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अमेरिका की कूटनीति नहीं दादागिरी!

कोरिया से लेकर वेनेजुएला तक और वियतनाम से लेकर ईरान तक, क्या अमेरिका की विदेश नीति केवल ‘झूठ और दादागिरी’ पर टिकी है? सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट ने 1950 से लेकर 2026 तक के अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेपों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

US Foreign Policy History

US Foreign Policy History: आज दुनिया में हर ओर युद्ध, तबाही और अराजकता का दौर है. विकास की गति रुक रही है. अनिश्चितता का वातावरण है. अनेक देशों के नेता ही मवालियों की तरह बर्ताव कर रहे हैं. जबकि विश्व के लोग हमेशा शांति और विकास चाहते हैं. कोई भी युद्ध नहीं चाहता. हर कोई यह चाहता है कि दुनिया के हर मुल्क में स्थिरता का माहौल बना रहे. इसी उठा-पटक में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प सबसे आगे हैं. ट्रम्प ही क्यों, अमरीका की तो फितरत ही रही है कि कोई बहाना ढूंढ कर कमजोर देशों को दबाना और उनके संसाधनों पर कब्जा करना. हाल ही में सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट ने अमेरिका की कूटनीति और युद्ध रणनीति पर गंभीर सवाल उठाए हैं.

क्या है वायरल पोस्ट?

सोशल मीडिया पर @sankofa360 से एक पोस्ट काफी वायरल हुई जिसमें लिखा है कि, “प्रिय दुनिया, क्या तुम अमेरिका और उसके सहयोगियों द्वारा झूठ बोलने से थक नहीं गए हो? क्या तुम उस साम्राज्य से थक नहीं गए हो जो खून और मौत की तलाश में नहीं रुकता? उन्होंने कोरिया (1950–1953) के बारे में झूठ बोला, ग्वाटेमाला (1954) के बारे में, इंडोनेशिया (1958), क्यूबा (1961), वियतनाम (1961–1975), लाओस (1964–1973), कांगो (1964), डोमिनिकन रिपब्लिक (1965), कंबोडिया (1969–1970), ग्रेनाडा (1983), लेबनान (1983–1984), लीबिया (1986), ईरान (1987–1988), पनामा (1989), इराक (1991, 1998, 2003), सोमालिया (1992–1994, 2007–वर्तमान), बोस्निया (1994–1995), सूडान (1998), अफगानिस्तान (1998, 2001), यूगोस्लाविया (1999), यमन (2002–वर्तमान), पाकिस्तान (2004), सीरिया (2014), लीबिया (2011), वेनेजुएला (2026), क्यूबा (2026), ईरान (2026) के बारे में झूठ बोला.

पोस्ट में आगे लिखा कि अमेरिका या उसके सहयोगी कभी किसी बात पर सच्चे रहे हैं? दुनिया कब इनके झूठ से ऊब जाएगी? अब तो हमें पता होना चाहिए कि वैश्विक अशांति, मौत, अराजकता और विनाश के जिम्मेदार कौन हैं? जो दुनिया की स्थिरता के खिलाफ हैं? जो विश्व शांति के विचार से डरते हैं? तुम्हारी चुप्पी सहयोग है! अमेरिका वैश्विक मुसीबत पैदा करने वाला है. मौत और विनाश की मशीन! अमेरिकी साम्राज्य की तानाशाही के खिलाफ बोलो!!!”

अमेरिका के फैसले गलत?

ये पोस्ट न केवल अमेरिका की ऐतिहासिक गलतियों को उजागर करती है बल्कि दुनिया को जगाने का प्रयास भी करती है. आज, जब हम वेनेजुएला, क्यूबा और ईरान जैसे देशों में अमेरिकी हस्तक्षेप की नई लहर देख रहे हैं, यह स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका के फैसले गलत साबित हो चुके हैं. इन युद्धों ने न केवल लाखों जानें लीं बल्कि दुनिया को अस्थिरता की ओर धकेला. अमेरिका की इन गलतियों से यह पता चलता है कि वैश्विक समुदाय अब युद्धों से कितना ऊब चुका है?

