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विपक्षी एकता की नई जद्दोजहद: बिखराव के बाद अब फिर जोड़ने की कोशिश में कांग्रेस

लोकसभा चुनाव 2024 के बाद विपक्षी एकता बिखरती नजर आई, लेकिन अब कांग्रेस एक नई शुरुआत की कोशिश में है, ताकि साझा मुद्दों पर गठबंधन को फिर से मजबूत किया जा सके.

Congress OBC leadership
Vijay Ram Edited by Vijay Ram

लोकसभा चुनाव 2024 के परिणामों के बाद विपक्षी एकता की तस्वीर पहले से कहीं ज्यादा धुंधली और बिखरी हुई नजर आई. हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली में करारी हार के बाद विपक्षी खेमा राजनीतिक सुस्ती और आपसी खींचतान का शिकार हो गया. नतीजतन, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जो “INDIA” गठबंधन की धुरी रही थी, खुद को अकेला और नेतृत्व के संकट में पाती दिखी.

बिखरती विपक्षी गोलबंदी

टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ने जहां विपक्ष का नेतृत्व अपने हाथ में लेने की पुरजोर कोशिशें की, वहीं शरद पवार और उद्धव ठाकरे जैसे दिग्गज नेता किनारे बैठते नजर आए। सबसे चौंकाने वाला रवैया शरद पवार का रहा, जिन्होंने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान संसद का विशेष सत्र बुलाने की विपक्षी मांग से खुद को दूर कर लिया. वहीं, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के नेता इमरान मसूद सपा पर तीखे हमले करते दिखे, तो बिहार में आरजेडी को नाराज़ कर कांग्रेस ने अपने प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह को बदल दिया.

यह संकेत साफ हैं कि विपक्षी दलों के भीतर सामंजस्य की कमी और रणनीतिक मतभेद उभर कर सामने आए हैं। आम आदमी पार्टी से कांग्रेस का रिश्ता पहले ही टूट चुका है और अब सपा-राजद जैसे पुराने सहयोगी दलों के साथ भी संबंधों में गर्मजोशी नहीं दिख रही.

परिवर्तन की आहट:

एक नई शुरुआत की कोशिश इन निराशाजनक संकेतों के बीच कांग्रेस को लगता है कि हाल के घटनाक्रम—जैसे जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में आतंकी हमला, सीजफायर को लेकर ट्रंप के दावे, और विभिन्न राज्यों में चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठते सवाल—विपक्षी एकता को नई धार देने का मौका बन सकते हैं। खासकर महाराष्ट्र के बाद अब उत्तर प्रदेश, बिहार और बंगाल में भी ECI पर उठते सवाल विपक्ष के लिए एक साझा मंच तैयार कर सकते हैं.

इसी के मद्देनजर सूत्रों ने बताया कि कांग्रेस संसदीय दल की नेता सोनिया गांधी के नेतृत्व में एक बड़ी विपक्षी बैठक की तैयारी की जा रही है. पार्टी का मानना है कि सोनिया गांधी की सियासी साख और नेतृत्व क्षमता विपक्षी नेताओं को एक साथ बैठने और साझा एजेंडा तय करने के लिए एक मंच पर ला सकता यह. बैठक का मकसद आगामी मानसून सत्र में सरकार को संगठित और रणनीतिक तरीके से घेरना है.

आम आदमी पार्टी: अलग राह पर या समान मंज़िल की तलाश में?
आप पार्टी को लेकर स्थिति अब भी स्पष्ट नहीं है।कांग्रेस उसे साथ लेने के पक्ष में नहीं है, और बाकी सहयोगी दल भी उसकी भूमिका को लेकर भ्रम में हैं. संभव है कि आप पार्टी कांग्रेस की बुलाई बैठकों से दूर रहे, लेकिन टीएमसी जैसे दलों के जरिए कॉमन मुद्दों पर अपनी राय विपक्ष को परोक्ष रूप से दे। ऑपरेशन सिंदूर पर संसद के विशेष सत्र की मांग इसका उदाहरण है, जिसमें आप ने बैठक में शामिल न होते हुए भी अलग से चिट्ठी भेजकर सत्र की मांग की.

भले ही विपक्षी खेमे में आपसी खींचतान और असहमति अभी भी मौजूद है, लेकिन ताजा घटनाएं एकजुटता की नई संभावनाओं के द्वार खोल रही हैं. कांग्रेस यदि इस मौके को रणनीतिक रूप से साध पाती है और साझा मुद्दों को केंद्र में रखकर गठबंधन को पुनः मजबूती देती है, तो मानसून सत्र में विपक्ष एक बार फिर सरकार पर प्रभावी हमला कर सकता है.



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