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CBSE Class 9: तीन भाषा नीति और गायब किताबें! जानिए कैसे सुलग रहा है 9वीं के छात्रों का भविष्य

Three Language Policy: सीबीएसई की तीन-भाषा नीति में बदलाव और नौवीं कक्षा की एनसीईआरटी पाठ्यपुस्तकों में देरी से छात्र, शिक्षक और अभिभावक दबाव में हैं. नीतिगत उलझनों के बीच छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है.

किताबों की देरी और नीतिगत बदलावों से जूझते सीबीएसई कक्षा 9 के छात्र.

(AI IMAGE)

Three Language Policy: वर्ष 2026 में सीबीएसई (CBSE) कक्षा 9 के छात्रों के लिए शैक्षणिक सत्र काफी उथल-पुथल भरा रहा है. एक तरफ जहां तीन-भाषा नीति (Three-Language Policy) को लेकर जारी हुए विरोधाभासी सर्कुलरों ने भ्रम की स्थिति पैदा की, वहीं दूसरी तरफ एनसीईआरटी (NCERT) की नई किताबों में हुई देरी ने छात्रों और अभिभावकों की चिंताओं को बढ़ा दिया है. शिक्षा सुधार के नाम पर हो रहे इन बदलावों का सीधा असर बच्चों की पढ़ाई और मानसिक स्थिति पर पड़ रहा है.

सीबीएसई की तीन-भाषा नीति में बार-बार किए गए बदलावों और एनसीईआरटी की मुख्य पाठ्यपुस्तकों में हुई देरी ने कक्षा 9 के छात्रों के शैक्षणिक वर्ष को अनिश्चितता में डाल दिया है. नीतियां और पाठ्यक्रम बदलते समय समय पर संसाधन उपलब्ध न कराने की इस प्रणालीगत विफलता का सीधा नुकसान छात्रों को उठाना पड़ रहा है, जो बिना किताबों के आगामी बोर्ड परीक्षाओं की तैयारी के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

तीन-भाषा नीति का भ्रम और सर्कुलर का जाल

सत्र की शुरुआत में ही सीबीएसई ने भाषा नीति को लेकर अस्पष्टता पैदा कर दी. 9 अप्रैल को जारी अधिसूचना में कहा गया कि तीसरी भाषा (R3) का नियम 2029-30 सत्र तक लागू नहीं होगा. लेकिन केवल पांच हफ्ते बाद, 15 मई को एक नया सर्कुलर जारी कर 1 जुलाई से तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य कर दिया गया, जिसमें दो भारतीय भाषाएं होना आवश्यक थीं. इस अचानक हुए बदलाव ने अभिभावकों और स्कूलों को भ्रम में डाल दिया, जिससे यह मामला कानूनी चुनौती तक पहुंच गया. आखिरकार 29 जून को दिशा-निर्देश जारी कर पुरानी कक्षाओं के छात्रों को कुछ राहत दी गई.

सत्र के मध्य में भी किताबों का इंतजार

भाषा नीति के विवाद के बीच एक और बड़ी समस्या खड़ी हो गई- किताबों की कमी. राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF-SE 2023) के तहत कक्षा 9 का नया पाठ्यक्रम तो लागू कर दिया गया, लेकिन एनसीईआरटी की किताबें समय पर नहीं पहुंचीं. अप्रैल में सत्र शुरू होने के बावजूद गणित और सामाजिक विज्ञान जैसे मुख्य विषयों की पार्ट-1 (Part-I) किताबें काफी देर से मिलीं, जबकि पार्ट-2 (Part-II) की किताबों का इंतजार सितंबर तक बना हुआ है.

डिजिटल विकल्प बनाम ठोस शिक्षा

किताबों की अनुपलब्धता के कारण शिक्षकों को पीडीएफ और डिजिटल सामग्री का सहारा लेना पड़ रहा है. हालांकि यह एक अस्थायी समाधान हो सकता है, लेकिन यह एक स्थायी और व्यवस्थित शिक्षा प्रणाली का विकल्प नहीं बन सकता. बिना किताबों के छात्रों के लिए रिवीजन करना, नोट्स बनाना और अभिभावकों के लिए बच्चों की पढ़ाई में मदद करना बेहद कठिन साबित हो रहा है.

प्रणालीगत खामियों का खामियाजा भुगतते छात्र

दिसंबर 2025 की अपनी बैठक में सीबीएसई गवर्निंग बॉडी ने खुद माना था कि क्षेत्रीय भाषाओं की किताबें उपलब्ध न होने पर पुरानी व्यवस्था ही लागू रखी जाए. इसके बावजूद, नई पाठ्यपुस्तकों के बिना ही नया पाठ्यक्रम शुरू कर दिया गया. एनसीईआरटी का कहना है कि समीक्षा और छपाई प्रक्रिया के कारण देरी हुई है और किताबें जल्द आ जाएंगी, लेकिन परीक्षा के करीब पहुंचते समय में ‘जल्द’ की कोई स्पष्ट तारीख न होना छात्रों के भविष्य पर भारी पड़ रहा है.

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-भारत एक्सप्रेस



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