Rare Genetic Disease Treatment: दुर्लभ और गंभीर बीमारियों के महंगे इलाज ने देश में एक बार फिर बहस छेड़ दी है. स्पाइनल मस्क्युलर एट्रोफी टाइप 1 नामक एक दुर्लभ और गंभीर बीमारी से जूझ रही 11 महीने की बच्ची की माता-पिता की ओर से दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट 2 जनवरी को सुनवाई करेगा.
बच्ची के माता-पिता ने बच्ची के जीवन बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर 14 करोड़ रुपए का इंजेक्शन जोलगेन्स्मा उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है. स्पाइनल मस्क्युलर एट्रोफी एक अनुवांशिक बीमारी है, जो मांसपेशियों को कमजोर करती है और शारीरिक कार्यो को प्रभावित करती है.
दुनिया का सबसे मंहगा इलाज
पिछली सुनवाई में जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच को बताया गया कि SMA का एकमात्र इलाज Zolgensma Gene Therapy है. यह अमेरिका में FDA द्वारा मान्यता प्राप्त है. अगर दो साल की उम्र से पहले ये थेरेपी दी जाए तो बीमारी रुक सकती हैं या ठीक भी हो सकती हैं, लेकिन इसकी कीमत लगभग 14.2 करोड़ रुपये है. यह बच्ची के माता-पिता के क्षमता से बाहर है.
क्या है स्पाइनल मस्क्युलर एट्रोफी (SMA) टाइप 1?
SMA टाइप 1 सबसे गंभीर प्रकार है, जिसमें रोगी की मांशपेशियां घीरे-घीरे काम करना बंद कर देती है. यह बीमारी SMN 1 जीन में होने वाले दोष के कारण होती हैं, जो मोटर न्यूरॉन्स को हेल्दी रखने में मदद करता है. इसके अभाव में रोगी को सांस लेने, खाना खाने और सामान्य गतिविधियों में भी कठिनाई होती हैं.
याचिका में यह भी कहा गया है कि लड़की के पिता वायु सेना में है और सरकार की नीति के चलते वह बिना अनुमति के रक्षा मंत्रालय में कार्यरत लोगों से आर्थिक मदद नही ले सकते हैं. याचिका में संविधान के अनुच्छेद 24 और अनुच्छेद 21 का हवाला दिया गया है.
गंभीर बीमारियों के लिए अलग से फंड निकालना होगा
बता दें कि दिल्ली हाई कोर्ट 105 याचिकाओं पर सुनवाई के बाद एक अहम फैसला दिया था. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि केंद्र सरकार को गंभीर बीमारियों के लिए अलग से फंड निकालना होगा. इस पैसे से उन मरीजों का इलाज होगा जो गंभीर बीमारी से ग्रसित है. कोर्ट ने राष्ट्रीय दुर्लभ रोग कोष स्थापित करने का निर्देश दिया था. जिसके लिए 974 करोड़ रुपये आवंटित किए जाएंगे.
कोर्ट ने कहा था कि इस फंड का इस्तेमाल दुर्लभ बीमारियों से पीड़ित व्यक्तियों के इलाज के लिए किया जाना चाहिए. कोर्ट ने निर्देश दिया था कि 25 मई 2023 को गठित राष्ट्रीय दुर्लभ रोग समिति अगले पांच वर्षों तक काम करती रहेगी.
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-भारत एक्सप्रेस
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