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गांधीनगर में गूंजा ‘जय भवानी जय शिवाजी’: अमित शाह ने किया महाराज की 21 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा का लोकार्पण

गृह मंत्री अमित शाह ने गांधीनगर में छत्रपति शिवाजी महाराज की 21 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा का लोकार्पण किया. उन्होंने महाराज को ‘राष्ट्ररक्षा का प्रेरणास्तंभ’ बताते हुए कहा कि उनका स्वराज, स्वभाषा और स्वधर्म का संकल्प आज के भारत की भी नींव है.

Amit Shah Gandhinagar Visit

गुजरात की राजधानी गांधीनगर में आज का दिन इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया. मौका था हिंदवी स्वराज के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज की एक भव्य प्रतिमा के अनावरण का. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने अपने संसदीय क्षेत्र गांधीनगर में इस विशाल प्रतिमा का लोकार्पण किया. यह प्रतिमा न केवल शहर की शोभा बढ़ाएगी, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को शिवाजी महाराज के साहस और ‘स्वराज’ के संकल्प की याद भी दिलाती रहेगी.

इस खास अवसर पर अमित शाह ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी भावनाओं को साझा किया और शिवाजी महाराज के योगदान को देश के लिए एक प्रेरणा स्तंभ बताया.

अमित शाह ने अपने ट्वीट में क्या कहा?

गृह मंत्री अमित शाह ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए ‘एक्स’ पर लिखा, ‘आज गांधीनगर में, हिंदवी स्वराज के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज जी की भव्य प्रतिमा के लोकार्पण का सौभाग्य प्राप्त हुआ. स्वभाषा, स्वसंस्कृति व स्वधर्म की रक्षा का अल्पायु में ही संकल्प लेने वाले छत्रपति शिवाजी महाराज जी हम सभी के लिए सदैव राष्ट्ररक्षा के प्रेरणास्तंभ रहेंगे.’

क्या है इसकी खासियत?

गांधीनगर के सेक्टर-21 में स्थापित छत्रपति शिवाजी महाराज की यह प्रतिमा 21 फीट ऊंची है. यह एक अश्वारूढ़ प्रतिमा है, जिसमें महाराज अपने घोड़े पर सवार नजर आ रहे हैं. इस मूर्ति को महाराष्ट्र समाज गांधीनगर द्वारा तैयार करवाया गया है. लोकार्पण के दौरान गृह मंत्री ने कहा कि यह प्रतिमा केवल पत्थर और धातु का ढांचा नहीं है, बल्कि यह उस अटूट संकल्प का प्रतीक है जिसने मुगल साम्राज्य की नींव हिला दी थी.

शिवाजी महाराज और ‘स्वराज’ का संकल्प

अमित शाह ने समारोह के दौरान शिवाजी महाराज के शुरुआती संघर्षों को याद किया. उन्होंने बताया कि कैसे मात्र 16 साल की उम्र में, जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, शिवाजी महाराज ने ‘रायेश्वर मंदिर’ में स्वराज की शपथ ली थी. उस समय किसी ने सोचा भी नहीं था कि एक युवा लड़का बिना किसी बड़ी सेना या संसाधनों के मुगलों और आदिलशाही सुल्तानों को चुनौती दे पाएगा.

शाह ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि शिवाजी महाराज ने न केवल सीमाओं की रक्षा की, बल्कि उन्होंने स्वभाषा (मराठी और संस्कृत) और स्वधर्म को भी जीवित रखा. उन्होंने प्रशासन से फारसी और उर्दू के शब्दों को हटाकर भारतीय भाषाओं को गौरव दिलाया.

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-भारत एक्सप्रेस



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