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‘A Sixth of Humanity’: देवेश कपूर और अरविंद सुब्रमण्यन की नजर से स्वतंत्र भारत के विकास की कहानी

देवेश कपूर और अरविंद सुब्रमण्यन की पुस्तक ‘A Sixth of Humanity’ स्वतंत्र भारत की विकास यात्रा को डेटा और तुलनात्मक नजरिए से पेश करती है. यह किताब भारतीय लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था की अप्रत्याशित सफलताओं व संरचनात्मक चुनौतियों का विश्लेषण करती है.

A Sixth of Humanity Book Review Devesh Kapur Arvind Subramanian India Development
Edited by Vaibhav Gupta

देवेश कपूर और अरविंद सुब्रमण्यन की पुस्तक A Sixth of Humanity: Independent India’s Development Odyssey स्वतंत्र भारत के विकास की कहानी को एक व्यापक, डेटा-आधारित और तुलनात्मक नजरिए से पेश करती है. यह किताब हार्परकॉलिन्स से 2025 में प्रकाशित हुई है और कमलादेवी चट्टोपाध्याय एनआईएफ बुक प्राइज 2026 की लॉन्गलिस्ट में शामिल है.

पुस्तक का मूल दृष्टिकोण

लेखक-राजनीतिक वैज्ञानिक देवेश कपूर (जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी) और अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमण्यन (पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार)-भारत के विकास को ‘precocious’ (समय से पहले) बताते हैं. आजादी के समय भारत ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार अपनाया, जबकि वह दुनिया के सबसे गरीब और सबसे कम साक्षर देशों में से एक था. पश्चिमी लोकतंत्रों में मतदान के अधिकार आर्थिक विकास के साथ धीरे-धीरे विस्तारित हुए थे, लेकिन भारत ने विकास से पहले लोकतंत्र चुना.

यह ‘precociousness’ सिर्फ लोकतंत्र तक सीमित नहीं. भारत ने विनिर्माण से पहले उच्च-कौशल वाली सेवाओं का विस्तार किया, प्राथमिक शिक्षा और स्वास्थ्य की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने से पहले उच्च शिक्षा को प्राथमिकता दी, और घरेलू श्रम-गहन निर्यात से पहले प्रतिभा का निर्यात (ब्रेन ड्रेन) देखा. चार प्रमुख परिवर्तन- राज्य निर्माण, अर्थव्यवस्था का निर्माण, समाज का रूपांतरण और राष्ट्र-निर्माण- एक साथ और लोकतांत्रिक राजनीति के ढांचे में हुए. यह प्रयोग दुनिया में अद्वितीय था.

मुख्य निष्कर्ष और विरोधाभास

पुस्तक दिखाती है कि भारत की विकास यात्रा सफलता और विफलताओं का मिश्रण है. कुछ आश्चर्यजनक उपलब्धियां हैं- स्थिर लोकतंत्र का टिकना, कुछ क्षेत्रों (दक्षिण भारत, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा) में चीन जैसी तेज वृद्धि, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार. लेकिन संरचनात्मक परिवर्तन अधूरा रहा. विनिर्माण क्षेत्र संगठित रूप में पर्याप्त रोजगार नहीं पैदा कर सका, कृषि से श्रम का पर्याप्त स्थानांतरण नहीं हुआ, और गरीबी, असमानता तथा क्षेत्रीय असमानता बनी रही.

लेखक प्रारंभिक नीतिगत विकल्पों की आलोचना करते हैं. 1950-80 के दौर को सिर्फ ‘आयात प्रतिस्थापन’ कहना पर्याप्त नहीं; उन्होंने इसे ‘कमी की अर्थव्यवस्था’ (scarcity economy) कहा है, जहां लाइसेंस राज, सार्वजनिक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता और निजी उद्यमिता पर प्रतिबंधों ने नवाचार और वृद्धि को बाधित किया. शारीरिक पूंजी को मानव पूंजी से ऊपर रखा गया, तृतीयक शिक्षा को प्राथमिक शिक्षा से ऊपर, और शहरी-औपचारिक क्षेत्र को ग्रामीण-अनौपचारिक से ऊपर. परिणामस्वरूप ‘भारतीय सपने की सीढ़ी’ में बीच के पायदान गायब रहे- लाखों लोगों के लिए मध्यम स्तर के अच्छे रोजगार और सुरक्षा उपलब्ध नहीं हुई.

तुलनात्मक आंकड़ों के माध्यम से पुस्तक बताती है कि सापेक्ष रूप से भारत की स्थिति कई संकेतकों पर कमजोर पड़ी. विकास की राह में लोकतंत्र ने व्यवस्था बनाए रखने में मदद की, लेकिन सुधारों को धीमा भी किया.

पुस्तक की ताकत

यह किताब सिर्फ आर्थिक इतिहास नहीं है. राजनीति, संस्थानों, समाज और अर्थव्यवस्था को एक साथ जोड़कर देखने का प्रयास इसे अलग बनाता है. डेटा, आधिकारिक रिपोर्टों और तुलनात्मक अध्ययनों पर आधारित होने के कारण यह तर्क मजबूत हैं. यह न तो भारत की लोकतांत्रिक सफलता का गुणगान भर है, न ही असफलताओं की सूची. यह बताती है कि क्यों भारत वैसा है जैसा है, और भविष्य की चुनौतियों- भू-राजनीतिक अस्थिरता, जलवायु परिवर्तन, प्रौद्योगिकी और जनसांख्यिकी- से निपटने के लिए क्या सबक हैं.

आज जब भारत विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है और वैश्विक मंच पर उसकी भूमिका बढ़ रही है, तब यह पुस्तक समय पर आई है. यह याद दिलाती है कि बड़े आंकड़ों और तेज वृद्धि के पीछे अधूरी संरचनात्मक चुनौतियां छिपी हैं- रोजगार की गुणवत्ता, मानव पूंजी का व्यापक विकास, क्षेत्रीय असंतुलन और राज्य की क्षमता. नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं और आम पाठकों के लिए यह अनिवार्य पठन है, क्योंकि यह जटिलता को सरलीकृत किए बिना समझने का प्रयास करती है.

संक्षेप में, A Sixth of Humanity भारत के विकास की यात्रा को एक प्रामाणिक, संतुलित और विचारोत्तेजक तरीके से प्रस्तुत करती है. यह न केवल अतीत को समझाती है, बल्कि भविष्य की दिशा तय करने में भी मददगार साबित हो सकती है. जो कोई भी स्वतंत्र भारत की कहानी को गहराई से समझना चाहता है, उसके लिए यह पुस्तक महत्वपूर्ण योगदान है.

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-भारत एक्सप्रेस



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