अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अचानक फैसले ने H-1B वीज़ा (H-1B Visa) पर नए आवेदनों के लिए $1 लाख का शुल्क लगाने का रास्ता खोल दिया है. इस कदम से अमेरिकी बैंकिंग सेक्टर में हलचल मच गई है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसका सीधा असर भारतीय टेक हब्स मुंबई, बेंगलुरु और हैदराबाद पर पड़ सकता है.
वॉल स्ट्रीट के बड़े बैंक जैसे सिटीग्रुप, जेपी मॉर्गन चेस और गोल्डमैन सैक्स ने भारत के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) में पहले ही भारी निवेश किया हुआ है. ये सेंटर ट्रेडिंग सपोर्ट, रिस्क मैनेजमेंट, तकनीकी सहायता, अकाउंटिंग और क्वांटिटेटिव एनालिसिस जैसी जटिल सेवाएं प्रदान करते हैं. यहां सॉफ्टवेयर इंजीनियर, क्वांट और अकाउंटिंग विशेषज्ञ तैनात हैं, जो कम लागत पर दक्ष सेवाएं उपलब्ध कराते हैं और अमेरिकी बाजार में आसानी से उपलब्ध नहीं होने वाले प्रतिभाशाली कर्मियों तक पहुंच भी देते हैं.
विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप का उद्देश्य अमेरिकी नौकरियों की सुरक्षा करना है, लेकिन नए नियम उलटे भारतीय टेक हब्स के विस्तार को बढ़ावा दे सकते हैं. उमेग छज़्ज़ेड, फाउंडर, अनलेज इन्फोटेक कहते हैं, ‘अगर ऑफशोरिंग पर कोई नई रोक नहीं आती, तो विदेशी बैंक अपने भारतीय कैपेबिलिटी सेंटर्स पर और अधिक भरोसा करेंगे.’
H-1B वीज़ा कार्यक्रम अमेरिकी और भारतीय टेक सेक्टर दोनों के लिए महत्वपूर्ण है. वित्तीय संस्थान और कंसल्टिंग फर्म भी इसका भारी उपयोग करती हैं. वित्त वर्ष 2023 तक H-1B वीज़ा लाभार्थियों में 72.3% भारतीय मूल के थे.
जेपी मॉर्गन के सीईओ जैमी डाइमोन ने मीडिया को बताया, ‘वीजा हमारे लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि हम लोगों को वैश्विक स्तर पर तैनात करते हैं. अमेरिका को आकर्षक गंतव्य बनाये रखना चुनौतीपूर्ण होगा.’
ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स $64 बिलियन के बाजार का हिस्सा हैं
वर्तमान में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स $64 बिलियन के बाजार का हिस्सा हैं और 2019 से 2024 तक इनकी वार्षिक वृद्धि दर लगभग 9.8% रही है. ईवाई की रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्रों की संख्या 2030 तक 2,500 तक बढ़ सकती है, जो अभी 1,700 हैं.
अमेरिकी बैंक इस क्षेत्र में सबसे बड़े नियोक्ता हैं, जिससे वे नई वीज़ा पाबंदियों से बचने के लिए भारत में और अधिक कार्यभार शिफ्ट कर सकते हैं. सिटीग्रुप के पास भारत में 33,000 कर्मचारी हैं, बैंक ऑफ अमेरिका में 27,000 से अधिक, जबकि जेपी मॉर्गन में 55,000 लोग तैनात हैं.
एबिज़र दीवांजी, फाउंडर, नियोस्टार्ट एडवाइजर्स कहते हैं, ‘बैंक अपने ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स की नई रणनीति पर काम कर रहे हैं. इसमें भारत में नए जॉब फंक्शन्स शामिल हो सकते हैं. हालांकि, कोई भी जल्दबाजी नहीं करेगा और स्थिति स्पष्ट होने का इंतजार करेगा.’
एक अध्ययन में यह भी पाया गया कि जब देश कुशल प्रवासियों पर प्रतिबंध लगाते हैं, तो कंपनियां विदेशों में अधिक कर्मचारियों को नियुक्त करती हैं. अध्ययन में सबसे वैश्विक कंपनियां लगभग हर वीज़ा अस्वीकृति पर एक कर्मचारी को विदेश में नियुक्त करती हैं.
भारत अंतरराष्ट्रीय बैंकों के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स है
जेपी मॉर्गन एशिया-प्रशांत के शीर्ष कार्यकारी स्जोर्ड लीनेर्ट ने बताया कि नई फीस मौजूदा H-1B वीज़ा धारकों पर लागू नहीं होती, और पूरी प्रभाव का आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी. हाल ही में भारतीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि H-1B वीज़ा संबंधी नियम अमेरिकी व्यापार वार्ता में चर्चा का विषय नहीं बने हैं.
ट्रिलिगल लॉ फर्म की पार्टनर पार्वती थरमल का कहना है, ‘भारत पहले ही अंतरराष्ट्रीय बैंकों के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स का आधार बन चुका है. नई H-1B प्रतिबंध केवल इस प्रवृत्ति को तेज करेंगे, और अधिक तकनीकी व उच्च मूल्य वाले रोल्स भारत में शिफ्ट होंगे.’
फिर भी अमेरिकी नीतियों में अनिश्चितता के कारण विस्तार योजनाएं कुछ हद तक प्रभावित हो सकती हैं. अमेरिका ने भारत के माल निर्यात पर 50% टैरिफ लगाया है, लेकिन सेवा क्षेत्र पर फिलहाल कोई रोक नहीं है.
ट्रंप के अप्रत्याशित कदमों ने दशकों की अमेरिकी कूटनीति को चुनौती दी है. अगस्त में भारत पर टैरिफ लगाए गए थे, जो रूस से तेल खरीदने के लिए दंड स्वरूप थे. हालांकि व्यापार वार्ता के साथ कुछ तनाव कम हुआ था, लेकिन H-1B पर नई रोक इस समझौते को फिर से अस्थिर कर सकती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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