आज का भारत अपनी प्राचीन सभ्यता और धूमिल यादों की अस्मिता को पहचान कर वैश्विक पटल पर एक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है. लेकिन इस उदय के साथ ही, एक समानांतर और अदृश्य युद्ध भारत के खिलाफ छेड़ दिया गया है. यह युद्ध सीमाओं पर टैंकों और मिसाइलों से नहीं, बल्कि हमारे दिमागों, शिक्षा, भाषा और सामाजिक व्यवस्था की जड़ों पर लड़ा जा रहा है. लेखक और शोधकर्ता, विप्लव विकास ने अपनी नई पुस्तक में इन्हीं गहरी जड़ों को खोजने और बेनकाब करने का साहसिक प्रयास किया है.
वसुधानंद पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित यह बहुप्रतीक्षित पुस्तक “भारत क्यों निशाने पर?” वर्तमान के किसी तात्कालिक राजनीतिक घटनाक्रम से प्रेरित नहीं है, बल्कि यह लेखक के भीतर सुलगते उन मूलभूत सवालों के उत्तर खोजती है, जो साक्ष्यों और दस्तावेजों के प्रामाणिक पुलिंदे से होकर गुज़रते हैं. आइए, इस वैचारिक यात्रा के उन महत्वपूर्ण पन्नों को खोलते हैं जो यह स्पष्ट करते हैं कि आज भारत वैश्विक ताकतों के निशाने पर क्यों है और हर भारतीय के लिए इसे पढ़ना क्यों आवश्यक है.
नैरेटिव वॉरफेयर (वैचारिक युद्ध) और सत्यान्वेषण की आवश्यकता
हम आज ‘सूचना के युग’ में जी रहे हैं, जो वास्तव में विश्वासों के अभाव का युग बन चुका है. आज का सबसे घातक युद्ध ‘नैरेटिव वॉरफेयर’ है. इतिहास गवाह है कि किसी देश को हमेशा के लिए पंगु बनाने के लिए उसके नागरिकों के मानस पटल को विकृत करना और उनकी अपनी ही संस्कृति के प्रति हीन भावना भरना पर्याप्त होता है.
काफी वर्षों से भारत की न्यायपालिका, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और आंतरिक सुरक्षा ढांचे को एक खास चश्मे से दिखाकर देश को ‘असहिष्णु’ और ‘पिछड़ा’ सिद्ध करने का सुनियोजित प्रयास किया जा रहा है. यह पुस्तक पाठकों को एक विश्लेषणात्मक दृष्टि (Analytical Vision) प्रदान करती है, जो अकाट्य साक्ष्यों (Evidence) पर आधारित है.
जनसांख्यिकीय और सामरिक घेराबंदी
आमतौर पर मतांतरण (Conversion) को एक व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मामला मान लिया जाता है, लेकिन पुस्तक इसके पीछे के गहरे अंतरराष्ट्रीय संजाल को उजागर करती है. पूर्वोत्तर भारत, दक्षिण के तटीय इलाकों और मध्य भारत के खनिज-संपन्न आदिवासी क्षेत्रों में चल रही गतिविधियां कोई संयोग नहीं, बल्कि एक सामरिक घेराबंदी हैं. विदेशी एनजीओ (NGOs) और फंडिंग का इस्तेमाल भारत के सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने और कुडनकुलम या थूथुकुडी जैसी देश की विकास परियोजनाओं को रुकवाने के लिए किया जा रहा है.
भारतीय मानस को बदलने का औपनिवेशिक तंत्र
मिशनरियों और औपनिवेशिक ताकतों ने ‘भारतीय मानस’ (Indian Psyche) को बदलने के लिए तीन मुख्य स्तरों पर काम किया:
शिक्षा प्रणाली का विकृतीकरण: लॉर्ड मैकाले के ब्रिटिश मॉडल को आज भी कॉन्वेंट संस्कृति आगे बढ़ा रही है, जहां बच्चों को अपनी ही परंपराएं ‘अंधविश्वास’ और पश्चिमी जीवनशैली ‘प्रगतिशील’ लगने लगती है.
भाषा और सामाजिक आदतें: अंग्रेजी को ‘एलीट’ और सफलता का एकमात्र पैमाना बनाकर हमारी समृद्ध क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृत को हाशिए पर धकेला गया, जिससे समाज उपभोक्तावादी बन गया.
इतिहास का विकृतीकरण और हीनभावना
“यदि किसी राष्ट्र को नष्ट करना हो, तो सबसे पहले उसके इतिहास को नष्ट कर दो.” पाठ्यपुस्तकों में दशकों तक मुगलों और अंग्रेजों के वैभव को मुख्य स्थान दिया गया, जबकि चोल साम्राज्य के नौसैनिक चमत्कार, विजयनगर की भव्यता, अहोम राजवंश के लाचित बोरफुकन या छत्रपति शिवाजी महाराज के रणनीतिक कौशल को पन्नों में समेट दिया गया. सुश्रुत, आर्यभट्ट और कणाद की वैज्ञानिक खोजों को ‘मिथक’ बताने और हमारी सभ्यता को ‘जातिवादी’ सिद्ध करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अकादमिक सेमिनार आयोजित किए जाते हैं.
हाइब्रिड वॉरफेयर और उभरते भारत की छटपटाहट
आज भारत हथियारों के बिना लड़े जाने वाले ‘हाइब्रिड वॉरफेयर’ (मिश्रित युद्ध) का सामना कर रहा है. जब भी देश में कोई बड़ा सुधार होता है, वैश्विक प्रोपेगैंडा नेटवर्क और टूलकिट सक्रिय हो जाते हैं. हमारे अपने ही संस्थानों में बैठे छद्म बुद्धिजीवी (Pseudo-Intellectuals) और एक्टिविस्ट मानवाधिकारों के नाम पर आंतरिक दुश्मनों का बचाव करते हैं.
“भारत क्यों निशाने पर?” केवल हर उस भारतीय के लिए एक वैचारिक हथियार है जो देश के खिलाफ चल रहे अदृश्य युद्ध को समझना चाहता है.
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.