अमेरिका की विदेश नीति का इतिहास झूठ, हस्तक्षेप और युद्धों से भरा पड़ा है. 1950 के दशक से शुरू करें तो कोरियाई युद्ध (1950-1953) में अमेरिका ने उत्तर कोरिया के आक्रमण का बहाना बनाकर हस्तक्षेप किया, लेकिन वास्तविकता यह थी कि यह शीत युद्ध की रणनीति का हिस्सा था. लाखों कोरियाई मारे गए, लेकिन क्या अमेरिका की जीत हुई? नहीं, यह युद्ध आज भी कोरियाई प्रायद्वीप पर तनाव का कारण बना हुआ है. इसी तरह, 1954 में ग्वाटेमाला में अमेरिका ने लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को उखाड़ फेंका, क्योंकि वहां की भूमि सुधार नीतियां अमेरिकी कंपनियों को पसंद नहीं आईं. सीआईए के ऑपरेशन ने देश को दशकों की अस्थिरता में डाल दिया. क्या यह फैसला सही साबित हुआ? नहीं, ग्वाटेमाला आज भी गरीबी और हिंसा से जूझ रहा है.

क्या अमेरिका का फैसला सही था?

1950-60 के दशक से अमेरिका के झूठ की फेहरिस्त लंबी है. इंडोनेशिया (1958) में सीआईए ने विद्रोहियों को समर्थन दिया, लेकिन असफल रहा. क्यूबा (1961) में ‘बे ऑफ पिग्स’ हमला एक बड़ी असफलता थी, जहां अमेरिका ने फिदेल कास्त्रो को हटाने की कोशिश की लेकिन खुद की किरकिरी हुई. वियतनाम युद्ध (1961-1975) तो अमेरिकी इतिहास का सबसे काला अध्याय है. अमेरिका ने ‘टोंकिन की खाड़ी घटना’ को बहाना बनाकर युद्ध शुरू किया, जो बाद में झूठ साबित हुआ. 58,000 अमेरिकी सैनिक और लाखों वियतनामी मारे गए. अमेरिका हारकर लौटा, और वियतनाम आज एक मजबूत अर्थव्यवस्था वाला देश है. क्या अमेरिका का फैसला सही था? नहीं, यह युद्ध अमेरिकी समाज को भी बांट गया. लाओस (1964-1973) और कंबोडिया (1969-1970) में गुप्त बमबारी ने लाखों लोगों को मार डाला और खमेर रूज जैसे आतंक को जन्म दिया. कांगो (1964) में अमेरिका ने वहां प्रधानमंत्री पैट्रिस लुमुम्बा की हत्या में भूमिका निभाई, जो अफ्रीका की आजादी के प्रतीक थे. डोमिनिकन रिपब्लिक (1965) में हस्तक्षेप ने लोकतंत्र को कुचला.

20 साल का युद्ध व्यर्थ

1980 के दशक में भी यह सिलसिला जारी रहा. ग्रेनाडा (1983) में अमेरिका ने मेडिकल छात्रों की सुरक्षा का बहाना बनाकर आक्रमण किया, लेकिन यह छोटे देश पर साम्राज्यवादी कब्जा था. लेबनान (1983-1984) में अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई, लेकिन कोई स्थायी शांति नहीं आई. लीबिया (1986) में कद्दाफी पर हमला, ईरान (1987-1988) में नौसेना संघर्ष, पनामा (1989) में नोरिएगा को हटाना- ये सभी फैसले अमेरिका की ताकत दिखाने के लिए थे, लेकिन उन्होंने क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ाई.

