एक रिपोर्ट के आंकड़ों से पता चला है कि स्वच्छ ऊर्जा में मजबूत वृद्धि और कम बिजली की मांग के कारण, 2025 की पहली छमाही में भारत के बिजली क्षेत्र से कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन (CO2 Emission) में साल-दर-साल 1% की गिरावट आई है, जो लगभग 50 वर्षों में दूसरी गिरावट है.
कार्बन ब्रीफ के लिए ऊर्जा और स्वच्छ वायु अनुसंधान केंद्र (CREA) द्वारा किए गए एक विश्लेषण के अनुसार, यह गिरावट मुख्य रूप से स्वच्छ ऊर्जा क्षमता में रिकॉर्ड वृद्धि और असामान्य रूप से हल्के मौसम के कारण हुई, जिसने बिजली की मांग को कम कर दिया.
फिनलैंड की राजधानी हेलसिंकी स्थित थिंक टैंक ने जीवाश्म ऊर्जा (Non-Fossil) उत्पादन में 65% गिरावट के लिए धीमी मांग वृद्धि, 20% तेज़ी से स्वच्छ ऊर्जा विस्तार और 15% उच्च जल विद्युत उत्पादन को जिम्मेदार ठहराया. यह विश्लेषण विभिन्न मंत्रालयों और सरकारी संस्थानों से प्राप्त ईंधन खपत, औद्योगिक उत्पादन और बिजली उत्पादन के आधिकारिक मासिक आंकड़ों पर आधारित है.
मार्च और मई के बीच AC का इस्तेमाल कम हुआ
CREA ने कहा कि भारत ने जनवरी-जून की अवधि में 25.1 गीगावाट (GW) नॉन फॉसिल क्षमता जोड़ी है, जो पिछले रिकॉर्ड से 69% अधिक है. साथ ही सालाना लगभग 50 टेरावाट घंटे (TWh) बिजली उत्पादन के लिए पर्याप्त है. मार्च और मई के बीच सामान्य से 42% अधिक तापमान और वर्षा के कारण एयर कंडीशनिंग का उपयोग कम हुआ, जबकि हाइड्रो पावर उत्पादन में वृद्धि हुई.
साथ ही सीआरईए ने यै भी कहा कि जीवाश्म ईंधन उत्पादन में 29TWh की गिरावट आई, जबकि कुल बिजली उत्पादन में 9TWh की वृद्धि हुई. तेल की मांग में वृद्धि भी रुक गई, जिससे व्यापक उत्सर्जन में कमी आई. हालाँकि, सरकारी बुनियादी ढाँचे पर खर्च में वृद्धि के कारण स्टील और सीमेंट से उत्सर्जन में तेज़ी से वृद्धि हुई.
इसके अलावा रिसर्च फर्म ने कहा कि अगर स्वच्छ ऊर्जा में वृद्धि जारी रहती है और मांग अनुमानों के भीतर रहती है, तो भारत के बिजली क्षेत्र का उत्सर्जन 2030 से पहले चरम पर पहुंच सकता है. ऐतिहासिक रूप से भारत की उत्सर्जन वृद्धि में इस क्षेत्र का योगदान आधा रहा है. देश 2030 तक 500 गीगावाट स्वच्छ ऊर्जा जोड़ने का लक्ष्य लेकर चल रहा है.
-भारत एक्सप्रेस
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