LIC के 70 साल
LIC 70 years: भारत में बीमा की बात होते हो रही है और जिस नाम का जिक्र सबसे पहले होता है, वह है LIC. देश के किसी भी हिस्से में चले जाइए, लोगों से पूछिए कि जीवन बीमा कहां से लिया है, तो अक्सर जवाब मिलता है. “LIC की पॉलिसी है.” यही बात बताती है कि सात दशक में Life Insurance Corporation of India ने सिर्फ एक बीमा कंपनी के तौर पर नहीं, बल्कि भारतीय परिवारों के भरोसे के रूप में अपनी जगह बनाई है.
1 सितंबर 1956 को अस्तित्व में आई LIC ने उस दौर में काम शुरू किया, जब देश में बीमा कारोबार कई अलग-अलग कंपनियों और संस्थाओं के हाथ में था. सरकार ने 245 भारतीय और विदेशी बीमा कंपनियों तथा प्रोविडेंट सोसायटियों का राष्ट्रीयकरण कर LIC बनाई. शुरुआत में सरकार ने इसमें 5 करोड़ रुपये की पूंजी लगाई थी. उस समय कंपनी के पास 5 जोनल, 33 डिविजनल और 212 ब्रांच ऑफिस थे.
गांव-गांव तक पहुंचा बीमा
LIC के सामने सबसे बड़ी चुनौती बीमा को आम आदमी तक पहुंचाने की थी. कंपनी ने धीरे-धीरे अपना नेटवर्क बढ़ाया और छोटे शहरों से लेकर ग्रामीण इलाकों तक पहुंच बनाई. कई परिवारों के लिए बीमा का मतलब ही LIC की पॉलिसी बन गया. लंबे समय तक जीवन बीमा बाजार में कंपनी का दबदबा भी रहा.
हालांकि 2000 के बाद निजी बीमा कंपनियों के आने से बाजार में मुकाबला तेज हुआ. नई कंपनियों ने आधुनिक योजनाओं, ऑनलाइन सेवाओं और अलग-अलग निवेश विकल्पों के जरिए ग्राहकों को आकर्षित किया. इसके बावजूद LIC की पकड़ पूरी तरह कमजोर नहीं हुई.
आज भी मजबूत है पकड़
वित्त वर्ष 2025-26 में LIC की कुल प्रीमियम आय 5.36 लाख करोड़ रुपये रही. इस दौरान कंपनी ने करीब 2.5 करोड़ क्लेम सेटल किए. व्यक्तिगत डेथ क्लेम सेटलमेंट रेशियो 99.44 प्रतिशत रहा. नए कारोबार के फर्स्ट-ईयर प्रीमियम में LIC की हिस्सेदारी 56.66 प्रतिशत बताई गई है, जबकि ग्रुप बिजनेस में यह आंकड़ा 70.11 प्रतिशत है. इसी साल कंपनी का मुनाफा 57,419 करोड़ रुपये रहा.
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सात दशक की विरासत
5 करोड़ रुपये की शुरुआती सरकारी पूंजी से शुरू हुई LIC आज देश की सबसे बड़ी जीवन बीमा कंपनियों में शामिल है. 70वीं वर्षगांठ के मौके पर कंपनी ने बीमा प्लैटिनम और जीवन रक्षा जैसे नए प्लान भी पेश किए.
LIC की असली कहानी इन आंकड़ों से कहीं आगे जाती है. इसने बीमा को सिर्फ कागजों और प्रीमियम का कारोबार नहीं रहने दिया, बल्कि इसे भारतीय परिवारों की बचत, सुरक्षा और भविष्य की चिंता से जोड़ दिया. शायद यही वजह है कि आज भी करोड़ों लोगों के लिए “बीमा” और “LIC” एक-दूसरे के पर्याय जैसे लगते हैं.
-भारत एक्सप्रेस
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