तमिलनाडु में बड़ा उलटफेर: कोलाथुर सीट पर सीएम एमके स्टालिन हारे, वीएस बाबू ने रचा इतिहास
4 मई 2026 की तारीख तमिलनाडु की राजनीति के इतिहास में एक नए अध्याय के रूप में दर्ज हो गई है. राज्य विधानसभा चुनाव के नतीजों में सबसे बड़ा उलटफेर कोलाथुर विधानसभा सीट पर देखने को मिला है. यहाँ मुख्यमंत्री और डीएमके (DMK) प्रमुख एमके स्टालिन को उन्हीं के पूर्व सहयोगी वीएस बाबू ने एक करीबी मुकाबले में हरा दिया है. मुख्यमंत्री का अपनी ही सीट से हार जाना न केवल डीएमके के लिए शर्मिंदगी की बात है, बल्कि यह राज्य में सत्ता परिवर्तन की लहर का सबसे बड़ा संकेत भी है.
कौन हैं वीएस बाबू?
वीएस बाबू कोई नया नाम नहीं हैं, लेकिन इस जीत ने उन्हें रातों-रात तमिलनाडु का हीरो बना दिया है. बाबू की राजनीतिक यात्रा डीएमके से ही शुरू हुई थी. वे कभी मुख्यमंत्री स्टालिन के बेहद करीबी माने जाते थे और डीएमके के टिकट पर ही पहली बार विधायक बनकर विधानसभा पहुंचे थे. हालांकि, समय के साथ मतभेद बढ़े और उन्होंने पार्टी का साथ छोड़ दिया. इस चुनाव में वे थलपति विजय की पार्टी ‘तमिलगा वेत्री कड़गम’ (TVK) के टिकट पर मैदान में थे. उन्होंने स्टालिन के खिलाफ एक आक्रामक चुनाव प्रचार अभियान चलाया, जिसका परिणाम आज सबके सामने है.
कैसे हुआ यह ‘बड़ा उलटफेर’?
कोलाथुर सीट को एमके स्टालिन का अभेद्य किला माना जाता था. 2011 से ही वे यहाँ से लगातार जीतते आ रहे थे. लेकिन इस बार वीएस बाबू ने स्थानीय मुद्दों को हवा दी. उन्होंने स्टालिन पर आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र की अनदेखी की है. बाबू ने घर-घर जाकर लोगों से संपर्क किया और खुद को ‘मिट्टी का लाल’ बताया. इसके अलावा, अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी का युवाओं के बीच बढ़ता क्रेज भी बाबू के पक्ष में गया. युवाओं ने बदलाव के लिए बढ़-चढ़कर वीएस बाबू को वोट दिया.
हार के पीछे के अन्य बड़े कारण
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि स्टालिन की हार के पीछे केवल वीएस बाबू की लोकप्रियता नहीं, बल्कि सरकार के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी भी एक बड़ी वजह रही. भ्रष्टाचार के आरोप, परिवारवाद की राजनीति और हाल के वर्षों में बढ़ी महंगाई ने जनता के एक बड़े वर्ग को डीएमके से दूर कर दिया. वहीं, वीएस बाबू ने अपनी पुरानी पार्टी की कमजोरियों को बखूबी समझा और उन्हीं पर चोट की. उन्होंने उन इलाकों में ज्यादा मेहनत की जहाँ पारंपरिक रूप से डीएमके मजबूत थी.
तमिल की सत्ता में बदलाव की आहट
स्टालिन की इस हार ने डीएमके के भविष्य पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. जब पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा ही अपनी सीट नहीं बचा पाया, तो राज्य के अन्य हिस्सों में पार्टी की पकड़ का अंदाजा लगाया जा सकता है. दूसरी ओर, वीएस बाबू की यह जीत टीवीके (TVK) और विजय के लिए संजीवनी साबित हुई है. यह नतीजा बताता है कि तमिलनाडु की जनता अब करुणानिधि और जयललिता की विरासत से आगे बढ़कर नए विकल्पों को तलाश रही है. वीएस बाबू की इस जीत ने साबित कर दिया है कि राजनीति में कोई भी किला अभेद्य नहीं होता.
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