West Bengal Results: 4 मई 2026 को आ रहे चुनावी रुझान कांग्रेस पार्टी के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं हैं. पश्चिम बंगाल की 294 सीटों के लिए हुई मतगणना में कांग्रेस कहीं भी मुख्य मुकाबले में नजर नहीं आ रही है. जहाँ एक तरफ भाजपा निर्णायक बढ़त की ओर है और ममता बनर्जी की टीएमसी उसे कड़ी टक्कर दे रही है, वहीं कांग्रेस की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है. जानकारों का मानना है कि पार्टी के पास अब राज्य में खोने के लिए कुछ खास बचा नहीं है.
राहुल गांधी की रणनीति पर सवाल
इस चुनाव में राहुल गांधी ने बंगाल में कई रैलियां कीं और टीएमसी व भाजपा दोनों पर निशाना साधा. हालांकि, शुरुआती रुझानों को देखकर ऐसा लगता है कि जनता ने कांग्रेस के ‘तीसरे विकल्प’ वाले दावे को पूरी तरह नकार दिया है. कांग्रेस ने इस बार स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का फैसला किया था, लेकिन वोटरों का ध्रुवीकरण मुख्य रूप से टीएमसी और भाजपा के बीच ही रहा. इससे कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में भी भारी सेंध लगी है.
कांग्रेस के वोट शेयर में गिरावट
पिछले कुछ चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालें तो बंगाल में कांग्रेस का ग्राफ लगातार नीचे गिरा है. 2021 के चुनाव में भी पार्टी का खाता नहीं खुला था. 2026 के इन चुनावों में पार्टी को उम्मीद थी कि वह वापसी करेगी, लेकिन रुझान बताते हैं कि कांग्रेस के वोट शेयर में और भी कमी आई है. मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे जिले, जो कभी कांग्रेस के मजबूत गढ़ माने जाते थे, वहां भी अब पार्टी की पकड़ ढीली होती दिख रही है.
क्या अब वापसी मुमकिन है?
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बंगाल में कांग्रेस के लिए अब “करो या मरो” वाली स्थिति है. यदि पार्टी इस बार भी खाता खोलने में नाकाम रहती है, तो कार्यकर्ताओं का मनोबल पूरी तरह टूट सकता है. टीएमसी के साथ गठबंधन न करना और अकेले चुनाव मैदान में उतरना पार्टी के लिए आत्मघाती साबित होता दिख रहा है. बंगाल की राजनीति अब पूरी तरह से दो ध्रुवीय (Bipolar) हो गई है, जहाँ छोटी पार्टियों और कांग्रेस जैसे पुराने दलों के लिए जगह लगातार कम होती जा रही है.
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