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थर्मल पावर प्लांट्स में घटता कोयला और बिजली एक्सचेंजों में बढ़ती कीमतें: क्या उत्पादन नहीं, लॉजिस्टिक्स है असली चुनौती?

EXPERT BLOG ON POWER SECTOR CRISIS: देश के थर्मल पावर प्लांट्स में कोयले के स्टॉक में आई तेज गिरावट और पावर एक्सचेंजों में बिजली की कीमतों के ₹10 प्रति यूनिट की सीमा छूने पर आईआरएडीई (IRADe) के कार्यकारी निदेशक डॉ. राजीव के. मिश्रा का मानना है कि यह समस्या कोयला उत्पादन की नहीं, बल्कि उसके सही स्थान पर उपलब्धता, लॉजिस्टिक्स और पावर-सिस्टम के लचीलेपन की है.

Vijay Ram Edited by Vijay Ram
  • डॉ. राजीव के. मिश्रा (कार्यकारी निदेशक, Integrated Research and Action for Development – IRADe)

देश के कई थर्मल पावर प्लांट्स मौजूदा समय में परिचालन के लिए कोयले के न्यूनतम स्टॉक (इन्वेंट्री) के संकट से जूझ रहे हैं. खदानों में पानी भरने और हाइड्रो व विंड एनर्जी के कम उत्पादन जैसे विभिन्न कारणों के चलते निगरानी किए जाने वाले 190 थर्मल प्लांट्स में से 74 में कोयले का स्टॉक बेहद नाजुक स्तर पर पहुंच गया है, जबकि अगस्त में ऐसे प्लांट्स की संख्या 51 थी. इसके विपरीत, कोल इंडिया के पिटहेड्स (खदान मुहानों) पर लगभग 76 मिलियन टन (MT) कोयला अब भी मौजूद है. थर्मल प्लांट्स की घटती इन्वेंट्री, एक्सचेंजों में बढ़ती कीमतें और खदानों पर लगा कोयले का बड़ा ढेर यह स्पष्ट करता है कि असली समस्या केवल कोयला उत्पादन की नहीं, बल्कि कोयले की पोजिशनिंग, रेलवे लॉजिस्टिक्स और पावर-सिस्टम के लचीलेपन की है.

पावर प्लांट्स में 21% घटा कोयला, डिमांड में भारी उछाल

भारत का बिजली ढांचा एक गंभीर चेतावनी दे रहा है. देश में कोयला तो उपलब्ध है, लेकिन जहां इसकी फौरन जरूरत है—यानी पावर स्टेशनों पर—वहां यह कम पड़ रहा है. दूसरी ओर, डे-अहेड मार्केट (DAM) में कीमतें लगातार ऊंची बनी हुई हैं और बार-बार ₹10 प्रति किलोवाट-घंटे (kWh) की अधिकतम सीमा को छू रही हैं.

अगस्त के अंत में थर्मल प्लांट्स पर 29 मिलियन टन कोयला था, जो 19 सितंबर तक 21% घटकर 22.9 MT रह गया. यह स्टॉक केवल 7 दिनों के उत्पादन के लिए पर्याप्त था और मानकों का महज 39% था. यह विरोधाभास सिखाता है कि खदान में पड़ा कोयला और पावर प्लांट में पहुंचा कोयला दोनों अलग-अलग चीजें हैं.

सितंबर में अत्यधिक गर्मी और कम बारिश के चलते शुरुआती 13 दिनों में बिजली की मांग सालाना आधार पर 17.6% बढ़ गई. 10 सितंबर को पीक डिमांड 269 गीगावाट (GW) के करीब पहुंच गई. इसके चलते कोयला आधारित उत्पादन में भारी उछाल आया. वहीं, अप्रैल से जलविद्युत (हाइड्रो) उत्पादन में 11% की गिरावट रही. सिस्टम को ऐसे समय में ज्यादा थर्मल पावर की दरकार थी, जब मानसून ने खनन और रेलवे लोडिंग को प्रभावित कर रखा था.

क्या हमें वाकई अधिक कोयला उत्पादन की जरूरत है?

कोल इंडिया के पिटहेड्स पर 76 MT कोयले की मौजूदगी बताती है कि चुनौती उत्पादन की नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक्स की है कि कोयला कितनी तेजी से पावर प्लांट्स तक पहुंच पाता है. सितंबर की शुरुआत में रेलवे रेक लोडिंग 370 से बढ़ाकर 444 रेक की गई. इसके अतिरिक्त, कंपनियों ने महंगे आयातित कोयले का सहारा लिया और अगस्त में आयात 5.52 MT तक पहुंच गया, जो 15 महीनों का उच्चतम स्तर है. हालांकि आयात विदेशी मुद्रा जोखिम और अंतरराष्ट्रीय कीमतों का भारी बोझ बढ़ाता है.

बिजली एक्सचेंजों पर सीधा असर: खरीदार 8 गुना ज्यादा

कोयले की कमी का सीधा असर पावर एक्सचेंजों पर दिखा. 31 अगस्त को जब कोयला स्टॉक 29 MT था, तब इंडियन एनर्जी एक्सचेंज (IEX) पर औसत DAM कीमत ₹5.39/kWh थी. 17 सितंबर को स्टॉक घटकर 23.4 MT हुआ तो औसत कीमत उछलकर ₹8.73/kWh हो गई और अधिकतम दर ₹10/kWh की सीलिंग पर पहुंच गई.

17 सितंबर को IEX पर 1.265 मिलियन MWh की खरीद बोलियां (Buy Bids) थीं, जबकि बिक्री बोलियां (Sell Bids) केवल 0.155 मिलियन MWh थीं. यानी खरीदारों की मांग विक्रेताओं की तुलना में आठ गुना से अधिक थी. जब बाजार मूल्य बार-बार ₹10 की नियामक सीमा को छूता है, तो वास्तविक कमी की गंभीरता का सही आकलन छिप जाता है. इसलिए नियामकों को 15-मिनट के ट्रेडिंग ब्लॉक्स की निरंतरता की निगरानी करनी चाहिए.

कोयला प्रबंधन के लिए ‘रेजिलिएंस फ्रेमवर्क’ की दरकार

केवल राष्ट्रीय स्तर पर कुल कोयला स्टॉक देखना पर्याप्त नहीं है. यदि 25 MT कोयला चुनिंदा प्लांट्स में जमा है और प्रमुख रणनीतिक प्लांट्स के पास केवल दो-तीन दिन का स्टॉक है, तो ग्रिड पर बड़ा खतरा मंडराता है. इसके समाधान के लिए एक ‘कोल रेजिलिएंस फ्रेमवर्क’ (Coal Resilience Framework) तैयार किया जाना चाहिए.

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA), ग्रिड-इंडिया, कोयला मंत्रालय, रेलवे और उत्पादक कंपनियों को आपस में जोड़कर एक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early-Warning System) बनानी चाहिए. जैसे ही मौसम के पूर्वानुमान से गर्मी बढ़ने और रिन्यूएबल ऊर्जा घटने के संकेत मिलें, लॉजिस्टिक्स को संवेदनशील प्लांट्स की इन्वेंट्री खत्म होने से पहले ही सक्रिय हो जाना चाहिए.

उत्पादन, रेलवे रैक, पावर प्लांट इन्वेंट्री और बिजली बाजार की वास्तविक स्थिति को रियल-टाइम एआई (AI) और डिजिटल टूल्स से जोड़कर ही भारत कोयले की उपलब्धता को सस्ती और निर्बाध बिजली में तब्दील कर सकता है.

(डिस्क्लेमर: लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं.)



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