नीतीश कुमार ने क्यों घटाया यादव और मुस्लिम उम्मीदवारों का कोटा? क्या है JDU का नया चुनावी गणित? पढ़ें-EXPLAINER
Bihar Election 2025: बिहार की राजनीतिक में जाति हमेशा से निर्णायक रही है. राजनीतिक दल अपने चुनावी समीकरणों में जातिगत पहचान को ज्यादा तवज्जो देते हैं. चाहे वो तेजस्वी के नेतृत्व में अपनी सियासी जमीन खोज रही राष्ट्रीय जनता दल (राजद) हो या फिर चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) हो. सभी राजनीतिक दल अपने उम्मीदवारों के चयन में जातिगत संरचनाओं को बेहद अहम मानते हैं और उसी अनुसार अपने उम्मीदवार तय करते हैं.
बिहार के सोशल इंजीनियरिंग के प्रोफेसर कहे जाने वाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने सभी 101 सीटों पर उम्मीदवार घोषित कर दिये हैं, लेकिन इस बार उनके चुनावी गणित के फॉर्मूले में आमूलचूल बदलाव देखने को मिल रहा है. जदयू के उम्मीदवारों का आकलन करने पर यह पता चलता है कि उन्होंने अपना ध्यान पिछड़े वर्गों से हटाकर अति पिछड़ों पर शिफ्ट कर दिया है.
जदयू ने बदली अपनी रणनीति
पहले नीतीश कुमार के टिकट बंटवारे में पिछड़ा और मुस्लिम समीकरणों का बेहद ध्यान रखा जाता था, लेकिन इस बार परिस्थिति कुछ बदली-बदली दिख रही है. अब उनका ध्यान अति पिछड़ों और सवर्णों पर केंद्रित हो गया है. पिछड़े वर्गों में पहले जहां यादवों का प्रतिनिधित्व 18 था. वहीं यह घटकर अब सिर्फ 8 पर आ चुका है.

क्या है जदयू का जातीय संरचना?
बिहार विधानसभा चुनाव में NDA के सीट बंटवारे के तहत जदयू और भाजपा के कोटे में 101 सीटें आई. यह पहली बार ही हुआ कि बिहार में जदयू और बीजेपी बराबर सीटों पर लड़ेंगी. पहले जदयू हमेशा से बड़े भाई की भूमिका में रही. उसे हर बार टिकट बंटवारे में ज्यादा सीटें मिलती रही हैं. जदयू ने अपने सभी सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है.
जदयू के सभी उम्मीदवारों की जातीय और समाजिक संरचना के हिसाब से विश्लेषण करने पर पता चलता है कि नीतीश कुमार ने इस बार पिछड़े वर्ग से 38 सीटें, अति पिछड़ा वर्ग से 22, अनुसूचित जाति/जनजाती समुदाय से 16, मुस्लिम से 4 और उच्च जातियों से 22 उम्मीदवारों को टिकट दिया है.
क्या साधना चाहते हैं नीतीश कुमार?
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने टिकट बंटवारे में अति पिछड़े वर्ग को ज्यादा तवज्जो दी है, इसका कारण बिहार की आबादी में छिपा है. बिहार में हुए जाति सर्वेक्षण के अनुसार बिहार में पिछड़ा वर्ग की आबादी जहां 27 प्रतिशत है, तो वहीं अति पिछड़ा वर्ग 36 प्रतिशत है. जदयू के उम्मीदवारों के जातिगत अनुपात में यह आंकड़े साफ नहीं होते, लेकिन इसे पिछली बार से तुलना करेंगे तो आंकड़ों में फर्क साफ-साफ दिखेगा.
2020 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो जहां पिछली बार पिछड़े समाज से जदयू ने 43 प्रतिशत लोगों को टिकट दिया था. जो इस बार घटकर 37 प्रतिशत रह गया है. वहीं 2020 में अति पिछड़ा समाज को 14 फीसदी टिकट दिया था, वो इस बार 6 प्रतिशत बढ़कर 20 प्रतिशत हो गया है.
अगर हम SC/ST उम्मीदवारों के प्रतिशत की बात करें तो 2020 के विधानसभा चुनाव में जहां 14.7 प्रतिशत लोगों को टिकट दिया गया था, जो इस बार बढ़कर 15.84 प्रतिशत हो गया है.
मुस्लिम टिकटों में की भारी कटौती
2025 के विधानसभा चुनाव में जदयू ने मुस्लिम समुदाय को दी जाने वाली टिकटों में भी कटौती की है. साल 2020 के विधानसभा चुनाव में जहां 9.5 प्रतिशत मुस्लिम समुदाय के उम्मीदवारों को टिकट दिया गया था. वो अब घटकर 3.9 प्रतिशत रह गया है. वहीं अगर सवर्ण उम्मीदवारों की बात करें तो 2025 के विधानसभा चुनाव में सवर्णों के टिकट में अप्रत्याशित बढ़ोतरी दिख रही है. 2020 के विधानसभा चुनाव में जहां 17 प्रतिशत सवर्ण उम्मीदवारों को टिकट दिया गया था, वो इस बार बढ़कर 21.79 प्रतिशत हो गया है.
सवर्णों में राजपूत-भूमिहारों पर भरोसा
जदयू ने सवर्णों में इस बार राजपूत और भूमिहारों पर ज्यादा भरोसा जताया है. इसके अलावा ब्राह्मण और कायस्थ समाज से भी अपने उम्मीदवार उतारे हैं. संख्या के हिसाब से देखें तो जदयू ने राजपूत 10, भूमिहार 9, ब्राह्मण 2 और कायस्थ को 1 सीटें दी है.
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यादव उम्मीदवारों के सीटों में भारी कटौती
लव-कुश की पार्टी कही जाने वाली जदयू ने इस बार पिछड़ी जातियों के उम्मीदवारों में कमी की है. यहां लव का अर्थ कुर्मी और कुश का अर्थ कुशवाहा है. नीतीश कुमार के द्वारा बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के उम्मीदवारों की सूची में इन दोनों जातियों की संख्या अच्छी है. जिसमें कुशवाहा को 13 और कुर्मी को 12 सीटों पर उतारा गया है. लेकिन इस बार यादव जाति के उम्मीदवारों की संख्या में काफी कमी आई है. 2020 के विधानसभा चुनाव में जहां जदयू ने 18 यादव उम्मीदवारों को टिकट दिया था. वो इस बार घटकर 8 पर आ गई है.
नीतीश कुमार को बिहार के सोशल इंजीनियरिंग का प्रोफेसर कहा जाता है. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि नीतीश कुमार इस बार कोई रिस्क नहीं लेना चाहते हैं. इस बार उन्हीं लोगों को टिकट दिया गया है जिनकी जमीन पर अच्छी पकड़ है. उनके पास महिला वोटबैंक का सपोर्ट है. इसलिए अपने टिकट बंटवारे में उन्होंन इसका भी ध्यान रखा है.
-भारत एक्सप्रेस
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