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‘साधु’ से लेकर ‘बाहुबली’ बनने तक! अनंत सिंह की अनसुनी कहानी, 9 साल की उम्र में पहली बार हुए थे गिरफ्तार

Bihar ke Bahubali: अनंत सिंह उर्फ छोटे सरकार बिहार की राजनीति का ऐसा नाम है, जिसकी कहानी अपराध और राजनीति के बीच की जंग को बयां करती है. मोकामा विधानसभा सीट से चार बार विधायक रह चुके अनंत सिंह 2025 के चुनाव में फिर दावा ठोंकने की तैयारी में हैं. जानिए उनकी दबंगई, अपराध और राजनीति से जुड़ा पूरा सफर.

Bihar ke Bahubali

Bihar ke Bahubali: पटना से 28 किलोमीटर दूर एक इलाका पड़ता है नाम है फतुहा. फतुहा से लेकर लखीसराय विधानसभा क्षेत्र का इलाका ‘टाल’ कहा जाता है. इस टाल इलाके में दलहन की पैदावार काफी ज्यादा होती है. टाल इलाके का अधिकतर क्षेत्र मोकामा विधानसभा में पड़ता है. जिसपर एक बिहार के सबसे शक्तिशाली व्यक्तियों में से एक अनंत सिंह का राज चलता है. ताकत ऐसी कि उसके चाहने वाले उसे छोटे सरकार कहते हैं.

मोकामा विधानसभा से अनंत सिंह लगातार 4 बार के विधायक रहे हैं. 2020 के विधानसभा चुनाव में उनकी पत्नी इस सीट से विधायक बनीं. अब 2025 के विधानसभा चुनाव में अनंत सिंह फिर से इस विधानसभा सीट पर अपना दावा ठोंकना चाह रहे हैं. इसके लिए वो लगातार राजनीतिक दलों के दरवाजे खटखटा रहे हैं. अपराधी से माननीय बने अनंत सिंह की क्या है कहानी? क्यों लोग उसे छोटे सरकार कहते हैं? आइये बताते हैं.

9 साल की उम्र में पहली बार हुए गिरफ्तार

अनंत सिंह का जन्म 1 जुलाई 1961 को हुआ था. अपराध और जेल से अनंत सिंह का बचपन से नाता रहा है. वे हत्या के मामले में पहली बार 9 साल की उम्र में अरेस्ट हुए थे. 15 साल के आते-आते उन्हें दूसरी बार जेल जाना पड़ा. इसके बाद तो अनंत सिंह ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. हत्या, अपहरण, आर्म्स एक्ट सहित कई धाराएं एक के बाद एक अनंत सिंह के सीने पर मेडल की तरह लगती चली गईं.

एक बार की बात है अनंत सिंह का मन दुनियादारी से उचट जाता है. वो सबकुछ छोड़कर साधु बनने अयोध्या और हरिद्वार चले गए. जिस साधुओं के दल में वो रह रहे थे वहां उनका झगड़ा हो गया. इसी बीच उनके भाई बिरंची सिंह की हत्या हो जाती है. भाई की मौत की खबर सुनते ही अनंत सिंह पर बदला लेने का भूत सवार हो जाता है. एक दिन पता चलता है कि उनके भाई के हत्यारे नदी के किनारे बैठे हैं. फिर क्या था. अनंत सिंह नदी पार कर हत्यारों के पास जाते हैं और उसकी गोली मारकर हत्या कर देते हैं. इस हत्या के बाद अनंत सिंह का पूरे इलाके में नाम हो जाता है.

भूमिहारों के रक्षक के रूप में उभरे अनंत सिंह

अपराध में नाम होते ही अनंत सिंह जमीन कब्जाने, अपहरण, रंगदारी और अन्य आपराधिक कामों में संलिप्त हो जाते हैं. अनंत सिंह जिस बाढ़ इलाके में अपना दबदबा बना रहे होते हैं वो इलाका राजपूतों और भूमिहारों के बीच खूनी जंग के लिए बदनाम था. लोग रात के समय घरों से बाहर निकलने में डरते थे. इसी दौरान अनंत सिंह भूमिहारों के बीच एक रक्षक के रूप में उभरे.

रौबदार मूंछें और काउबॉय अवतार में दिखने वाले अनंत सिंह ने दोस्ती और दुश्मनी बराबर पालीं. उनपर कई बार हमले हुए, लेकिन वो बच गए. एक बार की बात है वो छत पर सो रहे होते हैं. तभी उनके विरोधियों ने उनपर हमला कर दिया. गोली अनंत सिंह के पीठ में लगी और सीने में अटक गई. अनंत सिंह को आनन-फानन में पटना में एक नर्सिंग होम ले जाया गया. वहां पर अनंत सिंह के विधायक भाई दिलीप सिंह खड़े होकर उनका इलाज कराते हैं. बताया जाता है कि अनंत पर हमला उनके दुश्मन विवेका पहलवान ने कराया था.

राजनीति में इंट्री

अनंत सिंह के बड़े भाई दिलीप सिंह बिहार में एक दबंग नेता माने जाते थे. वो मोकामा से विधायक थे. दिलीप सिंह लालू प्रसाद यादव की सरकार में मंत्री भी रहे थे. जिस नेता के लिए दिलीप सिंह बूथ कब्जाने का काम करते थे, बाद में उसी नेता को हराकर वो मोकामा से विधायक बने थे. दिलीप सिंह अपने दबदबे के लिए एक ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहे थे जो इलाके में अपना वर्चस्व कायम रख सके. उनकी यह शर्त अनंत सिंह ने पूरा किया.