इराक के खिलाफ 1991 का गल्फ वॉर, 1998 की बमबारी और 2003 का आक्रमण ‘महाविनाश के हथियारों’ के झूठ पर आधारित था. सद्दाम हुसैन को हटाया गया, लेकिन इराक आज भी अराजकता में डूबा है, आईएसआईएस जैसे समूह पैदा हुए. सोमालिया (1992-1994, 2007-वर्तमान) में अमेरिकी हस्तक्षेप ने समुद्री डकैती और आतंकवाद बढ़ाया. बोस्निया (1994-1995) में नाटो हमले, सूडान (1998) में दूतावास बमबारी, अफगानिस्तान (1998, 2001) में तालिबान के खिलाफ युद्ध- ये सभी अमेरिका की ‘आतंकवाद विरोधी’ नीति के नाम पर थे, लेकिन अफगानिस्तान से 2021 की शर्मनाक वापसी ने साबित किया कि 20 साल का युद्ध व्यर्थ था.

तेल संसाधनों पर कब्जे की कोशिश

यूगोस्लाविया (1999) में नाटो बमबारी ने कोसोवो को अलग किया, लेकिन जातीय तनाव आज भी हैं. यमन (2002-वर्तमान) में ड्रोन हमलों ने नागरिकों को मार डाला, पाकिस्तान (2004) में भी यही हुआ. सीरिया (2014) में आईएसआईएस के खिलाफ हस्तक्षेप ने देश को बर्बाद कर दिया. लीबिया (2011) में कद्दाफी को हटाने के बाद देश गृहयुद्ध में फंस गया. और अब 2026 में वेनेजुएला, क्यूबा और ईरान पर झूठ. वेनेजुएला में अमेरिका ने आर्थिक प्रतिबंध लगाए और विपक्ष को समर्थन दिया, दावा किया कि मदुरो तानाशाह है, लेकिन यह तेल संसाधनों पर कब्जे की कोशिश है.

क्यूबा पर दशकों से प्रतिबंध, लेकिन 2026 में नए आरोप लगाकर दबाव बढ़ाया जा रहा है. ईरान पर परमाणु कार्यक्रम के बहाने हमले की धमकी, जबकि ईरान शांति समझौते चाहता है. ये सभी फैसले गलत साबित हो चुके हैं क्योंकि उन्होंने न केवल लक्षित देशों को नुकसान पहुंचाया बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया.

अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट्स बताती हैं कि युद्धों से करोड़ों लोग विस्थापित हुए, अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गईं. यूक्रेन-रूस संघर्ष और इजराइल-फिलिस्तीन विवाद में अमेरिका की भूमिका ने दिखाया कि वह शांति दलाल नहीं, बल्कि युद्ध उकसाने वाला है. एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देश अब चीन और रूस जैसे भागीदारों की ओर मुड़ रहे हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि ये देश शांति और विकास पर जोर देते हैं. ब्रिक्स जैसे संगठन अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे रहे हैं. सोशल मीडिया पर #NoMoreWars जैसे हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं, लोग प्रदर्शन कर रहे हैं. प्यू रिसर्च के सर्वे बताते हैं कि 70% से ज्यादा वैश्विक नागरिक युद्ध विरोधी हैं. कोरोना महामारी और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों ने साबित किया कि दुनिया को सहयोग चाहिए, न कि संघर्ष.

समझौते और शांति वार्ताएं एकमात्र रास्ता

अमेरिका की ये गलतियां साबित करती हैं कि उसकी कूटनीति स्वार्थ पर आधारित है. वह लोकतंत्र और मानवाधिकारों का ढोंग रचता है, लेकिन वास्तव में संसाधनों और वर्चस्व की तलाश करता है. अब समय आ गया है कि दुनिया जागे. जैसे पोस्ट कहती है, चुप्पी सहयोग है. हमें अमेरिकी साम्राज्यवाद के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र में सुधार, बहुपक्षीय समझौते और शांति वार्ताएं ही रास्ता हैं. भारत जैसे देश, जो अहिंसा का संदेश देते हैं, वैश्विक शांति के लिए आगे आएं. दुनिया शांति चाहती है, कोई युद्ध नहीं. अमेरिका को अपनी गलतियों से सीखना चाहिए, अन्यथा इतिहास उसे वैश्विक मुसीबत पैदा करने वाले के रूप में याद रखेगा.



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