उस दौर में जब HIV का नाम सुनते ही लोग मुंह फेर लेते थे, जब संक्रमित व्यक्ति को समाज, परिवार और यहां तक कि अस्पताल भी ठुकरा देते थे, तब एक महिला बिना हिचक उनके पास जाती थीं, उन्हें गले लगाती थीं, हाथ थामकर बातें करती थी और कहती थी, “डरो मत, मैं हूं ना.”
वो महिला थीं डॉ. सुनीति सोलोमन, भारतीय चिकित्सा जगत की वह शख्सियत जिन्होंने न सिर्फ भारत में HIV का पहला केस खोजा, बल्कि उस वायरस के खिलाफ देश की पहली संगठित लड़ाई भी शुरू की.
भारत में HIV का पहला पता लगाने वाली वैज्ञानिक
साल 1986 में भारत में एड्स को “पश्चिम की बीमारी” कहा जाता था. लोग मानते थे कि यह केवल समलैंगिक संबंधों या “फ्री सेक्स” करने वालों को होता है. भारतीय समाज को “एक पति-एक पत्नी” वाला समझकर इस खतरे को पूरी तरह नजरअंदाज किया जा रहा था.
इसी साल चेन्नई की क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज की माइक्रोबायोलॉजी लैब में डॉ. सुनीति सोलोमन और उनकी टीम ने छह सेक्स वर्कर्स के ब्लड सैंपल टेस्ट किए. परिणाम चौंकाने वाला था, क्योंकि सभी सैंपल HIV पॉजिटिव थे. यह भारत में HIV संक्रमण का पहला आधिकारिक दस्तावेजी मामला था.
जब उन्होंने यह रिपोर्ट सरकार को सौंपी तो जवाब मिला, “ये तो बस वेश्याओं की समस्या है, इसे बड़ा मत बनाइए.”
डॉ. सोलोमन ने शांत स्वर में कहा था, “अगर आज हम इसे वेश्याओं की बीमारी कहकर छोड़ देंगे, तो कल यह हर भारतीय घर की बीमारी बन जाएगी.”
विदेश से लौटकर भारत में शुरू की जंग
1938 में चेन्नई में एक मराठी परिवार में जन्मी सुनीति आठ भाई-बहनों में इकलौती बेटी थीं. बचपन से ही स्वास्थ्य अधिकारियों को देखकर उनका मन चिकित्सा की ओर खिंचा. मद्रास मेडिकल कॉलेज से मेडिसिन की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पैथोलॉजी में विशेष प्रशिक्षण के लिए ब्रिटेन, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में समय बिताया. 1973 में भारत लौटते ही वे क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज से जुड़ गई.
समाज का विरोध और उनकी जिद
उस समय एड्स को लेकर अज्ञानता और कलंक चरम पर था. मरीजों को अस्पतालों से भगा दिया जाता था. परिवार उन्हें घर से निकाल देता था. डॉ. सुनीति खुद मरीजों के पास जाती थीं. लोग चेतावनी देते की “छूत लग जाएगी.”
वह हंसकर जवाब देतीं, “मुझे तो पहले से इंसानियत की छूत लगी हुई है.”
YRG CARE: भारत में HIV देखभाल की पहली किरण
1993 में डॉ. सुनीति सोलोमन ने अपने पति डॉ. एस.एस. सोलोमन के साथ मिलकर चेन्नई में Y.R. Gaitonde Centre for AIDS Research and Education (YRG CARE) की स्थापना की. यह भारत का पहला ऐसा केंद्र था जहां HIV की जांच, इलाज, परामर्श और देखभाल एक ही छत के नीचे उपलब्ध थी.
यहां न कोई भेदभाव था, न तिरस्कार. सेक्स वर्कर हो या ट्रांसजेंडर व्यक्ति, हर कोई सम्मान के साथ इलाज पाता था. यही वह जगह थी जहां समाज के सबसे हाशिए पर धकेले गए लोग भी बिना डरे आ सकते थे.
एक जीवन, लाखों जिंदगियां
तीन दशकों से ज्यादा समय तक डॉ. सुनीति ने HIV से जूझते लोगों के साथ खड़े रहकर यह साबित किया कि यह बीमारी कलंक नहीं, एक चिकित्सीय स्थिति है, जिसका इलाज और प्रबंधन दोनों संभव है. उनकी दूरदर्शिता और साहस की वजह से ही भारत में HIV को गंभीरता से लिया गया, नीतियां बनीं और लाखों लोगों की जान बची.
29 जुलाई 2015 को वे इस दुनिया से चली गईं, लेकिन उनकी बनाई संस्था YRG CARE आज भी हजारों लोगों को नई जिंदगी दे रही है.
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-भारत एक्सप्रेस
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