साल 1994 की बात है. लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बन चुके होते हैं. मुख्यमंत्री बनने से पहले लालू यादव ने नीतीश कुमार से लेकर रामविलास पासवान तक सबको साइड कर दिया था. जब 1996 का लोकसभा चुनाव आया तो नीतीश को चुनाव की चिंता सताने लगी. वे बाढ़-मोकामा से ऐसे नेता की तलाश कर रहे थे जिसकी इलाके पर पकड़ हो और वो दबदबे वाला हो. उनकी तलाश अनंत सिंह पर खत्म हुई. अनंत सिंह ने भी नीतीश कुमार की खूब मदद की.

साल 2005 में नीतीश कुमार ने अनंत सिंह के एहसान का बदला अपनी पार्टी से टिकट देकर पूरा किया. उन्होंने मोकामा विधानसभा से अनंत सिंह को टिकट देकर उतारा और अनंत सिंह चुनाव जीत जाते हैं. उस समय नीतीश कुमार के इस कृत्य की चारों तरफ आलोचना हो रही थी. क्योंकि नीतीश कुमार लालू यादव के जंगलराज के खिलाफ ही मोर्चा खोलकर जनता के बीच जा रहे थे. और वहीं नीतीश दूसरी तरफ अनंत सिंह को पार्टी का टिकट दिया. हालांकि नीतीश कुमार ने इन आलोचनाओं की कभी परवाह नहीं की.

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कब सितारे गर्दिश में गए?

साल 2015 की बात है. अनंत सिंह विधायक बनकर पटना में रह रहे थे. तभी उनके घर की किसी महिला को मोकामा में 4 लड़कों के ग्रुप ने छेड़ दिया. सूचना अनंत सिंह के पास पहुंची. ये सुनते ही अनंत सिंह गुस्से से भर गए. उन्होंने पटना से कुछ लोगों को छेड़खानी करने वाले लोगों को सबक सिखाने के लिए भेजा. इस दौरान पटना के एसएसपी जीतेंद्र राणा थे. ये खबर उनके पास भी पहुंची. फिर क्या था. राणा ने भी पुलिस को मौके पर भेजा. जबतक पुलिस मोकामा पहुंची तबतक अनंत सिंह के लोग 3 लड़कों को पकड़कर अधमरा कर चुके थे. बस वो कुछ देर में मरने ही वाले थे. तबतक पुलिस मौके पर पहुंचकर उन्हें बचा लेती है. इस मामले में पुलिस ने 4 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया. तभी पता चलता है कि अनंत सिंह के लोगों ने एकसाथ 4 लोगों को उठाया था. चौथे व्यक्ति का कोई अता-पता नहीं चलता है. अगले दिन अनंत सिंह के गांव लदमा के एक खेत से एक शव बरामद होता है. यह शव उसी चौथे व्यक्ति का होता है जिसे अनंत सिंह के लोगों ने उठाया था. इस चौथे व्यक्ति की पहचान पुटूस यादव के रूप में हुई.

इस मामले को लेकर एसएसपी जीतेंद्र राणा बेहद गुस्सा हो गए. उन्होंने पुलिस दलबल के साथ अनंत सिंह के आवास पर पहुंचे और 5 लोगों को उठा लिया. पुलिस के पूछताछ में आरोपियों ने स्वीकार किया कि उन्हें ये काम अनंत सिंह ने करने के लिए कहा था.

एसएसपी जीतेंद्र राणा ने की कार्रवाई

फिर क्या था. एसएसपी राणा ने अनंत सिंह के आवास पर छापेमारी शुरू कर दी. पुलिस को जदयू विधायक के घर से खून से सना कपड़ा मिला. इसके अलावा इंसास रायफल की मैगजीन भी बरामद हुई. पुलिस की छापेमारी में अनंत सिंह के घर से कई अन्य हथियार भी मिले. जिसके बाद एसएसपी ने अनंत सिंह को गिरफ्तार करने की योजना बनाई.

तबतक मामला हाईलाइट हो गया और एसएसपी जीतेंद्र राणा का ट्रांसफर कर दिया गया. हालांकि नए एसएसपी विकास वैभव ने इस कार्रवाई को बखूबी अंजाम दिया और अनंत सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया.

फिर चुनावी ताल ठोकेंगे अनंत सिंह

अब अनंत सिंह एक बार फिर चुनावी मैदान में उतरने के लिए बेकरार हैं. उन्होंने कुछ दिनों पहले ही नीतीश कुमार के साथ मेलजोल बढ़ाना शुरू कर दिया है. नीतीश कुमार की तारीफों के पुल बांधते हुए उन्होंने कहा कि नीतीश ने जनता के लिए काम किया है और आगे भी करेंगे. वे अभी 25 साल और काम करेंगे. अब देखना होगा कि क्या नीतीश कुमार एक बार फिर अनंत सिंह को मोकामा से चुनावी मैदान में उतारते हैं या फिर उन्हें निर्दलीय ही भाग्य आजमाना पड़ेगा.

– भारत एक्सप्रेस



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