी

हालांकि, गोरखपुर के घने जंगलों में, उन्होंने एकविशाल सेना का निर्माण किया. अगले तीन दशकों तक, ईस्ट इंडिया कंपनी और फतेह बहादुर साही की सेना के बीच युद्ध चला. जेएन सिन्हा के अनुसार फतेह बहादुर साही एक अद्वितीय व्यक्तित्व के धनी थे. लेखक कहते हैं, “दुनिया में गुरिल्ला युद्ध के बहुत पहले से ही वे युद्ध नीति को भली भांति जानते थे. यह भी अज्ञात है कि उन्होंने युद्ध की रणनीतियां कैसे और कहां से सीखी.

कई लोग कहते हैं कि उन्होंने इसे मेवाड़ के महाराणाओं से सीखा था, और कई लोग इसका श्रेय नागा साधुओं को भी देते हैं. मेरा मानना है कि उन्होंने स्वयं ही यह सीखा था; उनके हालात ने उन्हें यह सिखाया. उन्होंने आम लोगों, जिनमें ज्यादातर साधु और हाशिये पर रहने वाले लोग के साथ एक विशाल सेना बनाई और उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रशिक्षित किया.

ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ विद्रोह

अफसोस होता है जिस महान वीर ने पहली बार स्वतंत्रता संग्राम का अलख जगाया, जिन्होंने अंग्रेजों से विद्रोह किया था, उसे आज भी इतिहास में स्थान नहीं मिला है. यह दुर्भाग्य से कम नहीं है.

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-भारत एक्सप्रेस 



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